July 2026_DA | Page 42

साहितय

घुमंतू जातियाँ भरी शोषण का शिकार रहीं हैं । ्वे भरी इस दायरे में शामिल हैं । इसलिए जब कोई वरक्त इस श्द का इसतेमाल अधिक वरापक अर्थ में करता है तब उसे यह अ्वशर स्पष्ट करना चाहिए कि ्वह इसका इसतेमाल किस संदर्भ में कर रहा है । यह एक ऐसे दलित लड़के करी कहानरी है जिसके साथ एक ब्ाह्मण उसके द्ारा संस्कृत शलोक उच्चारित करने के‘ अपराध’ में दुवर्य्वहार करता है । बाद में यह लड़का शिक्षा प्रापत कर जज बनता है । एक अनर पुराना उदाहरण है मललापलले( 1922 में प्रकाशित)। मललापलले का अर्थ है – माला लोगों का लन्वास सथान । माला, आंध् प्रदेश करी दो प्रमुख एससरी जातियों में से एक है । इसके लेखक उन्ना्वा लक्मरीनारायणा( 1877- 1958) एक ऊँचरी जाति से थे । दो मार्मिक ककृलतरां जो हाथ से मैला साफ करने करी प्रथा और उस समुदाय के चरित्ों को लचलत्त करतरी हैं, ्वे हैं थोल्टरुडे माकन और थोट्टी । इन दोनों ककृलतरों के लेखक कमश: थकािरी लश्वशंकर पिललई( जो अपने उपनरास चेमेन के लिए अधिक जाने जाते हैं और जिस पर फिलम भरी बनाई जा चुकरी है) और नाग्वल्ली आर. एस. कुरू थे । ये दोनों ककृलतरां 1947 में प्रकाशित हुईं थीं । यह दिलचसप है कि ' मेहतर का पुत् ', ' मेहतर ' के पू्व्य प्रकाशित हुआ था । कुमारन आसन करी दुरा्वसथा ्व चंडाल भिक्षुकरी भरी दलित समुदायों के बारे में हैं । कुमारन आसन स्वयं इलड्वा समुदाय के थे । उस समय इलड्वाओं को भरी ' अछूत ' माना जाता था, हालांकि ्वे इस प्रथा से उतने परीलडत नहीं थे
जितने कि दलित ।
वशषिा के लिए हुए संघर्ष पर आधारित ' जूठन '
हिंदरी दलित साहितर में ओमप्रकाश ्वाल्मीकि करी आतमकथा ' जूठन ' ने अपना एक ल्वलशष््ट सथान बनाया है | इस पुसतक ने दलित, ग़ैर- दलित पाठकों, आलोचकों के बरीच जो लोकप्रियता अर्जित करी है, ्वह उललेखनरीर है । स्वतनत्ता प्राकपत के बाद भरी दलितों को शिक्षा प्रापत करने के लिए जो एक लंबा संघर्ष करना पडा, ' जूठन ' इसे गंभरीरता से उठातरी है । प्रसतुलत और भाषा के सतर पर यह रचना पाठकों के अनतम्यन को झकझोर देतरी है । भारतरीर िरी्वन में रचरी-बसरी जाति-व्यवसथा के स्वाल को इस रचना में गहरे सरोकारों के साथ उठाया गया है । सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक ल्वसंगतियां क़दम – क़दम पर दलित का रासता रोक कर खड़ी हो जातरी है और उसके भरीतर हरीनताबोध पैदा करने के तमाम षड्ंत् रचतरी है । लेकिन एक दलित संघर्ष करते हुए इन तमाम ल्वसंगतियों से अपने आत्मविश्वास के बल पर बाहर आता है और जेएनयू जैसे ल्वश्वल्वद्ालय में ल्वदेशरी भाषा का ल्वद्ान बनता है । ग्ामरीर िरी्वन में अशिक्षित दलित का जो शोषण होता रहा है, ्वह किसरी भरी देश और समाज के लिए गहररी शलमिंदगरी का सबब होना चाहिए था ।' पच्चरीस चौका डेढ़ सौ '( ओमप्रकाश ्वाल्मीकि) कहानरी में इसरी तरह के शोषण को जब पाठक पढ़ता है, तो ्वह समाज में वरापत शोषण करी संस्कृति के प्रति गहररी निराशा से भर उठता है ।
सदियों के उतपीड़न से पनपा आकोश
दलित कहानियों में सामाजिक परर्वेशगत परीडाएं, शोषण के ल्वल्वध आयाम खुल कर और तर्क संगत रूप से अभिवर्त हुए हैं । ' अपना गाँ्व ' मोहनदास नैमिशराय करी एक महत््वपूर्ण कहानरी है जो दलित मुक्त-संघर्ष आंदोलन करी आंतरिक ्वेदना से पाठकों को रूबरू करातरी है । दलित साहितर करी यह ल्वलशष््ट कहानरी है । दलितों में स्वाभिमान और आत्मविश्वास जगाने करी भा्व भूमि तैयार करतरी है । इसरीलिए यह ल्वलशष््ट कहानरी बन कर पाठकों करी सं्वेदना से दलित समसरा को जोडतरी है । दलितों के भरीतर हजारों साल के उतपरीडन ने जो आकोश जगाया है ्वह इस कहानरी में स्वाभाल्वक रूप से अभिवर्त होता है ।
इतिहास की पुनरयाणिखया की कोशिश
आतमकथाओं करी एक ल्वलशष््टता होतरी है उसकरी भाषा, जो िरी्वन करी गंभरीर और क्टू अनुभूतियों को त्टसथता के साथ अभिवर्त करतरी है । एक दलित सत्री को दोहरे अभिशाप से गुजरना पडता है- एक उसका सत्री होना और दूसरा दलित होना । स्पष्टतः दलित चिंतकों ने रूलढ़्वादरी इतिहास करी पुनवरा्यखरा करने करी कोशिश करी है । इनके अनुसार ग़लत इतिहास- बोध के कारण लोगों ने दलितों और कसत्रों को इतिहास- हरीन मान लिया है, जबकि भारत के इतिहास में उनकरी भूमिका महत्वपूर्ण है । दलित चिंतकों ने इतिहास करी पुनवरा्यखरा करने करी कोशिश करी है । इनके अनुसार गलत इतिहास- बोध के कारण लोगों ने दलितों और कसत्रों को इतिहास- हरीन मान लिया है, जबकि भारत के इतिहास में उनकरी भूमिका महत्वपूर्ण है । ्वे इतिहास्वान है । सिर्फ जरूरत दलितों और कसत्रों द्ारा अपने इतिहास को खोजने करी है । ्वे इतिहास्वान है । सिर्फ जरूरत दलितों और कसत्रों द्ारा अपने इतिहास को खोजने करी है । �
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