अंतरराष्टीय
इजरायल-फ़लस्ीन वर्र्ाद के बीच भारत
अं
तरराषरिीय विज्ान के छात्रों के लिए
मधय-पूर्व का इजरायल-फ़लसतीन विवाद संभवतः सबसे रोचक विषयों में से एक होगा । यह विवाद दो देशों के बीच चलने वाला सबसे लंबा विवाद है । हाल ही में यह विवाद फिर बढ़ गया जिसके कारण सीज़फायर ना लागू होने तक गाजा से लेकर पूवथी यरुशलम तक भरसक तबाही हुई । लेकिन अपनी समसयाओंसे घिरे भारत के आंतरिक दृपटिकोण से इस वक्त शायद यह मामला इतना मायने नहीं रखता । हालांकि , मायने रखता है भारत का फ़लसतीन से पुराना दोसताना और इजरायल के साथ स्ापित होता नया रिशता ।
शायद इसी वजह से संयुक्त राषरि में भारत के स्ायी प्रतिनिधि टीएस तिरुमूर्ति ने पिछले दिनों संयुक्त राषरि सुरक्ा परिषद में इजरायल-फ़लसतीन के मधय बढ़ती हिंसा पर " खुली बहस " में एक सावधानीपूर्वक तैयार किया गया बयान दिया , जिसमें फ़लसतीन के साथ भारत के ऐतिहासिक संबंधों और इजरायल के साथ खिलते संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया गया । हमारे लिए यह जानना जयादा जरूरी है कि भारत के इजरायल और फ़लसतीन के साथ कै से संबंध हैं और भारत के नज़रिये से इस मसले का अंतरराषरिीय गणित कया है ? दरअसल एक सवतंत्र देश बनने के वक् ़त में भारत और इजरायल के बीच महज नौ महीने का फ़र्क़ है । 15 अगसत , 1947 को भारत एक सवतंत्र देश बना तो 14 मई , 1948 को इजरायल ।
अरब देशों की कड़ी आपत्ति के बीच इजरायल का जनर एक सवतंत्र देश के रूप में हुआ था । इजरायल को दुनिया भर में अपने
28 Legacy India | June 2021
अक्षत मित्तल
अपसततव की सवीकार्यता हासिल करने के लिए काफ़ी संघर्ष करना पड़ा है । 14 मई , 1948 को इजरायल की घोषणा हुई और उसी दिन संयुक्त राषरि संघ ने उसे मानयता दे दी । ततकालीन अमेरिकी राषरिपति हैरी एस रिू रैन ने भी इजरायल को उसी दिन मानयता दे दी । डेविड बेन गयुरियन इजरायल के पहले प्रधानमंत्री बने । गयुरियन को ही इजरायल का संस्ापक भी कहा जाता है । उस वक्त भारत इजरायल के गठन के ख़िलाफ़
था । भारत को फ़लसतीन में इजरायल का बनना रास नहीं आया और उसने संयुक्त राषरि में इसके ख़िलाफ़ वोट किया था । भारत उन 13 देशों में एकमात्र गैर-अरब-राषरि था , जिसने संयुक्त राषरि महासभा में फ़लसतीन की विभाजन योजना के खिलाफ मतदान किया था ।
संयुक्त राषरि ने इजरायल और फ़लसतीन , दो राषरि बनाने का प्रसताव पास किया और इसे दो तिहाई बहुमत मिला । दरअसल 2 नवंबर 1917 को बलफोर घोषणापत्र आया था । यह घोषणापत्र परिटेन की तरफ़ से था , जिसमें कहा गया था कि फ़लसतीन में यहूदियों का नया देश बनेगा । इस घोषणापत्र का अमरीका ने भी समर्थन किया था । हालांकि बाद में अमेरिकी राषरिपति फ्ैं कलीन डी रुजवेलट ने 1945 में आश्ासन दिया था कि अमरीका अरबी लोगों और यहूदियों से परामर्श के बिना किसी भी तरह का हसतक्ेप नहीं करेगा । भारत के इजरायल के गठन के खिलाफ होने के अपने कारण थे , मसलन धार्मिक आधार पर भारत का अपना विभाजन , फ़लसतीनीयों के बेदखल किए जाने का डर , कशरीर पर भारत को
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