Legacy India-June 2021 | Page 46

पययार्रण

पययार्रण

स तरह से धरती की हालत इंसानों की

जिवजह से खराब हो रही है , उससे लगता

है कि इंसान जयादा दिन धरती पर रह नहीं पाएंगे । कु छ सदियों में धरती की हालत इतनी खराब हो जाएगी कि लोगों को सपेस में जाकर रहना पड़ेरा । सबसे बड़ा खतरा तकनीकी आपदा का है । ये तकनीकी आपदा जलवायु परिवर्तन से जुड़ी होगी । इसके अलावा दो बड़े खतरे हैं- इंसानों द्ारा विकसित महामारी और देशों के बीच युद्ध । इन सबको लेकर सकारातरक रूप से काम नहीं किया गया तो इंसानों को धरती खुद खतर कर देगी । या फिर वह अपने आप को नटि कर देगी । यह भी हो सकता है कि इंसानी गतिविधियों की वजह से धरती पर इतना अतयाचार हो कि वह खुद ही नटि होने लगे ।
आर्थिक विकास की तुलना में अर्थशापस्तयों ने समृद्धि को पूरी तरह से परिभाषित नहीं किया , कयोंकि आजकल एक शबद , सतत विकास , नीति निर्माताओं के शबदकोष में मुखय रूप से समरपलत है । अंतरराषरिीय संस्ानों के सतत विकास के लेखा जोखा में कहीं न कहीं ऐसे शबद उपयोग में लाये जाते हैं , जिसमे पेड़-पौधों , जानवरों एवं मानवीय जीवन को बिकाऊ बना दिया है । जो वयवस्ा दुनिया को स्ायी समृद्धि देती है , उसको नकार कर , अर्थशास्ती , नीति निर्माता , पवश् के शीर्ष सतर के नेता पूरी तरह विनाश पर आधारित अर्थवयवस्ा पर धयान देते हैं । यही कारण है कि मौजूदा महामारी के दौरान दिए गए आर्थिक प्रोतसाहनों ने बड़े अमीरों को और जयादा अमीर किया है , कयोंकि अधिकतर धन वित्तीय मंडियों में जाता है , जहां से यह अतयंत धनाढ्य वर्ग के खजाने में पहुंच जाता है । अनुमान है कि इस अवधि में पवश् के चोटी के अमीरों की कु ल धन-दौलत में हज़ारो करोड़ डॉलर का इजाफा हुआ है । यानी इस अर्थवयवस्ा के विकास मॉडल में गरीबों के सतर में कोई सुधार हुआ हो , इसका कोई प्रमाण नहीं दिखता है । इसका कारण औद्ोपरक घरानों की आय पूरी तरह से उन प्राकृ तिक संसाधनों के दोहन पर निर्भर है , जिनसे गरीब आदमी इन प्राकृ तिक संसाधनों के संरक्ण के साथ अपनी रोज़ी-रोटी को जुटा पाता है । आज पूरे पवश् में धरती को
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आर्थिक वर्कास के लिए

जीर्न का मूल्य ननधयारण ( पवश् पर्यावरण दिवस 5 जून पर विशेष )

लूटने की होड़ लगी हुई है । बिल गेट्स से लेकर अडानी , अमबानी सबकी निगाह इस बात पर है कि देश की जैवविविधता को लूटकर कै से अपना साम्राजय स्ापित किया जाये । इसीलिए कृ षि से लेकर खनिज , पानी यहां तक कि बिल गेट्स ने तो धरती पर आने वाली सूर्य की रोशनी तक के रोकने का पलान बनाकर रखा है । किसानों की आमदनी बढ़ाने के नाम पर औद्ोपरक कृ षि के माधयर से आनुवंशिक रूप से संशोधित बीज , रसायन आदि के कारण किसान आतरहतया करने पर मजबूर है । 2005 से 10 साल की अवधि में भारत में किसान की आतरहतया दर 1.4 और 1.8 प्रति 100,000 कु ल जनसंखया के बीच थी । 2017 और 2018 के आंकड़ों में प्रतिदिन औसतन 10 से अधिक आतरहतयाएं दिखाई गई, ं जबकि जो किसान
गुंजन मिश्ा
प्रकृ ति पर आधारित खेती कर रहे है , उनकी संखया नगणय है । आज बिल गेट्स अमेरिका में सबसे जयादा कृ षि भूमि के मालिक हैं । ये सब कया दर्शाता है कि आने वाले समय में आम जनता को बिल गेट्स से खाने के लिए अनाज उनके मनमाने मूलय पर खरीदना होगा । जो भी बिल गेट्स की भूमि का पैदा हुआ जहरीला अनाज खायेगा , सवाभाविक है , वह बीमार पड़ेगा , जब बीमार होगा तो दवा खरीदेगा । कु ल मिलाकर आम जन का पूरा पैसा ऐसे ही उद्ोरपतियों की जेब में जाएगा , जिनके खवाब इस धरती को मिटाकर मंगल और चाँद पर बसने के हैं ।
कु छ इसी तरह का हाल बड़े उद्ोरों ( सीमेंट , सटील , एलयुरीनियम , पेरिोपलयम आदि ) का है । भारत में 89 तरह के खनिज
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