Legacy India-June 2021 | Page 30

अंतरराष्टीय

अंतरराष्टीय

खोला जिसे बाद में रामललाह में स्ानांतरित कर दिया गया । इसका कारण हमास ( जिसने गाजा पर नियंत्रण प्राप्त किया ) और पीएलओ के बीच फ़लसतीनी आंदोलन के विभाजित होना था । नई दिलली पीएलओ के पक् में मजबूती से बनी रही , पीएलओ राजनीतिक समाधान के लिए तैयार था , और इसने दो-राजय समाधान को सवीकार कर लिया था ।
भारत ने अकटूबर 2003 में संयुक्त राषरि महासभा के प्रसताव के पक् में मतदान किया जो इजरायल द्ारा एक अलग दीवार के निर्माण के खिलाफ मतदान था । भारत ने 2011 में फ़लसतीन को यूनेसको का पूर्ण सदसय बनाने के हर् में वोट दिया , और इसके एक साल बाद , भारत ने संयुक्त राषरि महासभा के प्रसताव को सह-प्रायोजित किया , जिसने फ़लसतीन को मतदान के अधिकार के बिना संयुक्त राषरि का " गैर-सदसय " पर्यवेक्क राजय बनाया । भारत ने सितंबर 2015 में संयुक्त राषरि परिसर में फ़लसतीनी धवज की स्ापना का भी समर्थन किया ।
इजरायल के साथ खिलते रिशते
भारत ने 1992 में इजरायल के साथ राजनयिक संबंधों को बहाल किया । इसके बाद से फ़लसतीन को अनदेखा किए बिना इजरायल के साथ रिशतों को सुधारने की कोशिश जारी रही । 1992 में तेल अवीव में एक भारतीय दूतावास का उद्ाटन हुआ । इसके बाद साल 2000 में दोनों देशों ने एक संयुक्त आतंकवाद विरोधी आयोग का गठन किया । सनद रहे कि इसी साल एल . के . अडवाणी इजरायल दौरा करने वाले पहले भारतीय मंत्री बने थे । यूपीए के कार्यकाल के दौरान फ़लसतीनी प्राधिकरण के प्रमुख महमूद अबबास ने 2005 , 2008 , 2010 और 2012 में भारत का दौरा किया ।
एनडीए-2 के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृतव वाली सरकार ने इजरायल के साथ संबंधों का पूर्ण मानयता देने का फै सला किया । इस बदलाव का पहला संके त भारत द्ारा संयुक्त राषरि मानवाधिकार परिषद में एचआरसी उचचायुक्त की एक रिपोर्ट के प्रसताव के दौरान वोट ना करने पर आया । रिपोर्ट में कहा गया था कि उसके पास 2014 में गाजा के खिलाफ हवाई हमले के दौरान इजरायली बलों और हमास द्ारा किए गए
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कथित युद्ध अपराधों के सबूत हैं , जिसमें 2000 से अधिक लोग मारे गए थे । वोट ना करना संदेह का विषय था , कयोंकि 2014 में , भारत ने उस प्रसताव के पक् में मतदान किया था जिसके माधयर से यूएनएचआरसी जांच स्ापित की गई थी । वर्ष 2016 में , भारत ने इजरायल के खिलाफ यूएनएचआरसी के एक प्रसताव पर फिर से भाग नहीं लिया ।
बड़ा बदलाव उस ऐतिहासिक शहर पर भारत की प्रपतपरिया थी , जिस पर इजरायल और फ़लसतीन दोनों दावा करते हैं- पूवथी यरुशलम । वर्ष 2017 में पीएलओ प्रमुख महमूद अबबास की नई दिलली की यात्रा महतवपूर्ण बदलाव का संके त बन गई । तब तक , विभिनन बयानों में , “ दो-राजय समाधान ” के प्रति अपने समर्थन के
