July 2026_DA | Page 39

लिए यह ल्वशलेरर मार्गदर्शक है । देश करी सुरक्षा को खतरे में डालकर यह जोखिम उठाया जा सकता है ।
डा. भरीम रा्व आंबेडकर गैर मुकसलम नेताओं में ऐसे पहले नेता थे, जिनहोंने पाकिसतान करी मांग को 1940 में हरी स्वरीकार कर लिया था । उनहोंने दृढ़ता के साथ कहा था कि अब इन दोनों समुदायों यानरी हिनदू और मुसलमान, का एक राष्ट् के अंदर शांति के साथ रह पाना संभ्व नहीं दरीखता और इसरी कारण डा. आंबेडकर ने जनसंखरा करी पूर्णरूपेण अदलाबदलरी के ल्वचार का समर्थन किया । देश ल्वभाजन का दुर्भागर भयंकर त्ासदरी लेकर आया । सारे देश में भरीरर मार-का्ट मच गररी । लाखों लोग मार दिए गए और लाखों घराल होकर कराह रहे थे । डा. आंबेडकर इन सबसे काफरी दुखरी थे । उनहोंने अपने लमत् कमलाकांत चित्े को पत् में लिखा था कि इनको दंगे नहीं कहा जा सकता है । इसको तो सशसत् ल्वद्रोह हरी कहना चाहिए । दिल्ली जैसे शहर के लिए तो यह बहुत भयंकर है । ्वहां तो कई दिनों से जान-िरी्वन ठहर सा गया है ।
देश ल्वभाजन तय होने के बाद डा. आंबेडकर
ने जनसंखरा का पूररी तरह सथानांतरण करने का प्रस्ताव रखा था । उनका कहना था कि मुकसलम और हिनदू आबादरी अपने-अपने देशों को चलरी जाए, उसरी कसथलत में गृह युद्ध तथा भयंकर नरसंहार से बचा जा सकता है । डा. अमबेडकर के अनुसार ्वह मुकसलम भारत और गैर मुकसलम भारत का ल्वभाजन बेहतर समझते हैं, जो दोनों को सुरक्षा प्रदान करने का सबसे प्का और सुरक्षित तररीका हैं । अ्वशर हरी अनर ल्वकलपों में से यह अधिक सुरक्षित है अर्थात देश भर के सभरी मुसलमानों को पाकिसतान भेजने करी तथा हिनदुओं को भारत बुलाने कि अलन्वार्य योजना बनाई जानरी चाहिए । यह कोई ऐकचछक ल्वरर नहीं है । अपनरी इसरी आकामक ्वृत्ति के कारण मुसलमान, हिनदू समाज कि दुर्बलता का लाभ उठाने के लिए गुंडागदगी का रासता अपनाते हैं । मुसलमानों करी प्रतिगामरी तथा अराष्ट्रीय ्वृत्ति के समबनध में बाबा साहब ने बड़े हरी कड़े श्दों में बहुत कुछ लिखा था, पर मित्ों ने उसे प्रकाशित नहीं होने दिया । डा. आंबेडकर का स्पष्ट मत था कि मुसलमान जब तक अपने आप को मुसलमान समझता रहेगा, उसे हिनदुसथान के राष्ट् देश में आतमसात नहीं किया जा सकेगा
और न हरी हिनदुसथान का समाज िरी्वन का रासले सकेगा । उनका यह स्पष्ट मत था कि मुसलमान जब तक भारत में रहेंगे, तब तक केंद्र में प्रभा्वरी सरकार का निर्माण संभ्व नहीं है ।
डा. आंबेडकर बार-बार यह दोहराया करते थे कि मुसलमानों को आतमसात नहीं किया जा सकता । किसरी ल्वदेशरी तत्व को राष्ट् के शररीर में रखने कि अपेक्षा उसे निकल देना हरी उचित है । इसरी ल्वचार को लेकर उनहोंने जनसंखरा के पूर्णरूपेण सथानांतरण करने करी बात कहरी । डा. आंबेडकर जानते थे कि इतनरी बडरी जनसंखरा का एक सथान से दूसरे सथान को सथानांतरित होना कठिनाइयों से भरा काम है । उनका मानना था कि यदि इसको ऐकचछक रखा गया तो पाकिसतान भरी बनेगा और समसरा का समाधान भरी नहीं होगा ्रोंकि मुकसलम लरीग ने भरी कहना प्रारमभ कर दिया था कि सभरी मुसलमानों को पाकिसतान नहीं जाना होगा । डा. आंबेडकर का कहना था कि जनसंखरा के इस सथानांतरण के लिए एक आयोग आएगा जो कि लोगों कि चल- अचल समपलत, पेंशन, नौकररी आदि सभरी बातों कि ल्वसतृत योजना बनाकर लोगों को सथानांतरित करने में सहयोग करेगा । डा. आंबेडकर ने जनसंखरा सथानांतरण के समबनध में एक ल्वसतृत कार्य योजना भरी बनाई थरी, जिसका ल्वसतार से उललेख उनहोंने अपनरी पुसतक ' पाकिसतान ऒर द पार्टीशन ऑफ इकणडरा ' में किया था । डा. आंबेडकर का कहना था कि जनसंखरा कि पूर्ण रूप से अदला बदलरी हरी भारत को एक राष्ट् बना सकतरी है, जब तक यह नहीं होता, तब तक पाकिसतान बना देने से अलपसंखरक और बहुसंखरक करी समसरा का कोई समाधान नहीं निकलेगा और यह समसरा भारत में ्वैसरी हरी बनरी रहेगरी तथा यहां कि राजनरीलत में आपसरी दुरा्व और भेदभा्व को जनम देतरी रहेगरी । लेकिन ततकालरीन दौर में डा. अमबेडकर के प्रस्ताव पर कांग्ेस के नेताओं ने धरान नहीं दिया और धर्मनिरपेक्षता के मोहजाल में अतिउतसाहरी बने रहे और देश ल्वभाजन के समय लाखों लोगों का नरसंहार देखते रहे । �
tqykbZ 2026 39