अलग-थलग करने की पाकिसतान की योजना को विफल करना और बाद में , अरब देशों पर भारत की ऊर्जा निर्भरता और भारत के अपने मुपसलर नागरिकों की भावनाएं ।
आख़िरकार , भारत ने 17 सितंबर , 1950 को आधिकारिक रूप से इजरायल को एक संप्रभु राषरि के रूप में मानयता दे दी , लेकिन लंबे समय तक , पद्पक्ीय संबंधों के लिए के वल 1953 में स्ापित मु ंबई में एक वाणिजय दूतावास था , जो मुखय रूप से भारतीय यहूदी समुदाय और ईसाई तीर्थयात्रियों को वीजा जारी करने के लिए था । यह भी 1982 में बंद हो गया , जब भारत ने एक अखबार के साक्ातकार में भारत की विदेश नीति की आलोचना करने के लिए महावाणिजय दूत को निषकापसत कर दिया । इसके छह साल बाद इसे फिर से खोलने की अनुमति दी गई । भारत ने 1992 तक इजरायल के साथ राजनयिक संबंधों को बहाल नहीं किया । भारत और नेहरू का रुख़ इस मामले में गोपनीय नहीं था । तब नेहरू को दुनिया के जाने-माने वैज्ापनक अलबटमा आइंसटाइन ( जो खुद एक यहूदी थे ) ने पचठिी
लिखकर इजरायल के समर्थन में वोट देने की अपील की थी । हालांकि आइंसटाइन की बात को भी नेहरू ने सवीकार नहीं किया था ।
लेकिन साल 1992 में भारत ने इजरायल के साथ संबंधों को सामानय करना शुरु किया , इसका प्रमुख कारण सोवियत संघ का विघटन और 1990 में प्रथम खाड़ी युद्ध के कारण पपचिम एशिया की भू-राजनीति में बड़े पैमाने पर आया बदलाव था । दूसरी तरफ फ़लसतीनी लिबरेशन ऑर्गनाइज़ेशन ( पीएलओ ) ने कु वैत के कबजे में इराक और सद्ार हुसैन का साथ देकर अरब दुनिया में अपना अधिकांश प्रभाव खो दिया । दरअसल 1970 के दशक में , भारत ने पीएलओ और उसके नेता यासर अराफात को फ़लसतीनीयों का एकमात्र वैध प्रतिनिधि मान लिया था ।
जनवरी 1992 में तेल अवीव में एक भारतीय दूतावास का उद्ाटन हुआ और चार दशकों से इजरायल से ठंडे पड़े रिशतों में गरमाहट आ गई । वर्ष 1992 से अब तक , भारत-इजरायल संबंध विशेषकर रक्ा सौदों , विज्ान , प्रौद्ोपरकी और कृ षि जैसे क्ेत्रों के माधयर से बढ़ते रहे , लेकिन भारत ने कभी भी इस रिशते को पूरी तरह से सवीकार नहीं किया । इस दौरान कु छ हाई-प्रोफाइल यात्राएं हुई। ं साल 2000 में , एल . के . आडवाणी इजरायल की यात्रा करने वाले पहले भारतीय मंत्री बने , और उसी वर्ष जसवंत सिंह विदेश मंत्री के रूप में वहां गए । इसके बाद 2003 में , एरियल शेरोन भारत की यात्रा करने वाले पहले इजरायली प्रधानमंत्री बने । यूपीए के
10 साल के कार्यकाल के दौरान फ़लसतीन और इजरायल के बीच संतुलन बनाने का काम तेज हो गया ।
2015 में प्रणब मुखजथी इजरायल की यात्रा करने वाले पहले भारतीय राषरिपति बने और फिर फरवरी 2018 में , मोदी इजरायल की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री ।
फ़लसतीन के साथ ऐतिहासिक दोसती फ़लसतीन के साथ संबंध लगभग चार दशकों तक भारतीय विदेश नीति में आस्ा का विषय था । संयुक्त राषरि के 53वें सत्र में , भारत ने फ़लसतीपनयों के आतरपनणमाय के अधिकार के मसौदा प्रसताव को सह-प्रायोजित किया था । वर्ष 1967 और 1973 के युद्धों में भारत ने इजरायल को आरिरणकारी करार दिया था ।
वर्ष 1975 में , भारत पीएलओ को फ़लसतीनी लोगों के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में मानयता देने वाला पहला गैर-अरब देश बन गया , और पीएलओ को दिलली में एक कार्यालय खोलने के लिए आमंत्रित किया , जिसे पांच साल बाद राजनयिक दर्जा दिया गया । वर्ष 1988 में , जब पीएलओ ने पूवथी यरुशलम में अपनी राजधानी के साथ फ़लसतीन के एक सवतंत्र राजय की घोषणा की , तो भारत ने उसे तुरंत मानयता दे दी । यासर अराफात जब भी भारत आते थे , उनहें राषरिाधयक् के रूप में ही रिसीव किया जाता था ।
नरसिमहा राव सरकार द्ारा तेल अवीव में एक राजनयिक मिशन की स्ापना के चार साल बाद , भारत ने गाजा में एक प्रतिनिधि कार्यालय
www . legacyindia . in June 2021 | Legacy India 29