बहस
एलोपैथी बनाम आयुर्वेद : व्यर्थ का वर्र्ाद
है , टीबी पोलियो काली खाँसी चेचक जैसे अनेक जानलेवा रोगों से बचाव के लिए वैकसीन का निर्माण भी आधुनिक चिकितसा विज्ान की ही देन हैं । बीमारी का पता लगाने के लिए विभिनन प्रकार की जांचों में आधुनिक तकनीक का प्रयोग में भी एलोपैथी आयुववेद से कहीं आगे है । इतना ही नहीं जब
डॉ . नीलम महेन्द्र
कितसा विज्ान की दो पद्धतियों
चिका खुद को बेहतर बताने की होड़
में एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए आरोप प्रतयारोप का यह घटनारिर वाकई में दुर्भागयपूर्ण है
एलोपैथी और आयुववेद को लेकर पिछले कु छ दिनों से देश में जंग छिड़ी हुई है । आईएमए और बाबा रामदेव की आपसी बयानबाजी से कोविड की वर्तमान पररपस्पतयों में आम आदमी पर कया प्रभाव पड़ रहा होगा इस विषय में सोचे बिना दोनों में विवाद जारी है । हालांकि बाबा रामदेव द्ारा अपना बयान वापस ले लिया गया है लेकिन फिर भी इंडियन मेडिकल एसोसिएशन बाबा पर एक हजार करोड़ रुपए की मानहानि के दावे के साथ नयायालय पहुंच गया है । इतना ही नहीं दोनों के बीच का विवाद देशद्रोह के आरोपों तक पहुंच गया है । एक तरफ रामदेव को कॉरपोरेट बाबा और वयापारी बाबा जैसे विशेषण दिए गए तो आईएमए पर पंखा , तेल , साबुन , पेंट और बलब जैसी वसतुओं को प्रमाणित कर उनका प्रचार करने के आरोप लगे । भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने तो यहाँ तक कहा कि जिन विदेशी कं पनियों से पैसा लेकर आईएमए सर्टिफिके ट बांट रहा था उसकी दुकान बाबा के कारण ठपप हो रही है । कु ल मिलाकर ऐसा प्रतीत होने लगा कि पूरे के पूरे विवाद का कारण वयावसायिक प्रतिसपधामा है ।
लेकिन ऐसे दौर में जब हमारा देश ही नहीं बपलक समपूणमा पवश् ही बेहद जटिल एवं संवेदनशील पररपस्पतयों से गुज़र रहा है , उस समय चिकितसा विज्ान की दो पद्धतियों का खुद को बेहतर बताने की होड़ में एक दूसरे
42 Legacy India | June 2021
को नीचा दिखाने के लिए आरोप प्रतयारोप का यह घटनारिर वाकई में दुर्भागयपूर्ण है । अगर गंभीरता से बात की जाए तो आयुववेद और एलोपैथी चिकितसा विज्ान की दो अलग अलग ऐसी पद्धतियाँ हैं जिनका रोग अथवा रोगी के प्रति प्रारंभिक दृपटिकोण ही नहीं अपितु उसके इलाज और बीमारी के डायगनोपसस की भी अलग प्रपरिया है । देखा जाए तो रोगी को सवस्थय करने के लक्य के अतिरिक्त दोनों में कोई समानता ही नहीं है ।
एलोपैथी की बात करें तो 19 वीं सदी में यह यूरोप और नार्थ अमेरिका में आपसततव में आई थी । यह सर्वविदित है कि आज की तारीख में एलोपैथी सबसे वैज्ापनक चिकितसा पद्धति है । लगातार रिसर्च और अनुसंधान तथा अतयाधुनिक तकनीक के दम पर यह चिकितसा विज्ान रोज प्रगति कर रहा है । आज शरीर का कोई अंग खराब हो जाए तो सफलता पूर्वक उनका प्रतयारोपण किया जा सकता है , सटेर सेल थेरेपी से कैं सर जैसी कई बीमारियों का इलाज किया जा सकता
बात लाइफ सेविंग ड्रगस या फिर दुर्घटना की पस्पत में अथवा अतयपधक रक्तस्ाव जैसी किसी इमरजेंसी पररपस्पतयों की आती है तो आधुनिक चिकितसा विज्ान का कोई तोड़ नहीं होता है ।
वही आयुववेद की अगर बात करें तो इसका इतिहास कु छ सौ दो सौ साल पुराना नहीं बपलक हज़ारों साल पुराना है । इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि इसका हज़ारों साल पुराना होना इसकी सबसे बड़ी ताकत होनी चाहिए थी लेकिन आज यही इसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है । कहना गलत नहीं होगा कि भारत की इस प्राचीन चिकितसा पद्धति पर रिसर्च और अनुसंधान के आधार पर इसमें समय के साथ जो बदलाव होने चाहिए थे इस पर कार्य करना तो दूर की बात है सोचा तक नहीं गया । दरअसल आयुववेद जो कि भारत की प्राचीन चिकितसा पद्धति है के वल अर्थर्ववेद का ही अंश नहीं है बपलक भारत के सनातन इतिहास का भी अंग है । सनातन इतिहास में आयुववेद के द्ारा चिकितसा का
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