Jankriti International Magazine vol1, issue 14, April 2016 | Page 96

जनकृ ति अंिरराष्ट्रीय पतिका / Jankriti International Magazine( बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की 125वीं जयंिी पर समतपिि अंक)
ISSN 2454-2725
जनकृ ति अंिरराष्ट्रीय पतिक
( बाबा साहब डॉ. भीमराव अ
पांके में से भरर-भरर हपयतानी पानी |
पनही से हपहट हपहट हाथ गोड़ तुरर दैले हमनी के एतना काहे के हलकानी ||
यह बीसवीं सदी का दूसरा दशक था जब १९१४ में महावीर प्रसाद हद्ववेदी की यशस्वी पहत्रका में दहलत कहव हीरा डोम रहचत‘ ऄछू त की हशकायत’ प्रकाहशत हुइ थी. आसके बाद िांहत, लोकतंत्र, अधुहनकता और
मानवाहधकारों को समहपथत पूरी शताब्दी में ऄछू त ऄपनी हशकायत के हनराकरण की प्रतीक्षा करते रहे. ईन्होंने हशकायत करने के हर जररये का आस्तेमाल हकया. ईन्होंने परम्परा के दरबार में हाहजरी लगाइ ंऔर ऄन्त्यज से शूर बनने की कोहशश करके जाहत के दायरे के भीतर उपर ईठना चाहा. भहक्त अन्दोलन से बहले वे इश्वर के दरबार से बहहष्कृ त थे. संत कहवयों ने ईन्हें इश्वर को ईलाहना देना हसखाया था.
ब्रमह्मणवमद ने कै से एक दूसरे को पोर्म:
नामवर हसंह ने भी एक ईहक्त दे डाली हक‘ घोड़े पर हलखने के हलए क्या घोड़ा होना होगा?’ यहां ईत्तर हां में होगा. घोड़े पर कसी गइ जीन का वजन और ईसकी कसावट का बंधन, ईसके मु ंह में लगाइ गइ लगाम का स्वाद, ईस पर पड़ते कोड़े की फटकार का ददथ, ईसके खुर में ठोंकी गइ नाल का दंश घोड़ा ही बता सकता है, कोइ और नहीं. परंतु यह भी सत्य है हक मनुष्य घोड़े की सवारी करना, ईसकी दुलत्ती खाना, ईसके रंग, ईसकी हहनहहनाट की अवाज, ईसकी सरपट चाल के साथ ईससे सहानुभूहत करता हुअ ईसकी तकलीफ पर जरूर हलख सकता है, ऄभी घोड़ा नहीं हलख सकता. हजस हवचारधारा ने भारत में ब्राह्मणों को सवथश्रेष्ठ घोहषत हकया है, हजनके पास सत्ता को संचाहलत करने का ऄहधकार था और सबसे बड़ी बात हजनके पास ऄध्ययन-ऄध्यापन का ऄहधकार था, वे ही लेखन कायथ में भी लगे हुए थे. वेदों को ऄपौरूषेय हसि हकया जाता है, लोक वांङ्मय को जाने हकस श्रेणी में रखा जाएगा? पौराहणक कृ हतयों के ऄहतररक्त लौहकक रचनाओं के रचनाकारों के जो ज्ञात नाम हैं, ये सब कौन थे? ईपहनषद, स्मृहतयां, काव्यशास्त्र संस्कृ त के ग्रंथ अहद की रचनाएं हकनके द्वारा की जा रही थीं? स्वाभाहवक है हक यही रचनाकार अलोचना कर रहे थे और कर रहे हैं. ऄब ऄपनी मानहसकता के साथ वे जैसी अलोचना कर रहे हैं, ईसी खाचें में सबको खहचत करना चाहते हैं, और सबसे यही ऄपेक्षा करते हैं.
