मुद्ा
मे
रा वयपक्तरत तौर पर मानना है कि प्रदेश के विधानसभा चुनाव सिर्फ एक ही मुद्े
पर फोकसि हों । यह है हेल् ।
यह सवाल जरा कालपपनक है , पर है तो आखिर सवाल ही । उत्तर प्रदेश में 2022 में जो विधानसभा के चुनाव होने हैं , वह किन मुद्े पर होंगे ? आप कह सकते हैं कि अभी कोरोना से आदमी परेशान है और मैं बात कर रहा हूँ चुनाव की । आप यह भी कह सकते हैं कि जब चुनाव तय हो जाएंगे तब नेता लोग खुद ही मुद्ा खोज लेंगे । या , फिर आप यह भी कह सकते हैं कि अभी तो साल भर से जयादा का वक्त है । अभी से चुनाव की बात कयों की जाए , कयों चुनावी मुद्ों पर खवाहमखवाह चर्चा हो ! दरअसल , इस पर अभी से सोचने , मनन करने और फिर इसे मूर्त रूप देने के लिए वक्त चाहिए । रातोंरात कोई रिांपत नहीं हुई है । मेरा वयपक्तरत तौर पर मानना है कि प्रदेश के विधानसभा चुनाव सिर्फ एक ही मुद्े पर फोकसि हों । यह है हेल् ।
कया बताने की जरूरत है कि सरकारी असपतालों की कया दुर्दशा हो गई है ? इलाज का कया सतर है ? कितने लोग इस कोरोना से असमय काल के गाल में समा गए ? सरकारी सतर पर इलाज में लापरवाही का कया सबब रहा ? निजी हॉपसपटलस ने मरीजों को कै से लूटा ? छह सौ रुपये की सुई कै से लाखों में बलैक हुई ? मरीजों की कया सेवा हुई ? ऑकसीजन , आईसीयू , सीसीयू के कितने बेड थे ? मरीजों की संखया कितनी थी ? आप आंकड़ों पर जाएंगे तो गश खाकर गिर जाएंगे । चौबीस करोड़ की आबादी के लिए जो मेडिकल सुविधाएं राजय में होनी चाहिए , जैसी होनी चाहिए , वे नहीं हैं । मैं आपको 50 उदाहरण दे सकता हूँ कि कै से लोग असपताल
हेल्थ ही बने चुनार्ी मुद्ा
आनंद सिंह
में जगह न होने के कारण गेट पर ही एड़ियां रगड़-रगड़ कर मर गए । कयों ? जो मर गए , उनकी ज़िंदगी की कोई कीमत नहीं थी ? थी , हमने उनकी ज़िंदगी की कीमत को समझा ही नहीं ।
खुद से सवाल कीजिये कि बीते 10 वषकों में मेडिकल के क्ेत्र में प्रदेश की सरकारों ने कितनी घोषणाएं कीं और धरातल पर कया दिख रहा है ? अगर सरकारों को आपकी ज़िंदगी की चिंता नहीं तो चिंता करने का , मनन करने का काम भी अब हमारा आपका
ही हो गया ! उन जन प्रतिनिधियों के नाम रजिसटर में दर्ज कर लें , जिनहोंने इस संकट की घड़ी में अपना चेहरा तक आपको न दिखाया हो , आपकी तकलीफ न समझी हो , आपका हालचाल न लिया हो । जब वे वोट मांगने आएं तो उनहें सार्वजनिक तौर पर बेइज़ज़त कीजिये और पूछिये जरूर कि संकट काल में आप कहाँ मु ंह छिपाये बैठे थे ?
पवश् सवास्थय संगठन कहता है कि हर
राजय / देश को अपनी कु ल घरेलू सकल आय का 15 फीसद हेल् पर खर्च करना चाहिए । भारत सरकार ने इस बजट वर्ष में लगभग सात फीसद धन खर्च करने का इरादा जाहिर किया है पर यह तो आदर्श आंकड़े से भी आठ फीसद कम है । तभी तो कोरोना हमारे लोगों को खा रहा है । अपने सूबे में इस साल हेल् सेकटर के लिए बजट में जो धनराश दी गई है , वह महज चंद हज़ार करोड़ रुपये की है , जबकि प्रदेश का कु ल बजट साढ़े पांच लाख करोड़ रुपये का है । डबलयूएचओ के फारू माले से चलें तो इसका 15 फीसद हेल् पर खर्च होना चाहिए , लेकिन यहां 15 फीसद से बेहद कम , कोई छह फीसद राशि ही हेल् बजट पर खर्च की जा रही है । इसलिए , किसी भुलावे में आने की जरूरत नहीं । हेल् टॉप पर रखिये । ज़िंदा रहेंगे हम आप तो सरकार भी चलेगी , तरककी भी होगी , पूजा पाठ भी हो जाएगा । जब कोरोना ही हमें खतर कर देगी तो ...? इसलिए चिंतन कीजिये , मनन कीजिये , अपना एजेंडा खुद से तय कीजिये और हां , इन राजनेताओं को यही पता है कि आम हिनदुसतानी एक नमबर के भुलककड़ होते हैं । इस गलतफहमी को भी इस बार दूर कर दीजिए । इसी में सभी की भलाई है । �
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