May 2026_DA | страница 38

साहितय

विकास और दिशा की चुनौती से जूझता दलित साहितय

बेहद उजवल है दलित साहितय का भविष्य मुखयधारा में आ रहा दलित लेखन

कंवल भारती vk

ज दलित साहितय के समक्ष उतनी चुनलौहतयाँ नहीं हैं, जितनी हमारे समय में थीं । हमारा तो जयादातर समय और ऊर्जा दलित साहितय के विरोधियों से संघर्ष करने में ही खर्च हुई । केवल दक्षिणपंथी ही नहीं, बशलक कुछ वामपंथी भी, हालाँकि सारे नहीं, दलित साहितय के विरोधी थे । वे भीतर से आज भी विरोधी हैं, पर अब दलित साहितयकार उनके विरोध की परवाह नहीं करते । उनका बहुत ही भोंडा और हासयासपद तर्क पहले यह होता था कि“ जब दलितों की बात हम कर ही रहे हैं, तो फिर अलग से दलित साहितय की कया जरूरत है? वर्णवयिसथा के पक्ष में भी रिाहणों के प्राय: ऐसे ही कुर्तक थे, जैसे, शूद्रों को पढ़ने- लिखने की कया जरूरत है, जब उनकी सहायता के लिए रिाहण मलौजूद है, या शूद्र को हथियार रखने की कया जरूरत है, जब क्षत्री उसकी सहायता के लिए मलौजूद है, या शूद्र को धन रखने की कया जरूरत है, जब उसकी सहायता के लिए वै्य धन रखता है? लेकिन सच यह है कि इनमें से किसी ने भी शूद्रों की सहायता के लिए न कलम चलाई, न हथियार उठाए । और न धन खर्च किया । शूद्रों का उतथान तभी हुआ, जब उनिोंने सियं शिक्षा ग्िण की, हथियार रखे और धनार्जन किया । इसी प्रकार दक्षिण पंथियों और वाम पंथियों दोनों ने ही दलितों के दुखों को अनुभव नहीं किया । जब अनुभव ही नहीं किया, तो वे लिखते भी कया? इसलिए
दलित समाज के दुख तभी साहितय में आए, जब सियं दलित लेखकों ने कलम उठाई ।
अब जयादा बड़ी है चुनौती
दलित साहितय को सथाहपत करने के लिए हमने बहुत लंबी लड़ाई लड़ी है । इसके लिए अखबार निकाले गए, मंच बनाए गए, संगठन बनाए गए और विरोधियों को तार्किक जवाब दिए गए । कुछ जन-संस्कृति मंच जैसे कुछ वामपंथी संगठन हमारे समर्थन में आए । हमने उनके मंचों से भी दलित साहितय का पक्ष रखा ।
परिणामत: 1990 के दशक में ही कुछ राष्ट्रीय अख़बारों और पत्रिकाओं ने दलित विमर्श को छापना आरमभ किया । दलित साहितय और विमर्श को सथाहपत करने में ओमप्रकाश वालमीहक, मोहनदास नैमिशराय, ्योराजसिंह बेचैन, और मैं सब टीम-भावना से एकजुट होकर योजना बनाकर काम करते थे । लेकिन मलौजूदा दलौर और भविष्य की चुनलौहतयों की बात करें तो यह चुनलौती अब जयादा बड़ी है । हालाँकि सथापना का संघर्ष अब नहीं है, परनतु विकास और दिशा की चुनलौती अभी भी है । दलित साहितय आज प्रगति पर है,
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