जनकृ ति अंिरराष्ट्रीय पतिका / Jankriti International Magazine( बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की 125वीं जयंिी पर समतपिि अंक)
ISSN 2454-2725
जनकृ ति अंिरराष्ट्रीय पतिक
( बाबा साहब डॉ. भीमराव अ
कहानी-संग्रह और एक ईपन्यास अ चुके थे और मुझे शायद ही कभी याद अया हो हक मेरे नाम के पीछे लगा ' यादव
समाहजक हपछड़ेपन का संके त है हो सकता है पाररवाररक पहस्थहतयों के कारण या व्यहक्तगत ईयतनम के चलते. वणथ- व्यवस्था में ब्राह्मïण शहक्त और सत्ता का प्रतीक है-( क्योंहक ज्ञान ही सत्ता है) वह ऄपने ज्ञान से सत्ताधाररयों को नचाता रहा है, ईधर बाकी सब सत्ता के याचक हैं. ऄगर औरों से छीनकर पू ंजी पर एकाहधकार बनाये रखने और श्रम के सहारे
जीहवका ऄहजथत करने वालों के दो वगथ हो सकते हैं तो ज्ञान के वचथस्व और ऐंहरक ऄनुभवों के माध्यम से सृहि का साक्षात्कार करने वालों के दो वगथ क्यों नहीं हो सकते? दोनों ही हवभाजनों में एक वगथ परोपजीवी है, आसहलए कला, अध्यात्म, जीव-ब्रह्मï के ऄमूतथनों में अनंदानुभूहत करता रह सकता है-वह ' काव्य, शास्त्र हवनोदेन कालो गच्छहत
धीमताम का कीतथन नहीं करेगा तो क्या वह करेगा जो खून-पसीने से रोटी कमाता है या जमीन के नीचे और सागर के तूफानों में बीवी-बच्चों के हलए भोजन तलाशता है? ईसे ही तो बलपूवथक ज्ञान से दूर रखा गया है. ऄगर पू ंजीपहत को धन-हपशाच कहा जाता है तो आस ब्राह्मïण को ज्ञान-हपशाच क्यों नहीं कहा जाना चाहहए? समाज की यह भी सचाइ है हक जाहतयों के बजाय बात हवचारधारा की होनी चाहहए-सामाहजक न्याय की हवचारधारा. हवभाजन सामाहजक न्याय की हवचारधारा के समथथन और हवरोध के अधार पर होना चाहहए. क्योंहक कोइ भी जाहत एक समरूप समुदाय नहीं है. ईसके ऄंदर हवहभन्न वगथ, गुट और हवचारधारायें होती हैं और आन्हीं के मुताहबक ईसके ऄंदर से कइ तरह की राजनीहत
और नेतृत्व ईभरता है. आससे एक जाहत के ऄंदर और हवहभन्न जाहतयों के बीच भी टकराहट पैदा होती है. आसहलए हवभाजन और संगठन सामाहजक न्याय की हवचारधारा के अधार पर होना चाहहए, न हक जाहतयों के अधार पर. समस्या यह है हक हम जाहतवाद से ग्रस्त समाज से कै से लड़ें? जाहतवाद से ग्रस्त समाज, ऐसे समाज से भी बुरा है हजसमें गुलामी का प्रचलन हो, यह रंगभेद से भी बदतर है. यह एक ऐसा समाज है, जो यह हहंदी साहहत्य में एक ही धारा है ब्राह्मणवाद: हजसे अप मुख्यधारा कहते हैं, वह दरऄसल साहहत्य की ब्राह्मणवादी धारा है. आस धारा के सभी रचनाकार ब्राह्मण थे, हजन्होंने वणथव्यवस्था और हहन्दू संस्कृ हत के पुनरुत्थान को साहहत्य की मुख्यधारा के रूप में
स्थाहपत हकया था. आस धारा ने वणथव्यवस्था का खडडन करने वाली हकसी भी प्रगहतशील धारा को स्वीकार नहीं हकया. समतावादी और मौहलक समाजवाद की धारा भारतेन्दु से पहले भी और ईनके बाद भी, लगभग हर दौर में
मौजूद थी.
