May 2026_DA | Page 37

पर भगवा रंग चटख हुआ है तो इसके पीछे भाजपा और राष्ट्रीय सियंसेवक संघ के कई संगठनों की अहम भूमिका रही है । भाजपा और संघ के अनय संगठन बाबा साहब के प्रतीकों एवं संदेशों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाने के लिए कई आयोजन करने में लगे हैं । भाजपा ने बाबा साहब की याद में राष्ट्रीय सतर पर‘ सामाजिक नयाय सपताि’ मनाया है । इसके अंतर्गत पाटटी ने तमाम कार्यरिमों के माधयम से जनता को बाबा साहब के मिशन को पूरा करने के लिए किए जा रहे अपने प्रयासों के बारे में जमीन पर जाकर विसतार से जानकारी दी । जहां
एक ओर प्रधानमंत्री नरेनद्र मोदी ने 14 अप्रैल को ही नई दिलली में पीएम मयूहजयम का उदघाटन किया है तो वहीं उत्र प्रदेश सरकार ने 14 अप्रैल से राजय में कई जिलों में‘ दलित मित्र’ कार्यरिम शुरू किया है । इसके तहत गोष्ठियां, सांस्कृतिक कार्यरिम, चित्र प्रदर्शन आदि माधयमों से गरीब एवं दलित कलयाण के प्रति सरकार के प्रयासों के प्रति जनता को जागरूक बनाया जाएगा । यह अभियान चार महीने चलेगा । इसमें दलित महापुरुषों को केंद्र में रखकर अनेक आयोजन किए जाएंगे ।
योगी सरकार साकार कर रही ्वप्न
मुखयमंत्री योगी आदितयनाथ सियं इस कार्यरिम को गति देने में लगे हैं । भाजपा की छात्र इकाई एबीवीपी ने इसी अवसर पर सामाजिक समाहन के लिए कायवो एवं उन पर चर्चा के साथ अपना इतिहास‘ धयेय यात्र’ शीर्षक से प्रकाशित किया है । भाजपा आंबेडकर के मिशन से संदेश लेकर दलितों एवं उपेक्षितों के सामाजिक एवं राजनीतिक समाहन, गरीब कलयाण के कार्य, दलित एवं वंचितों समुदायों के नायको को सममान एवं भागीदारी की दिशा में किए जाने वाले कायवो को प्रसारित करने में लगी है । इससे संगठन का समाज के हाशिये के समाजों से संवाद एवं उनमें प्रसार बढ़ेगा । अपनी पुसतक‘ फैसिनेटिंग हिंदुति’ और‘ रिपशबलक आफ हिंदुति’ में मैंने समाज के हाशिये के समूहों में संघ परिवार, जिसमें भाजपा भी शामिल है, के बढ़ते प्रसार की चर्चा की थी । इस पर कइयों को आ्चय्य हुआ था, लेकिन उत्र प्रदेश के हालिया चुनाव इस रुझान को भलीभांति समझाते हैं । इन चुनावों से यही पुष्टि हुई कि समकालीन हिंदुति एवं आंबेडकर मिशन में किस प्रकार सहकार बढ़ा है । वासति में हमें भारतीय राजनीतिक गोलबंदी के इन नए परिवर्तनों को सिीकारना ही होगा ।
बाबा साहब की सर्व ्वीकार्यता
दूसरी ओर आंबेडकर की समृहत में आज
कांग्ेस की भाषा में एक अंदाज दिखता है, जो प्रतिरोध के माधयम से हाशिये के समूहों के सशकतीकरण के तर्क को आगे बढ़ाता है । उनके नेताओं के बयानों एवं कार्यरिमों में ऐसे तर्क उभरते हुए दिखाई देते है । वहीं आंबेडकर के विचारों और दलित पहचान से जुड़ी बसपा आज गहरे संकट से गुजर रही है । उसका आधार वोट बैंक दरकने लगा है । वह इस वर्ष समाज के दलित, शोषित, वंचितों के पाटटी के प्रति बढ़ रहे बिखराव को रोकने के लिए आंबेडकर के प्रतीक एवं समृहत का सहारा लेने की दिशा में कार्य कर रही है । इसके संकेत उत्र प्रदेश चुनाव नतीजों के बाद मायावती के बयानों से ही मिलने लगे थे । सपा और वामपंथी दल भी अपने-अपने ढंग से बाबा साहब के प्रतीक से अपना सबंध जोड़ रहे हैं । इन सभी दलों की इस कवायद से जुड़ी शैली में कुछ समानताएं तो तमाम विभिन्नताएं भी हैं ।
अलव्मरणीय हैं बाबा साहब
मुखयधारा के मीडिया से लेकर इंटरनेट मीडिया पर इससे जुड़े तमाम संदेश दिखते भी हैं । इस संदर्भ में हमें यह भी समरण रखना होगा कि प्रतीकों का महति तब और बढ़ता है जब उस प्रतीक से जुड़े सामाजिक समूह जनतंत्र में मजबूत और प्रभावी होते जाते हैं । उनमें विकास की आकांक्षा बढ़ती है । उनकी आवाज का वजन बढ़ता है । विगत सात-आठ दशकों के दलौरान भारत में दलित एवं हाशिये के समूहों में राजनीतिक एवं जनतांत्रिक चेतना सशकत हुई है । एक गांव में फीलडिड्ट के दलौरान दलित वर्ग से जुड़ी एक महिला का यह कथन मुझे उललेखनीय लगा कि‘ बाबा साहब के कारण ही हमारे समाज के तमाम लोग जेब पर कलम लगाकर घूम रहे हैं । हमें बाबा साहब को भूलने नहीं देना है ।’ भारतीय समाज के दलित एवं वंचित समाज का यही भाव बाबा साहब आंबेडकर की समृहतयों को निरंतर प्रासंगिक बनाता जा रहा है । �
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