May 2026_DA | Page 29

विरोध करते हैं । चाहे वह वेद हो या कुरान, मशनदर हो या मशसजद, पंडित हो या मलौलवी ।
सामाजिक नयाय की मांग है कि समाज में जनम परमपरा अथवा विरासत के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए, वर्ण सभी को उनकी योगयता और श्म के आधार पर प्रगति करने के अवसर मिलना चाहिए । सभी को समान समझना चाहिए और किसी को अधिकार से वंचित नही किया जाए । किसी भी प्रकार की वेशभूषा अथवा विशेष ग्िण करने, अपनी श्ेष््ता सिद्ध करने का कोई लाभ नहीं । सनत कबीर कहते हैं – वैष्णव भया तो कया भया बूझा नहीं विवेक । छाया तिलक बनाय कर दराधिया लोक
अनेक ।।
कबीर का समाज-दर्शन अथवा आदर्श समाज विषयक उनकी मानयताएं ठोस यथार्थ का आधार लेकर खडी हैं । अपने समय के सामनती समाज में जिस प्रकार का शोषण दमन और उतपीडन उनिोंने देखा-सुना था, उनके मूल में उनिें सामनती सिाथ्य एवम धार्मिक पाखणडिाद दिखाई दिया जिसकी पुष्टि दार्शनिक सिद्धानतों की भ्रामक वयिसथा से की जाती थी और जिसका वयकत रूप बाह्ाचार एवं कर्मकाणड थे । कबीर ने समाज वयिसथा सतयता, सहजता, समता और सदाचार पर आहश्त करना चाहा जिसके परिणाम सिरूप कथनी और करनी के अनतर को उनिोंने सामाजिक विककृहतयों का मूलाधार माना और सतयाग्ि पर अिशसथत आदर्श मानव समाज की नींव रखी ।
यह सच्चाई निर्विवाद है कि कबीर आम जनता की वाणी के उदघोषक हैं । उनकी वाणी का सफुरण धर्म, वर्ग, रंग, नसल, समाज, आचरण, नैतिकता और वयििार आदि सभी क्षेत्र में हुआ है । यह सफुरण किसी विशेष वर्ग, भू-भाग या देश के लिए नही अपितु मानव मात्र के लिए है । उनिोंने आम जनता में एकति सथाहपत करने का प्रयास किया है । इसके लिए जितने शशकतशाली प्रहार की आि्यकता थी उसे करने में चुके नहीं । बेखलौफ होकर, जहां तक जाना समभि था वहां तक जाकर असतय का प्रतिछेदन करते हुए सतय के शोधन के माधयम से समाजों को प्रेम के सूत्र में बांधने का प्रयास किया । वसतुत: प्रेम पर आधरित वैचारिक रिांहत उनका प्रमुख हथियार था । दरअसल कबीर साहब का मुखय लक्य मानव कलयाण की प्रहतष््ा थी और इसके लिए वह युगानुकुल जैसे भी प्रयत्न समभि थे उनको प्रयोग करने में हिचकिचाये नहीं । उनके निडर वयशकतति से जनमे वि्िास की यही शशकत उनको हर युग और प्रतयेक समाज में प्रासंगिक बनाए हुए है ।
जब हम कबीर और वर्तमान दलित-विमर्श के सनदभ्य में बात करते है तो एक और पहलू हमें धयान रखना पडता हैं जिसे ओमप्रकाश
वालमीहक के शबदों में इस ढंग से कहा गया है,“ निर्गुण धारा के कवियों विशेष रूप से कबीर और रैदास की रचनाओं में अंतर्निहित सामाजिक विद्रोह दलित लेखकों के लिए प्रेरणादायक है । उससे दलित लेखक ऊर्जा करते हैं, लेकिन वह दलित लेखन का आदर्श नहीं हैं ।” इसके लिए एक तर्क यह भी दिया जा सकता है की जैसे गांधी और अनय विचारकों के जातपात समबनधी चिनतन उतना परिपकि नही है जितना की डलॉ भीम राव आंबेडकर का है । दलित-मुशकत के लिए डलॉ आंबेडकर का चिनतन अति आि्यक हैं कयोंकि यह समसया को गहराई से छूता है और संघर्ष को सकारातमक दिशा देता है । आज के दलित लेखन के लिए सामाजिक और राजनितिक दृष्टिकोण जयादा आि्यक है न की धार्मिक दृष्टिकोण । फिर भी कबीर और अनय संतों की वाणी नैतिक विकास में महतिपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है । जिसका एक उदाहरण निम्नलिखित है जिसमे बताया गया है कि गुणवान-चालाक, ढोंगी और धनपतियों से तो हर कोई प्रेम करता है पर सच्चा प्रेम तो वह है जो निसिाथ्य भाव से हो: गुणवेता और द्रवय को, प्रीति करै सब कोय । कबीर प्रीति सो जानिये, इंसे नयारी होय ।। यह एक दुर्भागयपूर्ण सतय है कि भारतीय समाज में जनसंखया के एक बड़े हिससे को सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक, राजनैतिक और संस्कृतिक अधिकारों से वंचित रखा गया । उसी सताए हुए समाज की पीड़ा की अभिवयशकत का साहितय दलित विषयक साहितय है । सन अससी के दशक के बाद ही यह साहितय मुखर रूप में हमारे सामने आया है । इस साहितय का विकास भारत में बड़ी तेजी से हो रहा है । अकसर दलित रचनाओं पर कच्चेपन और अपरिपकिता का दोष लगाया जाता है जिसका प्रमुख कारण यह की अकसर साहितय लिखते समय साहिशतयक सलौनदय्य निर्माण में वे विचार और आदर्श छुट जाते है जो की दलित विमर्श और दलित संघर्ष के लिए अति आि्यक है । संघर्ष को दिशा देने वाला साहितय ही वासति में आज की हमारी आि्यकता है । �
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