जनकृ ति अंिरराष्ट्रीय पतिका / Jankriti International Magazine( बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की 125वीं जयंिी पर समतपिि अंक)
ISSN 2454-2725
जनकृ ति अंिरराष्ट्रीय पतिक
( बाबा साहब डॉ. भीमराव अ
ऄतीत को आतना हबगाड़ दीहजये की वो कभी ऄपनी जड़े न खोज पाये. देर ही सही आन पर से पदाथ ईठने का कायथ प्रारम्भ हो गया हजसे संघ पररवार सांस्कृ हतक राष्रवाद कहता है वह वस्तुतः पहश्चमी ईपहनवेशवाहदयों द्वारा हदया ओररयंटहलज्म है. ऄपनी सामाहजक बनावट में वह शुि सामंती है क्योंहक गैर बराबरी और शोषण दमन को धाहमथक अधार देता है. हस्त्रयााँ दहलत और हपछड़े उपर ईठने की कोहशश न करें. आसके हलए धाहमथक अदेश और जन्मान्तर के कठोर हनयम हैं. कु छ जाहतयां न उपर ईठें न ऄपनी हस्थहत बदलें क्योंहक यह व्यवस्था इश्वरीय है. ऄपनी हस्थहत के हलए वे नहीं ईनके पूवथजों, पूवथजन्मों के कमथ हजम्मेदार हैं. यथाहस्थहत बनाये रखने के हलए प्रारब्ध एक ऐसी व्यवस्था है
हजसके हखलाफ कोइ हवरोह नहीं हकया जा सकता. कभी कमथ से बनीं होंगी हहन्दू धमथ हक जाहतयां मगर वे हजारो सालों से अज जन्म से ही हनधाथररत होती हैं.
इहि मस की िीन म मन समममहजक क्मंहियमाँ:
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हहंदी के सुहवचाररत अलोचक चौथीराम यादव ने कहा था भारत में प्रमुख रूप से तीन सामाहजक िांहतयााँ हुइ है. एक भगवान बुि की िांहत, दूसरी भहक्त अन्दोलन या कबीर रैदास की िांहत और तीसरी बाबा साहेब अंबेडकर की सामाहजक िांहत. ये सब पररवतथन कामी िांहतयााँ थीं. कबीर और रैदास का सम्बन्ध बनारस से था. यह वही बनारस है जो सामंतों, पंडों, पुजाररयों और वणथपूजकों का गढ़ है. यहााँ न कबीर की सुनी गइ न रैदास की. रैदास पंजाब में ज्यादा सुने गए. कबीर भी आधर ईधर ज्यादा सुने गए ईन्हें बनारस ने कम पूछा गया. बनारस या पूवाांचल में कौन सुना गया यह जानना बहुत जरुरी है. ब्राह्मणों और तथाकहथत अलोचकों के बीच तुलसीदास ऄहधक सुने गए. तुलसी दास के हलए अलोचकों में हुंवा, हुंवा का स्वर प्रबल है जबहक रैदास और कबीर के हलए‘ भों, भों, का स्वर सुनाइ देता है. यह ऄकारण नहीं है. यह बताता है हक हुंवा-हुंवा का स्वर करने वाले लोग यथाहस्थहतवाद के समथथक थे. वे स्टेटस बरकरार रखना चाहते थे. वे चाहते थे वणथिम और जाहतिम बना रहे. साम्रदाहयकता बनी रहे. भों-भों का स्वर में वणथ, जाहत के हवरुि हलखने वाले लोग थे. मध्यकाल पर ध्यान दें तो एक बड़ी बात हनकलती है हमत्रों. गुरुग्रंथ साहहब में संत रैदास के पद हमलते हैं, कबीर के पद हमलते हैं, ऄन्य भाषाओाँ समुदायों के स्वर हमलते हैं पर वणथवादीयों के ्यारे, सबसे ऄहधक पूज्य तुलसीदास के पद हमें नहीं हमलते. वणथवादी अलोचकों जैसे रामचंर शुक्ल, नामवर, रामहवलास शमाथ जैसों का मानना है संत पढ़े हलखे नहीं थे आसहलए ईनके पास समाज का कोइ माडल नहीं था. वे तुलसी के रामराज्य में हवश्वास करते हैं हजसमें दहलतों, हपछड़ों, महहलाओं, अहदवाहसयों के हलए के हलए कोइ जगह नहीं है. यहद कोइ तुलसीदास के साथ खड़ा है तो वह दहलतों, मुसलमानों, महहलाओं, अहदवाहसयों क ए साथ न्याय कै से कर सकता है?
