तरह से अनुकू ल है कयोंकि यह सेवा क्ेत्र के विपरीत लाखों कम पशपक्त भारतीय युवाओं को रोजगार दे सकता है ।
लंबे समय तक , भारत ने अपने विनिर्माण उद्ोरों को नौकरियों का बैंक बनाने के लिए संघर्ष किया है । लेकिन , पिछले 4-5 वषकों में अर्थवयवस्ा के अनय क्ेत्रों से अतिरिक्त श्रम को रोजगार देनेकी बजाय विनिर्माण क्ेत्र में वासतव में रोजगार ़ितर हो रहे हैं । ़ितरहुई ं अधिकांश विनिर्माण नौकरियां कपड़ा , निर्माण सामग्ी ( जैसे टाइल आदि ) और खाद् प्रसंसकरण उद्ोर जैसे श्रम प्रधान क्ेत्रों में हैं । उदाहरण के लिए , कपड़ा निर्माण में रोजगार 2016-17 में 1.26 करोड़ से घटकर 2020- 21 में के वल 55 लाख रह गया है । इसी अवधि में , निर्माण सामग्ी फरकों में रोजगार 1.14 करोड़ से घटकर के वल 48 लाख रह गया है । गैर-वित्तीय सेवाओं में गिरावट भी चिंताजनक है लेकिन यह गिरावट कोविड के कारण हो सकती है । भारत ने पिछले एक साल में कृ षि में रोजगार करने वाले लोगों की संखया में वृद्धि देखी है । इसे जानकार और कु छ नहीं बपलक प्रचछनन रोजगारमानते हैं ।
सीएमआईई के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत सरकार द्ारा अपनी महतवाकांक्ी मेक इन इंडिया ( एमआईआई ) पहल और नवीनतम प्रोडकशन-लिंकि इंसेंटिव ( पीएलआई ) योजना का अनावरण करने के बावजूद पिछले पांच वषकों में चीजें बदतर हो गई हैं । दरअसल भारत एमआईआई और पीएलआई योजनाओं के साथ वही गलतियां दोहरा रहा है । वे फिर से पू ंजी गहन विनिर्माण के उद्ेशय से हैं , न कि श्रम गहन विनिर्माण । इसके अलावा , भारत हाल के वषकों में एक बार फिर आतरपनभमारता के उद्ेशय से संरक्णवादी दृपटिकोण की ओर लौट रहा है जो रोजगार और तरककी की राह में बाधा है ।
भारत के विपरीत , अनय एशियाई अर्थवयवस्ाओं ने अपने तुलनातरक लाभ का फायदा उठाया है । उदाहरण के लिए , 2000 और 2018 के बीच , बांगलादेश और वियतनाम ने वैपश्क कपड़ों के निर्यात में अपने हिससे में रिरशः 2.6 प्रतिशत से 6.4 प्रतिशत और 0.9 प्रतिशत से 6.2 प्रतिशत
तक की वृद्धि की है , जबकि भारत का हिससा काफी हद तक 3 प्रतिशत से 3.5 प्रतिशत पर पस्र रहा है । अभी घरेलू मांग कमजोर है , जरूरी है कि निर्यात बाजारों पर कबजा करने के उद्ेशय से श्रम-कें द्रित उद्ोरों को आरिारक रूप से बढ़ावा दिया जाए । सनद रहे कि भारत की 70 प्रतिशत विनिर्माण नौकरियां अनौपचारिक क्ेत्र में हैं और यह हमारा आधार है । 2016 में घोषित विमुद्रीकरण और 2017 में जीएसटी की शुरूआत , दोनों ने अनौपचारिक क्ेत्र में विनिर्माण फरकों को प्रभावित किया है ।
भारतीय अर्थवयवस्ा में असमानताएं
इसके अलावा एक बड़ी समसया भारतीय अर्थवयवस्ा में असमानताओं की भी है । जहां एक तरफ 2020 में भारत के मधयर वर्ग की एक तिहाई कम होने की संभावना है और लगभग 7.5 करोड़ लोगोंके गरीबी रेखा से नीचे धके ल दिए जाने की आशंका है ( पयू
हाल ही में भारत की माकवे ट कै प 3 परिलियन डॉलर तक पहुंच गई है । गौर करने वाली बात यह है कि सकल घरेलू उतपाद ( जीडीपी ) के अनुपात में भारत का कॉपपोरेट लाभ अब लगभग 2 प्रतिशत है , जो औसतन 5.6 प्रतिशत से बहुत कम है ।
रिपोर्ट ), वहीं इसके उलट दूसरी तरफ भारत दुनिया में तीसरा सबसे अधिक अरबपतियों वाला देश बन गया है । 2019- 20 में कॉरपोरेट टैकस में कटौती से 1.5 लाख करोड़ रुपये के राजसव का नुकसान वयवसायों द्ारा अपने मुनाफे को 20-25 प्रतिशत का बढ़ावा देने के काम आ गया ।
यही नहीं असमानताएं अमीरों में भी बढ़ रहीं हैं । हाल ही में भारत की माकवे ट कै प 3 परिलियन डॉलर तक पहुंच गई है । गौर करने वाली बात यह है कि सकल घरेलू उतपाद ( जीडीपी ) के अनुपात में भारत का कॉपपोरेट लाभ अब लगभग 2 प्रतिशत है , जो औसतन 5.6 प्रतिशत से बहुत कम है । लेकिन अब 80 प्रतिशत लाभ सिर्फ शीर्ष 20 कं पनियों से आता है , यह हिससा 1991 में मात्र 14 प्रतिशत था । असमानताएं साफ़ हैं । ऐसे में यह कहना गलत नहीं है कि भारत का जीडीपी 5 परिलियन डॉलर तक पहुंचने से पहले भारत की माकवे ट कै प 5 परिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगी । और उसमें भी चंद वयापारियों का ही सहयोग होगा । बेरोजगारी और असमानताओं का कारण बहुत हद तक यह है कि भारत के नीति निर्माता पर्याप्त राजकोषीय सहायता देने से बच रहे हैं । अकसर देशों के नीति निर्माता यह सोच लेते हैं कि अर्थवयवस्ा में रोजगार की जिमरेदारी उनकी नहीं । ऐसा ही ग्ेट डिप्रेशन के समय अमरीकी राषरिपति हर्बर्ट हूवर ने सोचा था । यकीन मानिए ऐसी सोच के परिणाम अतयंत विनाशकारी साबित होते हैं । �
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