May 2026_DA | Page 27

मिलेगा । बदले में अंग्ेज सरकार को एक ऐसी जमात मिलती । जो दिखने में तो हिंदुसतानी होती । मगर अंग्ेज सरकार की हर सही या गलत नीति का समर्थन अंधभकत के समान करती । जो किसी भी सथानीय विद्रोह में अपने ही हिंदुसतानी भाइयों के विरुद्ध अंग्ेजों का साथ देती । जो अपने हिंदुसतानी भाइयों को नीचा और अंग्ेजों को उच्च समझती । इससे अंग्ेजी राज सदा के ले लिए उस देश में राज दृढ़ हो जाता ।
इस प्रकार से ईसाई चर्च, अंग्ेज सरकार और अंग्ेज वयापारी तीनों को हर प्रकार से लाभ होता ।
वर्तमान में भी चर्च ऑफ़ इंगलैंड का करोड़ों पलौणड बहुराष्ट्रीय कंपनियों में लगा हुआ है । चर्च कंपनियों के माधयम से जिन देशों में धन कमाता है, उनिीं देशों को उनिीं का धन चर्च में दान के नाम पर वापिस भेजता है । इसे कहते है " मेरा ही जूता मेरे ही सर " विदेशी सोच वाले विदेशी का तो भला हो गया मगर हमारे निर्धन, अशिक्षित, वंचित देशवासियों को कया मिला । यह चिंतन का विषय है । काले अंग्ेज बनने और गले में रिास टांगने के प्चात वनवासियों की जीवन शैली में वयापक अंतर आया । पहले वह सथानीय भूदेवताओं, वन देवताओं आदि को मानते थे । अब वो ईसा मसीह को मानने लगे । वनवासियों में शिक्षा चाहे कम थी । मगर धार्मिक सदाचार उनकी जीवन शैली का अभिन्न अंग था । भूदेवता कहीं रुष्ट न हो जाये, इसलिए
अशिक्षित आदिवासी पाप-पुणय का विचार करता था । भूदेवताओं के नाराज होने से प्राककृहतक विपदा न आये । इसलिए वह किसी को सताने में वि्िास नहीं रखता था । भूदेवताओं का भय ईसाई बनने के साथ समापत हो गया । उसके सथान पर पाप क्षमा होने की मानयता प्रचलित हो गई । सारा दिन पाप करो और सांय जाकर चर्च में पापों को सिीकार कर लो । सभी पाप क्षमा हो जायेंगे । अचछा तरीका मिल गया । ईसाई बने आदिवासियों में बड़ी तेजी से वयहभचार, शराब आदि नशे की लत, कुटिलता, झूठ-फरेब,
तलाक आदि फैल गए । उत्र पूर्व भारत इस परिवर्तन का साक्षात प्रमाण है । वहां शिक्षा तो है मगर सदाचार नहीं है । आदमी निकममे हो चले है कयोंकि नशे ने उनका जीवन बर्बाद कर दिया है । जबकि औरतें परिवार का पेट पालने के लिए अकेले संघर्ष कर रही है । ऐसे में टूटते परिवार, घरेलू झगड़े, विवाद आदि ने समाज को हिला कर रख दिया है ।
मगर ईसाई चर्च को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता । कयोंकि उसका राजनीतिक हित सुरक्षित है । सारा ईसाई समाज संगठित होकर पादरी के कहने पर वोट करता है । इसलिए चुनावी मलौसम में राजनेता पादरियों के घरों के चककर लगाते आसानी से दिख जाते है । कुल मिलाकर विदेश में बैठे ईसाई पोप अपनी हिंदुसतान पादरियों की फलौज की सहायता से न केवल राजसत्ा को
हनददेश करते है, अपितु सथानीय सरकार में दखल देकर अपने हित के कानून भी बनवाते है । नागा समसया आदि इसी सुनियोजित रणनीति का भाग है । सथानीय वनवासियों का जीवन ईसाई बनने से नरकमय हो गया है । उसने सदाचार के बदले केवल वयािसायिक शिक्षा प्रापत कर ली । मगर ईसाइयत ग्िण कर उसने अपना मूल-धर्म, अपनी सभयता, अपने पूर्वजों का अभिमान, अपनी मानसिक सितंत्रता, अपनी संस्कृति, अपनी भाषा, अपनी जीवन शैली, अपना गलौरवाशनित इतिहास, अपनी धर्म खो दिया ।
हिनदू समाज का कर्तवय ऐसी परिवेश में अतयंत महतिपूर्ण है । हिनदू समाज ने कुछ अनाथालय, शिक्षा के लिए विद्यालय तो अि्य खोले मगर वह अलप होने के कारण प्रभावशाली नहीं थे । हिनदू समाज में संगठन न होने के कारण कोई भी हिनदू नेता शुद्धि कर परिवर्तित वनवासियों को वापस शुद्ध करने में प्रयासरत नहीं दिखता । हिनदू समाज के धर्माचार्य मठाधीश बनकर मलौज करने में अधिक रुचि रखते है । ऐसी समसयाओं पर विचार करने का उनके पास अवकाश नहीं हैं । हिनदू समाज का धनी वर्ग धर्म के नाम पर दिखावे जैसे तीर्थ यात्रा, साईं संधया, विशालकाय संगमरमर लगे मंदिर, सिण्य और रत्न जड़ित मूर्तियों में अधिक रुचि रखता है । जमीनी सतर पर निर्धन हिंदुओं का सहयोग करने का उसे कोई धर्माचार्य मार्गदर्शन नहीं करता । एक अनय हिनदू समाज का धनी वर्ग है जिसे मलौज-मसती सैर सपाटे से फुरसत नहीं मिलती । इसलिए ऐसे जिलंत शील मुद्ों पर उसका कोई धयान नहीं है । इस वयथा का मुखय कारण ईसाई समाज द्ारा संचालित कानिेंट सकूलों में मिली शिक्षा है । जिसके कारण वे लोग पूरे सेकयुलर होकर निकलते है । ईसाइयों ने वनवासी समाज का नाश केवल भारत में ही नहीं किया । एशिया, अफ्ीका, लैटिन अमेरिका सभी सथानों पर अपनी चतुर रणनीति, दूर दृष्टि, सुनियोजित प्रयास, एक दिशा, संगठित होने के कारण पूरे वि्ि पर आधिपतय बनाया है । हमने समय रहते इस रणनीति से सीख ली होती तो आज हमारे देश के वनवासी मानसिक गुलाम और विदेशियों की कठपुतली नहीं बनते । �
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