भमर्म व्यव मर में भेदभमव:
प्रहसि हवचारक राजेन्र प्रसाद हलखते हैं हक हसंह गुरु घंटाल बौि संत थे. आनकी याद में गुरु पद्म संभव ने 8 वीं सदी में गुरु घंटाल मंहदर की स्थापना की थी. यह मंहदर हहमाचल- प्रदेश के लाहौल-स्पीहत हजले में है. ब्राह्मण और
19 जवाहय रार नेहरु र्वश्वर्वद्मारम भें आमोष्जत सेभीनाय‘ सॊत यैदास औय साभाष्जक रूऩाॊतयण’ के अध्मऺीम फीज वक्तव्म भें, ९ फ़यवयी २०१५
बौि संस्कृ हत के अपसी टकराव के कारण अपसी टकराव के कारण भी कइ शब्दों का ऄ " मनुष्य के बच्चे को कहा जाता है, जबहक अ
संस्कृ हत के अपसी टकराव के कारण " हजन " भाषाओं के नाम दजथ हैं जो भूत- प्रेत से संबंहध " चंडाल भाषा " अहद. ऐसी भाषाओं के नाम अइ जाहतयों का भी ऄथाथपकषथ हुअ है, हमस अहद. ये िमशः ह ण( मंगोहलयन), ईजबेक( ई का एक तबका ऄसुर है, जो झारखंड में हनव ऄ थ / प्रयोग तो हहन्दी शब्दकोष में जगजाहहर ह तबकों के नामों को घृणास्पद ऄथों से बढकर चाइ, ं चुहतया भी अहदवाहसयों के तबके हैं. आ जाता है. लाख की चूहड़यां बनाने वाले कारीग ‚ अवारा ‛ होता है. ऐसे ही न जाने हकतने ज और घृणास्पद बनाने का काम हकया है.
अस्सी के दिक के बमद ह ंदी में नयम जमहि
हहंदी में हपछले दो दशकों के दौरान द दो हवरोधाभास हैं. पहला यह स्वीकृ त‘ हाहसय को प्रगहतशील‘ जनवादी’ साहहत्य कहते हैं. र नहीं है वह हद्वज साहहत्य है. 20 दहलत साहहत्य ऄहभजन, कला वादी हसिांतों को नकारता ह जाहतवाद, वणथवाद को एक हसरे से ख़ाररज साहहत्य है. यह साहहत्य में अरक्षण के सवाल के वल सवणों का कब्ज़ा रहे. पुरस्कमरों कम जमहिवमदी इहि मस:
अधुहनक युग का समाज स्थूल से स भी पहले से ऄहधक सूक्ष्म हुअ है. स्थूल ज पुरस्कारों में, नामांकनों में, फाआलों में, सहवथस में बड़ी सूक्ष्मता के साथ सूक्ष्म जाहतवाद हलपट करने कइ भेष बदलकर अएगा बहुरूहपया! क ठगे जाआएगा. हर भेष नया होगा. भारत की जा
20 फहुजन साहहत्म औय आरोर्ना, पायवर्ड प्रेस
Vol. 2, issue 14, April 2016. वर्ष 2, अंक 14, अप्रैल 2016. Vol. 2, issue 14, April 2016.