भारत ने 1992 में इजरायल के साथ राजनयिक संबंधों को बहाल किया । इसके बाद से फ़लसतीन को अनदेखा किए बिना इजरायल के साथ रिशतों को सुधारने की कोशिश जारी रही । 1992 में तेल अवीव में एक भारतीय दूतावास का उद्ाटन हुआ । इसके बाद साल 2000 में दोनों देशों ने एक संयुक्त आतंकवाद विरोधी आयोग का गठन किया ।
साथ , भारत ने हमेशा पूवथी यरुशलम को एक फ़लसतीनी राजय की राजधानी सवीकार किया था । लेकिन अबबास की इस यात्रा के दौरान मोदी के बयान में पूवथी यरुशलम का पजरि नहीं था । प्रणब मुखजथी , जो 2015 में ( रामललाह में पहला पड़ाव ) इजरायल की यात्रा करने वाले पहले भारतीय राषरिपति बने , उनहोंने भी एक सवतंत्र फ़लसतीन की राजधानी के रूप में शहर पर भारत की पस्पत को दोहराया था ।
फरवरी 2018 में , जब मोदी इजरायल की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने , तब उनकी यात्रा कायमारिर में रामललाह शामिल नहीं था । प्रधानमंत्री ने तब कहा था कि भारत ने इजरायल-फ़लसतीन संबंधों को " डी-हाइफे नेटेड " कर दिया है , और भारत दोनों के साथ अलग-
अलग बात करेगा ।
दोनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश
भारत ने अब भी इजरायल-फ़लसतीन मुद्े पर एक संतुलन बनाने की कोशिश जारी रखी है । उदाहरण के लिए , दिसंबर 2017 में यूनेसको में अनुपपस्त रहने के बावजूद , भारत ने रिमप प्रशासन द्ारा यरुशलम को इजरायल की राजधानी के रूप में मानयता देने के विरोध में महासभा में आये एक प्रसताव के पक् में मतदान किया था ।
इस साल की शुरुआत में जिनेवा में यूएनएचआरसी के 46वें सत्र में , भारत ने तीन प्रसतावों में इजरायल के खिलाफ मतदान किया था । इन तीन प्रसतावों में फ़लसतीनी लोगों के आतरपनणमाय के अधिकार , इजरायली समझौता नीति , और तीसरा गोलान में मानवाधिकार की पस्पत जैसे प्रसताव शामिल थे । जबकि चौथे प्रसताव जिसमें पूवथी यरुशलम सहित फ़लसतीन में मानवाधिकार की पस्पत पर यूएनएचआरसी की रिपोर्ट थी , उस पर भारत ने मतदान नहीं किया था ।
फरवरी में , इंटरनेशनल परिमिनल कोर्ट ने वेसट बैंक और गाजा सहित फ़लसतीनी क्ेत्र में मानवाधिकारों के हनन की जांच करना अपने अधिकार क्ेत्र का हिससा बताया और इजरायली सुरक्ा बलों और हमास दोनों को अपराधियों के रूप में नामित किया । इजरायली प्रधानमंत्री नेतनयाहू चाहते थे कि भारत इस मुद्े पर आईसीसी के खिलाफ एक सटैंड ले , लेकिन भारत के ऐसा ना करने पर वह हैरान हुए । ऐसा इसलिए कयोंकि भारत इन दोनों देशों के बीच एक संतुलनकारी रणनीति चाहता है । भारत का इजरायल-फ़लसतीन के ताजा विवाद पर बयान भी इससे अलग नहीं है । हालांकि यह बयान फ़लसतीन समर्थक नहीं था , लेकिन इसने शायद ही इजरायल को प्रसनन किया हो ।
शुरुआत में भारत के फ़लसतीन का साथ देने और अरब देशों से लगाव के अपने कारण थे , जो गलत भी नहीं थे । लेकिन इस विश्ास को उस वक् ़त झटका लगा जब 1965 और 1971 में पाकिसतान के साथ युद्ध में भारत को अरब देशों का साथ नहीं मिला और उन देशों ने एक इसलापरक देश पाकिसतान का साथ दिया । �
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