यह वहीं नामवर हैं जो हपछले हदनों हदल्ली में दस पुस्तकों के हवमोचन के ऄवसर पर लगभग चेतावनी देते हुए कहा था हक यहद साहहत्य में अरक्षण हदया गया, तो जैसे राजनीहत गन्दी हो गइ, वैसे ही साहहत्य का क्षेत्र भी गन्दा हो जायेगा. 13 हहंदी साहहत्य लेखन में हजस तरह की गुटबंदी और चाटुकाररता का अलम है वह काहबले गौर है. हशष्य बनाने की सनातन परम्परा हहंदी में अकर कै से टूटती? हर मठाधीश ऄपने दो चार गुगे जरुर पालकर चलता है. वे गुगे श्वान की भााँती ईनके चारो तरफ दुम हहलाते हफरते हैं और बदले में गुरु का बचा हुअ पाते हैं. मध्यकाल की तरह यहााँ सत्ता और भोक्ता के बीच गुरु नाम का एक हमहडयोकर जरुर है. वह ऄपने चेलों को भोग की सारी सामग्री ईपलब्ध कराता है. हहंदी में जो भी अलोचना और आहतहास लेखन हवकहसत हुअ वह आसी चेलावाद, जाहतवाद और क्षेत्रवाद के अधार पर हुअ. आन्हीं अलोचकों ने हहंदी का सबसे ज्यादा नुकसान हकया है. आहतहास ग्रंथों में ऄपने ररश्तेदारों को प्रश्रय, ऄपनी जाहत को प्रश्रय, ऄपने चेलों को बढ़ावा और देशज शब्दों में कहें तो तू मेरी खुजा हैं तेरी खुजाओं की
13 रोकतॊत्र का ऩाठ सीखें नाभवय, कॉ वर बायती, पायवर्ड प्रेस, फहुजन साहहत्म वार्षडकी-२०१३, ऩृष्ठ २५
रीहत पर सब हुअ. आसी परंपरा के पोषक सच् हलखते हैं हक अचायथ रामचंर शुक्ल, हजार अलोचना सम्बन्धी लेखन में पुरान्पंहथयों, जनहवरोधी और आहतहास हवरोधी दृहिकोण क दृहिकोणों से संघषथ करना चाहते हैं और जनता भूहमका की पहचान हवकहसत करना चाहते हद्ववेदी और रामहवलास शमाथ के ऐसे संघषों पुराणपंथी और यथाहस्थहतवादी है तब ऐसी प क्या हो सकता है.
डॉ. आंबेडकर कम समममहजक ह ंि
अंबेडकर एक समाजशास्त्री और सामान्य ऄथों में साहहत्यकार नहीं थे. कहने भ झालो’( मैं कै से बना) से प्रेरणा लेकर दहलत दहलत साहहत्य के स्रोत हदखाने के हलए ईदा महत्व कु छ और था. एक पथ-प्रदशथक और मन भी हवचारक पर हचंतन करते हुए यह अवश्य हवचारक का योगदान सकारात्मक है या नक ऄपनी सामाहजक हचंतक की भूहमका हकन म था? वह हकस दृहिकोण से समाज को देख र सारे प्रश्नों का एक ही ईत्तर है‘ जाहत के दंश’ खोदना, जाहत प्रथा की चूलें हहला देना. सामा नि करने हेतु वह साक्ष्य जुटा रहे थे. दूसरी त व्यवस्था के पोषक थे ऄत: डॉ. अंबेडकर से हकतने ही संतुहलत और हनष्पक्ष होने के प्रयास लेते हैं. आसका यह अशय नहीं हक ये प्रयास
संभावनाएं बनी रहेंगी.‘ गौरव का लोकगीत: स काम करने वाले आहलऄनर हजहलऄट ने ऄपने ऄनुवाद में हलखा है हक: हहन्दुओं को चाहहए थे वेद, आसहलए ई बुलाया जो सवणथ नहीं थे | हहन्दुओं को चाहहए था एक महाकाव्य
14 साहहत्म औय इततहास दृष्ष्ि, भैनेजय ऩाॊर्े, वाणी 15 नए शहय की तराश, आदुतनकता के आईने
Vol. 2, issue 14, April 2016. वर्ष 2, अंक 14, अप्रैल 2016. Vol. 2, issue 14, April 2016.