Jankriti International Magazine vol1, issue 14, April 2016 | Page 94

जनकृ ति अंिरराष्ट्रीय पतिका / Jankriti International Magazine( बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की 125वीं जयंिी पर समतपिि अंक)
ISSN 2454-2725
जनकृ ति अंिरराष्ट्रीय पतिक
( बाबा साहब डॉ. भीमराव अ
ऄसमनाता है. ईसको अज के पररदृश्य में समझना बहुत जरुरी है. साथ ही यह भी समझना जरुरी है हक डॉ. अंबेडकर को हकन पररहस्थयों ने बनाया. वे हकससे प्रेरणा प्राप्त करते रहे. ईनके आतने हवराट व्यहक्तत्व में और हकन लोगों क व्यहक्तत्व शाहमल है. एक ऄस्पृश्य पररवार में जन्म लेने के कारण ईन्हें सारा जीवन नारकीय किों में हबताना पड़ा. ईस समय एक दहलत के रूप में जन्म लेना पशु होने से भी नीच कमथ था. ऄस्पृश्यता के कारण एक पशु तो तालाब का पानी पी सकता था पर एक दहलत नहीं. बाबासाहेब अंबेडकर ने ऄपना सारा जीवन हहंदू धमथ की चतुवणथ प्रणाली और भारतीय समाज में सवथव्याहपत जाहत व्यवस्था के हवरुि संघषथ में हबता हदया. चाहे समाज हो चाहे साहहत्य ईनका समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का सपना नहीं पूरा हो पाया. मुहक्तबोध ऄपनी पुस्तक‘ मध्ययुगीन भहक्त अन्दोलन का एक पहलू’ में हलखते हैं हक‘ हकसी भी साहहत्य को हमें तीन दृहियों से देखना चाहहए. एक तो यह हक वह हकन सामाहजक और मनोवैज्ञाहनक शहक्तयों से ईत्पन्न है ऄथाथत वह हकन शहक्तयों के कायों का पररणाम है. हकन सामाहजक, संस्कृ त हियाओं का पररणाम है. दूसरा आसका ऄंतस्वथरूप क्या है? हकन प्रेरणाओं और भावनाओं ने ईसके अंतररक शब्द हनरुहपत हकये हैं. तीसरे ईसके प्रभाव क्या हैं? हकन सामाहजक शहक्तयों ने ईसका सदुपयोग या दुरुपयोग हकया है और क्यों? साधारण जन के हकन मानहसक तत्वों को ईसने हवकहसत या नि हकया है? 1 अज के हहंदी साहहत्य हमें आसी नजररये से देखने की महती जरूरत है.
ह ंदी-समह त्य और इहि मस दृहि:
राजेन्र यादव ने हलखा है हक सत्रहवी-ऄठारहवी ईपहनवेश बनाने की शताब्दी थी, ईन्नीसवीं ईसके वैचाररक हवस्तार की. बीसवीं आस मानहसक, भौगोहलक ईपहनवेशों को तोड़ने की. आक्कीसवीं सदी सूचना साम्राज्यवाद की सदी है हजसमें हवचार सूचना में बदल चुका है. ऐसी सूचना हजससे लड़ा नहीं जा सकता, के वल स्वीकार हकया जा सकता है. 2 जाहत के अवरण में वाद ने हर तरफ घेरा डाला हुअ है. हफर चाहे अचायथ रामचंर शुक्ल हों, अचायथ हद्ववेदी हो, रामहवलास शमाथ हों, नामवर हों या चौथीराम यादव. सभी अलोचकों पर ईनकी जाहत हावी होती हदखाइ देती है. वस्तुतः जाहत को नकारने वाला सबसे ऄहधक जाहतवाद फै लाता है. वह भ्रम का ऐसा संजाल फै लाता है हक जाहत का कोइ ऄहस्तत्व नहीं है पर वह ऄपना सारा खेला ईसी जाहत को संज्ञान रखकर खेलता है.