Jankriti International Magazine vol1, issue 14, April 2016 | Page 91

जनकृ ति अंिरराष्ट्रीय पतिका / Jankriti International Magazine( बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की 125वीं जयंिी पर समतपिि अंक)
ISSN 2454-2725
जनकृ ति अंिरराष्ट्रीय पतिक
( बाबा साहब डॉ. भीमराव
में गोमहा, भाद्र में जानताड, ऄवश्वन में दांसाय, कावतणक में सोहराय बोंगा, पौष में सकरात यामकर पिण का अयोजन होता है । संतालो के भी ऄपने ऄलग लोक गीत ि कथाएं है ।
‘ कोल’ भारत की प्राचीनतम जनजावत है । यह द्राविड जावतयों में प्रमुख है ।’ कोलों के धावमणक और संेास्काररक विश्वासों पर वहन्दुत्ि का प्रभाि स्पष्टतः पररलवक्षत होता है । कोलों के लोकगीतों में श्रीराम के सैकडो वनदेि विद्यमान है । कोल श्रीराम के वनष्ठािान भि हैं । ईनके ऄलािा हनुमान, श्रीकृ ष्ट्ण, विि पािणती और आन्द्र की भी ईनके द्वारा पूजा की जाती है ।’ 4 यह धावमणक विश्वास ईनके लोकगीतों में भी वदखाइ देता है । वििाह के समय यह हनुमान जी के बल का स्मरण करते हुए आस प्रकार के गीत गाते है-
’’ ऊाँ ची पहररया माां ह ांहा गरजै जै े गरजे हनुमान जै े गरज के हनकरे राम पुतवा हबहन जावै काहे का ठप ी ीरा, जबाइन काहे का बेलहरी पान काहे का ठपके-मलयाहगरर चन्दन काहें का श्री भगवान हनबहे का ठप ी ीरा जवाइन पुतरै का बैजहरी पान मथवा का ठपतै मलयाहगरर चन्दन पूजै का श्री भगवान ।’’ 5
भवि भाि तथा धमण आनके जीिन में घुले हुये है । भारतीय संस्कु वत में पूजा धमण अवद को जीिन का महात्िपूणण ऄंग माना गया है । जनजातीय समाज भी ईससे ऄछू ता नही है । धमण के साथ ही आनमें वििाहा अवद संेास्कृ वतक कायणक्रमों में लोकगीत गाये जाने का ररिाज है । रीवत-ररिाज के ऄनुसार गाया जाने िाला एक लोकगीत है-
’’ माटी के चूल्हा बनावे नाहीं, जनतू हक मोर रचे ब्याह । महटया का चूल्हा बनावे मोरी माया, हजन मोरे रचे ब्याह । महटया के चूल्हा बनावे मोरी बुआ, हजन मोरे रचे ब्याह । महटया का चूल्हा बनावे मोरी बहहनी, हजन मोरे रचे ब्याह माटी का चूल्हा बनावें नाहीं, जनतू हक मोरे रचे ब्याह’। 6
यह वििाह के ऄिसर पर गाया जाने िाला गीत है । वििाह के पूिण िधू के घर में हषोकलास के साथ दूकहा बनाये जाने की परम्परा है । आस ऄिसर पर जब कोल वियां चूकहा बनाने के वलये वमट्टी लेने जाती है तब आस प्रकार के गीत गाती है । आसके साथ ही वििाह के ऄिसर पर बारात का स्िागत गाली गाकर वकया जाता है । आस गावलयों में हास-पररहास, ताने, व्यंग्य अवद की ऄवधकता रहती है । स्िागत-बारात के ईपरान्त भी आनका ईलाहना देने का
कायण समाप्त नही होता । जब बारात द्वारा रावत्र जाते है । जैसे-
’ ूखा क तुम ख भूखा क तुम ख अपनी माता का प के दूध भात ांग ख अपनी बहहनी का के ाग ब्जी
बात यहीं समाप्त नहीं होती हैं । कोल पर कटाक्ष करती है तथा ऄन्य पुरूष से ईनक पररहास से युि होती है । द्वार पर बारात ि ि
‘ मैं तो े पूछो दूल् दूल्हा के माता हछ मैं तो े पूछो दूल्ह दूल्हा के माता हछ मैं तो ो पूछो दूल्ह दूल्हा की माता हछ मैं तो े पूछो दूल्ह दूल्हा के माता हछ
जन्म से लेकर मृत्यु तक चलने िाल जनजावतयों में खाने, पहनने, नाचने, गाने, परम्पराओं के ऄनुसार प्रचवलत लोकगीत गा
’ थारू’ ईिर-प्रदेि की प्रमुख जनज है । आनके यहााँ जन्म से लेकर मृत्यु तक गाये ज िैिावहक गीत, विदाइ गीत, गौना गीत अवद की पूजा अवद के वलए विविध गीत गाये ज होता है वजनमें श्रीराम, हनुमान, विि, पाि है एक गीत ईकलेखनीय है-
’ ोन कहह टक्का
चलो ही हिव फु ल ोने कहह टक्का
Vol. 2, issue 14, April 2016. वर्ष 2, अंक 14, अप्रैल 2016.
Vol. 2, issue 14, April 2016.