Legacy India-June 2021 | Seite 47

पदा्पो का उतपादन होता है , जिसमे चार खनिज ई ंधन , 11 धातु , 52 गैर धातु , 22 लघु खनिज है । इसमें 30-40 फीसदी आयरन , 20-30 % एलुमिना , इसी तरह लाइम सटोन , रिोराइट , कोयला आदि का भी कु छ हिससा निर्यात किया जाता है । इसका मतलब देश के खनिज के साथ साथ जल , जंगल और जमीन को भी बेचा जाता है ।
2014 में , कॉनसटैंज़ा और वैज्ापनकों के एक अलग समूह ने पाररपस्पतकी तंत्र सेवाओं के वैपश्क मूलय का अनुमान 125 परिलियन डॉलर और 145 परिलियन डॉलर प्रति वर्ष के बीच लगाया था । उनहोंने यह भी पाया कि पाररपस्पतकी तंत्र सेवाएं " वैपश्क सकल घरेलू उतपाद के रूप में मानव कलयाण के लिए दोगुने से अधिक " का योगदान करती हैं । इसके अलावा 1997 से 2011 तक पाररपस्पतकी तंत्र सेवाओं के नुकसान का अनुमान लगभग 20 परिलियन डॉलर प्रति वर्ष आँका गया था । इन आंकड़ों से सपटि है कि उद्ोरपतियों ने जीवन का मूलय कागजी मुद्रा के लिए कितना और किस तरह से निर्धारित किया है ।
प्रकृ ति द्ारा प्रदत्त संसाधनों पर सबका सामान हर् होना चाहिए , लेकिन ऐसा न होकर कु छ चुनिंदा लोगों को ही लाइसेंस प्रपरिया के अंतर्गत अधिकार प्राप्त है । पाररपस्पतकी समपदा की लूट के कारण ही पवश् में गरीबी और अमीरी के बीच अंतर बढ़ता जा रहा है । ऑकसफै म की ‘ इनकयुवैलिटी वायरस रिपोर्ट ’ का खुलासा है कि महामारी के दौरान भारत के खरबपतियों की दौलत में 35 प्रतिशत का इजाफा हुआ है । यानी आबादी के शीर्ष एक प्रतिशत भाग के पास निचले सतर पर आने वाले 95.3 करोड़ लोगों के धन के बराबर है । ये धन उन गरीब व आदिवासियों के जीवन का मूलय हैं , जिसको उद्ोयगपतियों ने सरकारों की नीतियों के कारण इकठ्ा कर लिया है । सपटि है कि वर्तमान आर्थिक विकास का मॉडल सिर्फ प्रकृ ति का दोहन करके गरीबों की रोटी उनके मु ँह से छीनकर उनको मौत के मु ँह में धकलने के लिए बना है ।
पृथ्वी पर जीवन को संरपक्त करने के लिए इस वर्ष पवश् पर्यावरण दिवस 2021 का विषय " पाररपस्पतकी तंत्र की बहाली " है । इस थीम
जंगली जानवरों और पौधों की प्रजातियों ही नहीं है , जिनका जीवन बाजार में है । मानव जीवन भी एक आर्थिक समीकरण का हिससा है । जीवमंडल में रहने वाली सभी प्रजातियां एक आर्थिक संसाधन नहीं है , जिसे मौद्रिक मूलय दिया जाए । जीवन कोई वसतु नहीं है । एक आर्थिक संसाधन के रूप में जीवमंडल की बात करना भी अतार्कि क है । हम पृथ्वी पर एक जीवमंडल के भीतर रहते हैं .