‘ मैनेजर पांडे हलखते हैं हक‘ साहहत्य का ऄहस्तत्व समाज से ऄलग नहीं होता है. आसहलए साहहत्य का हवकास समाज से काटकर नहीं हो सकता. साहहत्य सामाहजक रचना है. साहहत्यकार की की रचनाशील चेतना ईसके सामाहजक ऄहस्तत्व से हनहमथत होती है. साहहहत्यक कमथ की पूरी प्रहिया सामहजक व्यवहार का ही एक हवहशष्ठ रूप है. आसहलए साहहत्य का आहतहास समाज के आहतहास से ऄनेक रूपों में जुड़ा हुअ होता है. 3 साहहत्य का मूल्यांकन करने पर आसके हवपरीत हस्थहतयां हमलती हैं. नामवर हसंह ऄपने एक हनबंध में हलखते हैं हक‘ आहतहास हलखने की ओर कोइ जाहत तभी प्रवृत्त होती है जब ईसका ध् यान ऄपने आहतहास के हनमाथण की ओर जाता है. यह बात साहहत् य के बारे में ईतनी ही सच है हजतनी जीवन के. हहंदी में अज आहतहास हलखने के हलए यहद हवशेष ईत् साह हदखाइ पड़ रहा है तो यही समझा जाएगा हक स् वराज् य-प्राहप्त के बाद सारा भारत हजस प्रकार सभी क्षेत्रों में आहतहास-हनमाथण के हलए अकु ल है ईसी प्रकार हहंदी के हवद्वान एवं
साहहत् यकार भी ऄपना ऐहतहाहसक दाहयत् व ह अफ वैल्यूज’ को कायम करने की बात है. हह ईनमें ब्राह्मणवाद का वचथस्व होने के कारण ऄ शुक्ल हजस कहव या रचनाकार का नाम ईल्लेख के रचनाकारों को ऄहधक तरजीह देते हैं और चलते हैं. हहंदी का यहीं आहतहास ग्रन्थ जो ज
अधार बनाकर हलखे गए हैं. आस आहतहास ग्रन् हजलों और हबहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान के क
हहंदी जो राष्रभाषा होने का दावा क सकती है. समय के साथ आनकी पड़ताल होनी हवकास ' प्रकाहशत हुअ तो ऄनेक लोगों क हद्ववेदीजी के गौरव के ऄनुकू ल नहीं है, वैसे जानते हुए भी हक आहतहास घोहषत रूप से छ साहहहत्यक बोध की नवीनता एवं सीमा की ओ देखने की कोहशश नहीं की हक दोनों आहतहास मूल् यांकन में कहााँ-कहााँ ऄंतर अ गया है! 5 हह हस्थहतयां बहुत साफ़ नजर अती हैं. हहन्दी अचायथ रामचन्र शुक्ल ने हहंदी साहहत्य का आ कहीं कहीं गोत्र का भी.
अज भी हहंदी में पुराने और बड़े सा संबोधन जोड़ने की प्रथा चलती है. यहााँ कहव की आन जाहतसभाओं का आहतहास हसलहसलेव लड़कों की हशक्षा जैसे मुद्दों को छोड़कर ब्राह्म हकया. 6 जातीय द्वेष के एक मामले में अचायथ ओर हम ध्यान हदलाना अवश्यक समझते ह हनरोध, भीतरी चिों और नाहदयों की हस्थहत दशाओं से ईनका कोइ सम्बन्ध नहीं. ऄतः वे श कहव तुलसी, जायसी में यही सब तत्व मौजूद ह हकसी को ब्राह्मण बनाए रखना चाहती है. य रामचन्र शुक्ल कबीर के बारे में हलखते हैं हक
4 हहॊदी-साहहत्म के इततहास ऩय ऩुनर्वडर्ाय, नाभव
1 उधृत- पायवर्ड प्रेस, फहुजन साहहत्म वार्षडकी-२०१३, ऩृष्ठ 39
2 साॊस्कृ ततक भोर्ाडफॊदी का इततहास, याजेन्द्र मादव, बूमभका
3 साहहत्म औय इततहास दृष्ष्ि, भैनेजय ऩाॊर्े, वाणी प्रकाशन, बूमभका
5 हहॊदी-साहहत्म के इततहास ऩय ऩुनर्वडर्ाय, नाभव
6 यस्साकशी, वीयबायत तरवाय, ऩृष्ठ २३६
7 हहॊदी साहहत्म का इततहास, आर्ामड याभर्ॊर शुक्र
Vol. 2, issue 14, April 2016. वर्ष 2, अंक 14, अप्रैल 2016. Vol. 2, issue 14, April 2016.