उललेख कभी रामायण में लक्रण को मूर्छा से बाहर लाने के लिए संजीवनी बूटी के उपयोग के रूप में मिलता है तो कभी महाभारत से लेकर हमारे देश के अनेकों पौराणिक साहितय के विवरणों में मिलता है । इतिहास की अगर बात करें तो 300 बीसी यानी आज से 2300 साल पहले भारत मे आचार्य चरक ने आयुववेद चिकितसा पद्धति को उसकी पहचान दी थी यही कारण है कि उनहें फादर ऑफ इंडियन मेडिसिन भी कहा जाता है । और चरक से भी 500 साल पहले 800 बीसी में यानी आज से 2800 साल पहले आचार्य सुश्रुत को भारत में शलय चिकितसा यानी सर्जरी पर पुसतक सुश्रुतसंहिता की रचना की थी और इनहें भारत ही नहीं पवश् भर में फादर ऑफ सर्जरी के साथ साथ फादर ऑफ पलापसटक सर्जरी भी कहा जाता है । आज भी पलापसटक सर्जरी पर सुश्रुत संहिता को ही पवश् के प्राचीनतम ग्ं् के रूप में सवीकार किया जाता है । कारण कि सुश्रुतसंहिता में जिन शलय चिकितसाओं का वर्णन किया गया है उनमें पलापसटक सर्जरी , प्रसूति एवं स्ती रोगों से जुड़ी शलय चिकितसा , नासिका सनधान , मोतियाबिंद की सर्जरी , दंत चिकितसा से लेकर जलने से होने वाले घावों की चिकितसा ही नहीं 125 प्रकार के शलय परिया में प्रयोग होने वाले यंत्रों यानी मेडिकल इंसटूरेंटस का विसतृत वर्णन है ।
देखा जाए तो दोनों ही चिकितसा पद्धतियाँ मानव जीवन के कलयाण के लिए आपसततव में आई ंहैं । एक कल का विज्ान है तो एक आज का । लेकिन इसके साथ साथ दोनों की
आधुनिक चिकितसा पद्धति में बुखार के हर रोगी के लिए एक ही प्रकार की गोली देने का प्रावधान है जबकि आयुववेद में रोगी की प्रकृ ति के आधार पर बुखार का इलाज किया जाता है ।
ही अपनी सीमाएं भी हैं । ऐलोपैथी की बात करें तो उसकी सबसे बड़ी कमी यह है कि वो रोग का इलाज करती है रोगी का नहीं । वो लक्णों का इलाज करती है बीमारी का नहीं । जबकि आयुववेद में रोग का नहीं रोगी का इलाज किया जाता है और लक्णों के आधार पर बीमारी की जड़ का पता लगाकर उसका इलाज किया जाता है । आधुनिक चिकितसा पद्धति में बुखार के हर रोगी के लिए एक ही प्रकार की गोली देने का प्रावधान है जबकि आयुववेद में रोगी की प्रकृ ति के आधार पर बुखार का इलाज किया जाता है । कयोंकि आयुववेद में वात पित्त और कफ के आधार पर रोगी की प्रकृ ति का पता नाड़ी विज्ान से लगाकर रोगी की चिकितसा की जाती है जिसमें के वल औषधियों का ही प्रयोग नहीं किया जाता बपलक आहार विहार और आधयातर का भी सहारा लिया जाता है । और यही दोनों चिकितसा पद्धतियों में सबसे बड़ा अंतर है ।
इसी प्रकार आधुनिक चिकितसा विज्ान के आधार पर अगर एक सवस् वयपक्त की परिभाषा की बात करें , तो इसके अनुसार किसी प्रकार की बीमारी का न होना ही वयपक्त का सवस् होना है । जबकि आयुववेद में अगर सवास्थय की परिभाषा की बात करें तो उसका बहुत ही वृहद विवरण दिया गया है । समदोषः समारपनचि समधातुमलपरियः । प्रसननातरेपनद्रयमनाः सवस् इतयपभधीयते ।। यानी जिस मनुषय के तीनों दोष वात पित्त कफ , उसकी अपगन औऱ सप्त धातु , सम अवस्ा में हैं , मल मूत्र आदि परिया ठीक होती हैं , जिसका मन इपनद्रयाँ और आतरा प्रसनन हैं , वो मनुषय सवस् हैं । यानी आयुववेद में सवास्थय मात्र शरीर में किसी बीमारी का न होना नहीं उससे कहीं बढ़कर है । सवास्थय उसके शरीर के साथ साथ उसके मन और उसकी आतरा की प्रसननता से जुड़ा विषय है । यही कारण है कि जब कोई बीमारी हमारे शरीर में बाहर से आती है जिसे हम इंफे कशन कहते हैं तो उसके लिए एलोपैथी से बेहतर कोई विकलप नहीं है । बाहरी इंफे कशन से बचना है तो वैकसीन और अगर इंफे कशन हो जाए तो एंटीबायोटिक दवाएँ । लेकिन जब कोई बीमारी हमारे शरीर के भीतर से उपजती है जैसे डायबेटिस , बलि प्रेशर , थाइरोइड या फिर सिरदर्द जो कि हमारी शारीरिक गतिविधियों में गड़बड़ी के कारण होती हैं , जिसे हम लाइफसटाइल जनरेटेड डिसीज़ भी कहते हैं तो ऐलोपैथी निरुत्तर हो जाती है वो इनहें नियंत्रित तो कर सकती है लेकिन इनका समूल विनाश नही ।
अतः यह समझना आवशयक है कि चिकितसा विज्ान चाहे जो भी हो उसका एकमात्र लक्य मानव जाति का कलयाण है और चिकितसक का कर्तवय रोगी को रोग की पीड़ा से मुक्त करना । तो समय के साथ आगे बढ़कर दोनों पद्धतियां अपनी अपनी कमियों को सवीकार करें और एक दूसरे की शक्तियों को अपनाकर मानव जाति के कलयाण का मार्ग प्रशसत करें । यदि ऐसा हुआ तो एक बार फिर भारत का चिकितसा जगत पवश् के लिए पथप्रदर्शक बन सकता है ।
( लेखिका वरिष्ठ सतंभकार हैं )
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