Jankriti International Magazine vol1, issue 14, April 2016 | Page 95

जनकृ ति अंिरराष्ट्रीय पतिका / Jankriti International Magazine( बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की 125वीं जयंिी पर समतपिि अंक)
ISSN 2454-2725
जनकृ ति अंिरराष्ट्रीय पतिक
( बाबा साहब डॉ. भीमराव अ
प्रवाद प्रचहलत है. कहते हैं काशी में स्वामी रामानंद का एक भक्त ब्राह्मण था हजसकी हकसी हवधवा कन्या को स्वामी जी ने पुत्रवती होने का अशीवाथद दे दे हदया था. फल यहााँ हुअ हक ईसे एक बालक ईत्पन्न हुअ हजसे वह लहरतारा के ताल के पास फे क अयी. ऄली या नीरू नाम का जुलाहा ईस बालक को ऄपने घर ईठा लाया और पालने लगा. यही बालक अगे चलकर कबीरदास हुअ. 8 यहााँ रामचंर शुक्ल दशाथना चाहते हैंहक कबीर को चाहे अप कु छ भी कहहये पर वह हैं हवशुि ब्राह्मण का खून.
समह त्य कम इहि मस और भेदभमव
हहंदी साहहत्य के ऄहधकतम आहतहास ग्रन्थ‘ सामान्य हवतरण के हखलाफ’ है. हहंदी में वणथवादी, जाहतवादी अचायथ रामचंर शुक्ल का आहतहास प्रहतमान है तब सुमन राजे का आहतहास प्रहतमान कै से हो सकता है? एक पंहडत द्वारा हहन्दू मन से हलखा गया हहंदी का आहतहास धमथ और अस्था से कै से ऄलग हो सकता है. दुहनया की हजतनी महान कृ हतयााँ हैं वे दो हसरों की बात करती हैं. ऄभी एक के न्रीय हवश्वहवयतनालय के हहंदी पाठ्यिम में‘ ऄहस्मतामूलक’
साहहत्य को स्थान देने के हलए एक लम्बी बहस हछड गइ. प्रश्न था हकस साहहत्यकार को पाठ्यिम में जगह दी जाय और हकसे छोड़ हदया जाय. पाठ्यिम में जगह बनाने के हलए हकसी रचना ऄथवा रचनाकार में क्या योग्यता होनी चाहहए? क्यों कु छ लोगों को हदनकर, हनराला, नामवर से बड़ा लेखक दूसरा नजर नहीं अता? वे अज भी ओमप्रकाश बाल्मीहक, प्रो. तुलसीराम, तेज हसंह, डॉ. धमथवीर, डॉ. चौथीराम यादव, जयप्रकाश कदथम, ऄनीता भारती, रमहणका गुप्ता, हनमथला पुतुल, हवमल थोराट अहद से क्यों बचना चाहते हैं? क्या पाठ्यिम का कोइ ऄपना चररत्र है या वह पाठ्यिम बनाने वाले के चररत्र पर ही हनभथर है. हहंदी की दहलत धारा साहहत्य में राधावाद, हवष्णुवाद, कलावाद और
भोंथरे माक्सथवाद को एक हसरे से नकारती है क्योंहक साहहत्य में आन ब्राह्मणी मूल्यों का के वल दुरुपयोग हुअ है. जनवादी अलोचक वीरेंर यादव ऄपने अलेख‘ बहुजन समाज और साहहत्य हक मुख्यधारा’ में याद हदलाते हैं की रामहवलास शमाथ जैसे हहंदी के अलोचक‘ रेणु’ हक कृ हतयों को नकारने का दुस्साहस क्यों करते हैं? क्या कारण है हक ऄपनी रचनात्मक मेधा से अमजन के सरोकारों पर हलखने वाला कोइ दहलत, ओबीसी रचनाकार ईनके रडार पर नहीं अ पाता है. वे प्रेमचंद की कहाहनयों, ईपन्यासों में अने वाले ईन बहुजन नायकों की चचाथ ईठाते हैं जो दहलत और बहुजन हैं पर अये वे एक हवशेष हहकारभाव से ही. हनम्न वगथ से अने वाले पात्रों हक रचना करते समय प्रेमचंद हक सावधानी का हजि भी आस अलेख में है. डॉ. मैनेजर पांडे ऄपनी हकताब 9 में हलखते हैं हक परंपरा और पररवतथन में द्वंद्वात्मक सम्बन्ध होता है. पररवतथन की व्याख्या का एक ईद्देश्य नए पररवतथनों को प्रेररत करना और हदशा देना भी होता है. साहहत्य के पररवतथन और हवकास के मूल में समाज का पररवतथन और मूल होता है. आहतहास हनहमथत करने वालों को स्वयं आहतहास ने हनहमथत हकया होता है.
