May 2026_DA | Page 40

साहितय

नहीं हो सकतीं । सहानुभूति और सिानुभूति का अंतर रहेगा ही । पुरुष के लेखन में सहानुभूति ही आएगी, सिानुभूति तो सत्री-लेखन में आएगी । इसमें संदेह नहीं कि सुशीला टाकभलौरे, रजनी तिलक, रजतरानी मीनू, हेमलता मही्िर, अनीता भारती, रजनी दिसोदिया, कलौशल पवार, नीलम, पूनम तुषामड़, राधा वालमीहक, जैसी सत्री-चेतना की सशकत लेखिकाएं दलित साहितय को समृद्ध कर रही हैं ।
मुखयधारा का साहितय बनने की प्लरिया में दलित साहितय
अभी तो दलित साहितय हिंदी साहितय के सामानांतर ही चल रहा है । लेकिन वह मुखयधारा का साहितय बनने की प्रहरिया में भी है । वर्तमान हिंदी साहितय रिाहणवादी है, जबकि दलित साहितय मलौहलक समाजवादी विचारधारा का साहितय है । हिंदी की अधिकांश पत्रिकाएँ रिाहणवादी लोगों के हाथों में हैं, जो दलित साहितय को नहीं छापते । लेकिन दलित साहितय के विरोध में लिखा हुआ छाप देते हैं । कुछ पत्रिकाएँ ऐसी भी हैं, जिनमें दलित-विशेषज् के रूप में रिाहणों को छापा जाता है । यह सब प्रहतरिांहत का लेखन है, जो दलित साहितय को मुखयधारा में प्रतिष्ठित होने से रोकता है । इस खेल को समझना होगा । इसे बाबासाहेब ने अपने‘ रिांहत और प्रहतरिांहत’ शीर्षक लेख में विसतार से समझाया है । भारत में रिांहत की रफ़तार धीमी होती है, किनतु प्रहतरिांहत की रफतार बहुत तेज होती है, कयोंकि उनके हाथों में सत्ा होती है, सारे संसाधनों और पूंजी की ताकत होती है, जबकि रिांहत करने वाले साधनहीन होते हैं, वे चंदा करके पत्रिकाएं निकालते हैं, जो एकाध साल चलने के बाद आर्थिक कठिनाइयों के कारण बंद हो जाती हैं । प्रहतरिांहत की धारा के लोग अकसर रिाहण होते हैं और प्रगतिशील या दलित होने का मुखलौटा लगाए रहते हैं । वे हमारे ही बीच घुसपैठ करते हैं, और हमारी नादानी के कारण हमसे ही सममाहनत होते रहते हैं । जिस दिन दलित लेखक रिाहणों की इस प्रहतरिांहत को समझ जायेंगे, उसी दिन से दलित साहितय
मुखयधारा का साहितय बनने लगेगा ।
दलित साहितय और साहितयकारों के साथ भेदभाव
जयप्रकाश कर्दम ने अपने उपनयास‘ छपपर’ का विमोचन नामवर सिंह से करवाया था । पर नामवर सिंह की एक भी टिपपणी‘ छपपर’ पर नहीं है । डा. तुलसी राम ठाकुर नामवर सिंह के पैर छूते थे, पर आप नामवर सिंह का कोई लेख तुलसी राम के ककृहतति पर दिखा सकते हैं? जब‘ मुर्दहिया’ पर आयोजित कार्यरिम में नामवर सिंह को बोलने के लिए बुलाया गया, तो उनिोंने अपनी पूरी सपीच में एक बार भी तुलसीराम का नाम नहीं लिया ।‘ लेखक की ककृहत... लेखक की ककृहत’ कहते रहे । यह उस सवर्ण साहितयकार का वयििार है, जिनके तुलसी राम जी पैर छूते थे । एक और उदाहरण देता हूँ । मैं‘ जन संस्कृति मंच’ की राष्ट्रीय कारिणी में था, उसी में रामजी राय भी थे, जिनको मुझे जोड़ने का श्ेय जाता है । उसमें मैनेजर पाणडेय भी थे, जो अधयक्ष भी चुने गए थे । तब तक मेरी कई किताबें आ चुकी थीं । लेकिन‘ जन संस्कृति मंच’ के किसी भी सवर्ण लेखक ने, न रामजी राय ने, और न मैनेजर पाणडेय ने, मेरी किसी किताब पर कोई चर्चा कभी नहीं की । और जब मैंने‘ जन संस्कृति मंच’ के कार्यरिमों में जाना बंद कर दिया, तो किसी भी अधयक्ष या सवर्ण सदसय ने हमारे न जाने की वजह को जानने की कभी कोशिश नहीं की । असल में हम जिस जातिवाद से लड़ रहे हैं, और जिसे खतम करना चाहते हैं, वह अधिकांश सवर्ण साहितयकारों में जड़ जमाए बैठा हुआ है । वे एक सीमा तक ही दलित की बात करते हैं, एक सीमा तक ही कबीर और आंबेडकर का समर्थन करते हैं, लेकिन वासति में वे तुलसीदास और गाँधी के ही समर्थक हैं । वे नहीं चाहते कि जाति वयिसथा मिटे, कयोंकि उनके प्राण उसी में बसते हैं । उसी के कारण वे उच्च बने हुए हैं, और उसी के कारण हम उनकी नजरों में नीच हैं । फिर वे दलित को सममान कैसे दे सकते हैं?
दलित समाज की उप-जातियों में ब्ाह्मणवादी वयव्था
यह सच है कि दलित समाज की उपजातियों में एकता नहीं हैं, उनके बीच ऊूँचनीच की रिाहणवादी वयिसथा कायम है, लेकिन यह कहते हुए हम भूल जाते हैं कि दलित समाज उसी हिंदू समाज से निकला है, जो जातिवयिसथा पर खड़ा है । एक बात यहाँ और भी गलौरतलब है, और वह यह कि जातियां केवल दलित समाज में ही हैं, हद्ज समाज में जातियां नहीं हैं, वहाँ वर्ण हैं । रिाहण, क्षत्री और वै्य समाजों में कुल और गोत्र हैं, और उनमें समान गोत्र और समान कुल में विवाह नहीं होता है । वहाँ शुकल, हमश्, पाणडेय, शर्मा आदि आपस में विवाह करते हैं, इसलिए वे एक वर्ग बनकर रहते हैं, इसकी तरह क्षत्री और वै्य भी अपने से भिन्न गोत्र में विवाह करते हैं और वर्ग के रूप में रहते हैं । किनतु दलित एक वर्ग नहीं है, वह हजारों जातियों का समूह है, जो अपनी-अपनी जातियों में ही विवाह करते हैं, इसलिए उनमें एक दलित वर्ग का निर्माण नहीं हो पाया । बाबासाहेब ने
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