भारतीय साहहत्य-संस्कृ हत, सांस्कृ हतक ऄवरोध:
भारतीय संस्कृ हत ने ऄपनी लम्बी हवकास – यात्रा तय की है, हजसमें वैचाररकता, जीवन-संघषथ, हवरोह, अिोश, नकार, प्रेम, सांस्कृ हतक छदम, राजनीहतक प्रपंच, वणथ- हवद्वेष, जाहत के सवाल, साहहहत्यक छल अहद हवषय बार – बार दस्तक देते हैं. वस्तुतः अजतक हजसे भारतीय संस्कृ हत कहा जाता रहा है वह एक ख़ास समुदाय और जाहत हवशेष की संस्कृ हत है. यानी हक लोक और हशि का भेद पहले से ही होता अया है. शोषकों की एक लयबि संस्कृ हत को ऄभी तक भारतीय संस्कृ हत कहकर प्रचार-प्रसार हकया जाता रहा है. यहद संस्कृ हत का ठीक से ऄध्ययन हकया जाए तो पता चलेगा हक ईसमें से भारत की सत्तर प्रहतशत जनता का हहस्सा गायब है. वे लगातार हाहसये पर धके ले गए हैं. ईनकी संस्कृ हत को संस्कृ हत माना ही नहीं गया. ईच्च वणथस्थ जाहतवादी मानहसकता ने ग्राम्य या देशज कहकर नकार हदया गया. मूलतः यह संस्कृ हत नहीं ऄहपतु हवकृ हत है. शोषण, दमन, छु अछू त, जाहतवाद, क्षेत्रवाद पर
अधाररत आस संस्कृ हत को मूलतः ब्राह्मण संस्कृ हत तो कहा जा सकता है भारतीय संस्कृ हत नहीं. हकसी देश की संस्कृ हत
तो वहां के हनवाहसयों का अआना होती है. सम ईनका ऄब पुनपाथठ होना चाहहए. हजस हवषम
बात करना ऄकल्पनीय लगता है. आसी हलए स अंतररक ऄनुभूहत है, हजसे ऄहभव्यक्त करने
दहलत को ईसके भीतर हीनता बोध पैदा करते दासता और गुलामी का प्रतीक है. हजसके हल
पीड़ादायक हस्थहतयों से गुजरना पड़ता है. दहल यह चेतना ईसे डा. ऄम्बेडकर जीवन – दशथन औ
यह एक मानहसक प्रहिया है जो आदथ- सावधान करती है. यह चेतना संघषथरत दहलत दहलत को मनुष्य होने से दूर करते रहने में ह तथाकहथत ईच्चवणीय चेतना में गहरा ऄंतर करते हुए ईच्च वणथस्थ और नेहरु के हपछल भारतीय संस्कृ हत को रेखांहकत करते हुए हलख संस्कृ हत का आहतहास ईन्हीं चार िांहतयों का आ जब भारतवषथ में ईनका अयेत्तर जाहतयों से स्थाहपत धमथ या संस्कृ हत के हवरुि हवरोह हक हदशा की ओर ले गए. आस िांहत ने भारतीय शैवाल भी ईत्पन्न हुए और भारतीय धमथ औ पररणाम था. तीसरी िांहत ईस समय हुइ जब आ के साथ ईसका संपकथ हुअ. चौथी िांहत हमा कहते हैं. ऄब मान्य हदनकर जी से पूछा जाना च हदनकर हजस संस्कृ हत कह रहे हैं वह हकन ल हपछड़ों की संस्कृ हत है? क्या आसमें कु छ हहस्स
हवरुिों का सामंजस्य के तौर पर देखते हैं औ संस्कृ हत ऄपनी सुरक्षा के हलए‘ पुनरुत्थान’ क एक स्वयं हक रक्षा और दूसरा‘ प्रहतवाद’ प्र रेहडशन’ तथा‘ हलहटल रेहडशन’ कहते हैं ना
प्रहतहनहधत्व के हलए शास्त्र और लोक शब्द‘ आहन्फ़ररयर कोम््लेक्स’ होता है. माग्रेट मीड करती है हक जैहवक हभन्नता नहीं बहल्क सम करती है. ईस मानक के हहसाब से समाजीकर समाज और संस्कृ हत तय करती है हक हकसके की भााँय-भााँय गू ाँजेगी. कहते हैं हकसी को गुल
Vol. 2, issue 14, April 2016. वर्ष 2, अंक 14, अप्रैल 2016. Vol. 2, issue 14, April 2016.