ह ंदी लेखकों की जमहि और उसकम जमहिवमदी नममकरण:
आस ज्ञान- युग का " महाभारत " शस्त्र से नहीं, स्याही से लड़ा जाएगा. तुलसीदास ने ऄपनी हकसी भी रचना में ऄपनी जाहत का ईल्लेख नहीं हकया, लेहकन पेट भर कर जाहतवादी रचनाएं हलखीं. शुरों को ताड़न का ऄहधकारी
बताया. तुलसीदास नहीं बताते हक ईनकी जा ऄहह दूध हपलाए. ऄथाथत हजस प्रकार से सांप
( नीच जाहत वालों) को हशक्षा देने से वे और हलखते हैं हक संत कबीर कहते हैं " जाहत जुल
रहवदास हलखते हैं " कहह रहवदास खलास चम करते हैं औऱ जाहत को बराबर हनशाने पर लेत रहा है हक मेरी कोइ जाहत नहीं है, मैं तो हहंदुस्त न परयौ एहह जाल में? जाहत के जाल में सभी युग प्रवतथक कहव हैं. हहंदी साहहत्य में ईनके न
जाहत का आहतहास हलखा. ऄग्रवालों का आहतह बनाया? ऄपनी जाहत का संगठन बनाया. वैश्य आहतहास हलखना और ऄपनी जाहत का संगठ लोगों में यथोहचत जानकारी का ऄभाव है’ आ वाले की चेतना को‘ हहंदी नवजागरण कहा लेहकन पहश्चमोत्तर प्रान्त में बनी सभाएं आन सब जाहतयों ने ही बनाइ. यहााँ जाहत सभायें ब्राह्मण युग, हद्ववेदी युग, शुक्लोत्तर युग अहद क्या आंहग
अछू ि की हिकमयि:
‘ शम्बूक, एकलव्य और कणथ ऄपनी शारीररक मानहसक वध हकया गया हक ईनके ई ईनका सम्मान हछनता था. ईनके उपर अने क ऄवसरों पर‘ प्रवेश-हनषेध’ की तहख्तयां लगी
ही धमथ और श्रम को पूजा समझने वाले एक ब्र बीच हववाह संबंधों की रेहडकल परंपरा शुरू क करना पड़ा. ईसने हनचली जाहतयों में से जो वी दहलतों के हखलाफ प्रथम अिामक पंहक्त की करनी पड़ी क्योंहक ईसकी अवाज को ऄनसुन आस पद के माध्यम से हम हाहसये के एक बड़े स
हमनी के आनरा के हनहगचे न
10 यस्साकशी, वीयबायत तरवाय, ऩृष्ठ १२३
8 हहॊदी साहहत्म का इततहास, आर्ामड याभर्ॊर शुक्र, ऩृष्ठ ६३
9 साहहत्म औय इततहास दृष्ष्ि, भैनेजय ऩाॊर्े, वाणी प्रकाशन, बूमभका
11 यस्साकशी, वीयबायत तरवाय, ऩृष्ठ १३५ 12 यस्साकशी, वीयबायत तरवाय, ऩृष्ठ २३५
Vol. 2, issue 14, April 2016. वर्ष 2, अंक 14, अप्रैल 2016. Vol. 2, issue 14, April 2016.