July 2026_DA | Page 41

स्वर्ण या शूद्र, उच्च या निम्न माना जाने लगा । शूद्रों को असपृशर और अछूत माना जाने लगा । इतना हरी नहीं उनहें ्वेदों के अधररन, पठन- पाठन, रज् आदि करने से ्वंचित कर दिया गया । उच्च ्वग्य ने समाज में अपना ्वच्यस्व बनाये रखने के लिए बड़ी चालाकरी यह करी कि ज्ान ्व शिक्षा के अधिकार को उनसे( निम्न ्वग्य से) छरीन लिया और उनहें अज्ान के अंधकार में झोंक दिया । इससे ्वे आज तक जूझ रहे हैं और उबर नहीं पा रहे हैं ।
दलित शबद का वासतविक अर्थ
दलित श्द का उपयोग अलग-अलग संदभयों में अलग-अलग अथयों में किया जाता रहा है । अ्सर इस श्द का प्रयोग एससरी के संदर्भ में किया जाता है । कभरी-कभरी इसमें एससरी और
एस्टरी दोनों को सकममलित कर दिया जाता है । कुछ अनर मौकों पर और अनर संदभयों में, इस श्द का इसतेमाल एससरी, एस्टरी ्व एसईडरीबरीसरी तरीनों के लिए संयु्त रूप से किया जाता है । कभरी-कभरी इन तरीनों के लिए ' बहुजन ' श्द का इसतेमाल भरी होता है । जैसा कि हम जानते हैं भारतरीर समाज में दलित ्वग्य के लिए अनेक श्द प्रयोग में लाये जाते रहे है, लेकिन अब दलित श्द स्व्यस्वरीकार्य है । दलित का शाब्दक अर्थ है- मसला हुआ, रौंदा या कुचला हुआ, नष््ट किया हुआ, दरिद्र और पीड़ित दलित ्वग्य का वरक्त । भारत में ल्वलभन्न ल्वद्ान ल्वचारकों ने दलित समाज को अपने- अपने ढंग से संबोधित ए्वं परिभाषित किया है । दलित पैंथर्स
के घोषणा पत् में अनुसूचित जाति, बौद्ध, कामगार, भूमिहरीन, मजदूर, ग़ररीब- किसान, खानाबदोश, आलद्वासरी और नाररी समाज को दलित कहा गया है ।
' डिप्ेसड ' और ' सप्ेसड कलासेज '
डलॉ. एनरीबेसें्ट ने दरिद्र और परीलडतों के लिए ' डिप्रेसड ' श्द का प्रयोग किया है । स्वामरी ल्व्वेकानंद ने ' सप्रेसड ्लासेज ' श्द का प्रयोग उन समुदायों के लिए किया जो अछूत प्रथा के शिकार थे । गांधरीिरी ने भरी इस श्द को स्वरीकार किया और यह कहा कि ्वे निःसंदेह ' सप्रेसड '( दमित) हैं । आगे चलकर उनहोंने इन वर्गों के लिए ' हरिजन ' श्द गढ़ा और उसका प्रयोग करना शुरू किया । स्वामरी ल्व्वेकानंद द्ारा इसतेमाल किए गए ' सप्रेसड ' श्द को स्वामरी श्द्धानंद ने हिन्दी में ' दलित ' के रूप में अनुदित
दलित शबद का उपयोग अलग-अलग संदभभों में अलग- अलग अथभों में किया जाता रहा है । अकसर इस शबद का प्योग एससी के संदर्भ में किया जाता है । कभी-कभी इसमें एससी और एसटी दोनों को सकममवलत कर दिया जाता है । कुछ अन्य मौकों पर और अन्य संदभभों में, इस शबद का इसतेमाल एससी, एसटी व एसईडीबीसी तीनों के लिए
किया । स्वामरी श्द्धानंद के अछूत जातियों के प्रति दृकष््टकोण और उनकरी से्वा करने के प्रति उनकरी सतरलनष्ठा को डलॉ््टर आंबेडकर और गांधरीिरी दोनों ने स्वरीकार किया और उसकरी प्रशंसा करी । गांधरीिरी और आंबेडकर में कई मतभेद थे, परंतु स्वामरी श्द्धानंद के मामले में दोनों एकमत थे । बाबा साहेब आंबेडकर, महातमा फुले, रामास्वामरी पेरियार ने इस बृहत समाज के उतथान के लिए उनहें समाज में उचित सथान दिलाने के लिए बहुत संघर्ष किया । आज अगर दलित ्वग्य में अधिकार और नरार चेतना का ल्वकास हुआ है तो ्वह इनहीं महानुभा्वों के संघर्ष का सुफल है । हमारे लेखकों, साहितरकारों ने दलित समाज के कष््टों, अपमान और संररयों
को अपनरी लेखनरी के माधरम से पूरे ल्वश्व के सामने रखा । ल्वशेषकर दलित ्वग्य के लेखकों ने अपनरी आतमकथाओं के द्ारा दलित समाज के कष््टकारक यथार्थ को बृहद जनमानस के सामने ईमानदाररी से प्रसतुत किया ।
मराठी लेखकों की आतमकथाएं
कुछ मराठरी लेखकों करी आतमकथाएँ सामाजिक-ऐतिहासिक दृकष््ट से अतरंत महत्वपूर्ण हैं जिनकरी चर्चा अतरंत आ्वशरक है । इनमें एक आतमकथा का शरीर्षक है ' उपारा '( बाहररी वरक्त)( 1980) जो मराठरी में लक्मर माने द्ारा लिखरी गई थरी । यह ककृलत केकाडरी समुदाय के बारे में है । यह समुदाय महाराष्ट् में एसईडरीबरीसरी करी सूचरी में शामिल है । यह एक ऐसा समुदाय है जिसे औपलन्वेशिक काल में आपराधिक जनजाति अधिनियम 1871 के तहत आपराधिक जनजाति करार दिया गया था । केकाडरी, आंध् प्रदेश के येरूकुला के समकक्ष हैं, जिनहें पू्व्य में ' दमित जातियों ' करी सूचरी में शामिल किया गया था और बाद में एस्टरी का दर्जा दे दिया गया । ये दोनों कना्य्टक के कोराचा, जो एससरी करी सूचरी में हैं और तमिलनाडु के कोरा्वा के समकक्ष हैं । कोरा्वा के कुछ तबकों को एस्टरी और कुछ को पिछडरी जातियों में शामिल किया गया है । अलग-अलग राजरों में उनहें जो भरी दर्जा दिया गया हो । इसमें कोई संदेह नहीं कि केकाडरी समुदाय, समाज के सबसे निचले पायदान पर है और उनके िरी्वन के बारे में लिखे गए साहितर को ' दलित साहितर ' कहा हरी जाना चाहिए, लेकिन ऊपर बताए गए सपष््टरीकरण के साथ । प्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता दे्वरी ने लोध और सबर नामक एस्टरी समुदायों पर केकनद्रत ककृलतराँ रचरी हैं ।
दलित साहितय में सामने आ रहा सच
सामानरतः दलित श्द का इसतेमाल अनुसूचित जाति के लिए किया जाता है अर्थात उन जातियों के लिए जो अछूत प्रथा करी शिकार थीं । लेकिन समाज में आलद्वासरी और अनेक
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