May 2026_DA | Seite 28

कवर स्टोरी

संत कबीर और दलित-विमर्श

डॉ देशराज सिरसवाल la

त कबीर दास का कावय भारतीय संस्कृति की परमपरा में एक अनमोल कड़ी है । आज का जागरूक लेखक कबीर की हनभटीकता, सामाजिक अनयाय के प्रति उनकी तीव्र विरोध की भावना और उनके सिर की सहज सच्चाई और निर्मलता को अपना अमूलय उतराधिकार समझता है । कबीर न तो मात्र सामाजिक सुधारवादी थे और न ही धर्म के नाम पर विभेदवादी । वह
आधयाशतमकता की सार्वभलौम आधारभूमि पर सामाजिक रिांहत के मसीहा थे । कबीर की वाणी में असिीकार का सिर उनिें प्रासंगिक बनाता है और आज से जोड़ता है ।
कबीर मानववादी विचारधारा के प्रति गहन आसथािान थे । वह युग अमानवीयता का था, इसलिए कबीर ने मानवता से परिपूर्ण भावनाओं, समिेदनाओं एवं चेतना को जागृत करने का प्रयास किया । हकीकत तो यह है की कबीर वर्ग संघर्ष के विरोधी थे । वह समाज में वयापत
शोषक-शोषित का भेद मिटाना चाहते थे । जातिप्रथा का विरोध करके वे मानवजाति को एक दूसरे के समीप लाना चाहते थे । एक बूंद एकै मल मूत्र, एक चम एक गूदा । एक जोति थैं सब उतपन्ना, कलौन बामिन कलौन
सूदा ।।
मनुष्य की इस सपष्ट दिखने वाली समानता को नकारकर उनमें धर्म और जाति-वर्ण के नाम पर भेदभाव सथाहपत करने के लिए जो जो जिममेदार नजर आते हैं कबीर उन सबका डटकर
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