के अंतर्गत पेड़ उगाना , शहर को हरा-भरा करना , नदियों की सफाई करना आदि शामिल है । इस अवसर पर संयुक्त राषरि पाररपस्पतकी तंत्र की बहाली 2021-2030 दशक का औपचारिक शुभारंभ भी करेगा । पाररपस्पतकी तंत्र की बहाली तभी संभव है जब तक हम पूरी तरह से अपनी जरूरतों के लिए प्रकृ ति द्ारा दिए गए संसाधनों पर निर्भर नहीं होते , कयोंकि कार चाहे पेरिोल या बिजली से चले पर्यावरण को नुकसान दोनों से होना है , बपलक अगर देखा जाये तो बिजली उतपादन में पर्यावरण को नुकसान कहीं जयादा है । इसलिए बिजली या बैटरी से चलने वाले वाहन पर्यावरण हितैषी हो ही नहीं सकते । यही कारण है कि के वल खाद् उतपादक / खाद् की खोज करने वाले समाज ही पृथ्वी पर पर्यावरण हितैषी व टिकाऊ थे , कयोंकि इस तरह का समाज के वल शारीरिक कार्य पर निर्भर था ।
आज आर्थिक विकास के कारण , प्रकृ ति के संरक्ण के लिए अंतरराषरिीय संघ ( इंटरनेशनल यूनियन फॉर कनजववेशन ऑफ़ नेचर ) के अनुसार दुनिया भर में 37,400 प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर है । इसमें सतनधारी 26 फीसदी , उभयचर 41 प्रतिशत , पक्ी 14 प्रतिशत , कोनिफर 34 फीसदी आदि शामिल हैं । इसका एक मात्र कारण मानवीय जीवन के लिए इनके महतव को अनदेखा कर देना । अतः हमको अब धरती पर रहने वाले प्रतयेक जीव की रक्ा
के लिए कार्य करने होंगे इसके लिए सहअपसतवत के विचारों को अर्थ / कागज़ की मुद्रा से जयादा महतव देना होगा , कयोंकि हर एक प्रजाति धरती की कु ल प्रजातियों के जीवन व भागय का परोक् व अपरोक् रूप से निर्धारण करती है । इसके लिए जंगलों और जैवविविधता को बचाने के लिए संरपक्त क्ेत्र घोषित करना ही काफी नहीं होगा , बपलक मानवीय आधार पर इनको मानव जीवन के बराबर का दर्ज़ा देना होगा ।
इस आर्थिक दौर के समय कु छ लोग ऐसे भी हैं , जो धरती पर जीवन को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं , उनही में एक , जादव पेयांग , जिनको फॉरेसट मैन ऑफ़ इंडिया के नाम से जाना जाता है , ने अके ले 1360 एकड़ में वनय जीवों को बचाने के लिए जंगल लगाया , जिसमें हाथी , टाइगर , हिरन , व अनय तरह के तमाम पंछी रहते हैं , लेकिन देश में इनको कोई नहीं जानता , जबकि जिन लोगों ने देश में धरती की कोख पाताल तक खाली कर दी , उनको हर कोई जानता है । ये आज की अर्थवयवस्ा का मॉडल ही है , जिसने धरती लूटने वालों को पवश् का परोपकारी माना है ।
जंगली जानवरों और पौधों की प्रजातियों ही नहीं है , जिनका जीवन बाजार में है । मानव जीवन भी एक आर्थिक समीकरण का हिससा है । जीवमंडल में रहने वाली सभी प्रजातियां एक आर्थिक संसाधन नहीं है , जिसे मौद्रिक मूलय दिया जाए । जीवन कोई वसतु नहीं है । एक आर्थिक संसाधन के रूप में जीवमंडल की बात करना भी अतार्कि क है । हम पृथ्वी पर एक जीवमंडल के भीतर रहते हैं , जिसने हमें बनाया है और हमारी जीवन समर्थन प्रणाली प्रदान करता है जिसके बिना मनुषय जीवधारियों में प्रथम स्ान पर नहीं होता ।
यदि वर्तमान विकास की प्रपरिया के अंतर्गत हम जैवविविधता को ऐसे ही नटि करते रहे , तब मानव प्रजाति भी विलुप्त हो जाएगी । वैसे भी हमको यह धयान रखना चाहिए कि प्रकृ ति को मानव की आवशयकता नहीं होती है । हमारा अपसततव प्रकृ ति पर निर्भर करता है , इसलिए हमको इसकी आवशयकता है । अतः विकास ऐसा हो , जिससे जीवमंडल सुरपक्त बना रहे ।
( लेखक जानेमाने पर्यावरणविद हैं ।)
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