Jankriti International Magazine / जनकृ सत अंतरराष्ट्रीय पसिका ISSN: 2454-2725
है । हमारी बड़ी बेटी की शादी अग्रवाल लड़के के साथ हुई है, और हमारे घर में जो बहू आई है, वह पंजाबी खत्री है ।” 13( वही, पृ. 208) पर कहानी के दमलत पात्र की खुश्फ़ै मी बहुत जल्द ही ध्वस्त हो जाती है, जब उसकी और कन्या के प्रगमतशील(?) मपता की देश के हालात और उसकी राजनीमत पर चच ा होती है । जैसे ही वह दमलत जामतयों और उसके राजनीमतक दल के उभरने की बात कहता है, कन्या के मपता को उसकी जामत और उसकी तरफदारी का आभास हो जाता है । कन्या के मपता की मध्यवगीय प्रगमतशीलता के मध्य कु ं डली मारे सुप्त जामतवादी घृिा सतह पर आ जाती है । उसका अपनी कन्या से यह कहना –“ वह सब तो ठीक है मक हम जामत – पामत को नहीं मानते और हमने मैरीमोमनयल में‘ नो बार’ छपवाया था, लेमकन मफर भी कु छ चीजें देखनी ही होती हैं । आमखर नो‘ बार’ का वह मतलब तो नहीं मक मकसी चमार – चुहड़े के साथ...।” 14( वही, पृ. 215) कहना न होगा मक छद्म प्रगसतिीलता की आड़ में सछपी यह िुप्त घृणा िामासजक आसथकक लोकतन्द्ि की सदिा में एक बड़ी बाधा है ।
यहाँ इस संदभा में यह उल्लेख करना अप्रासांमगक न होगा मक िामासजक – आसथकक लोकतन्द्ि का िमाज में िुसचसन्द्तत ढंग िे स्थासपत न होने का एक कारण दसलत िसक्तयों का गुमराह होना भी है । इसमें दो राय नहीं है मक दमलत जमतयों की समक्रय समामजकता का ही प्रमतफलन है दमलत राजनीमतक दलों का उभरना । पर दमलत राजनीमतक शमक्त का सही उपयोग सामामजक – आमथाक लोकतन्त्र की प्रमतष्ठा में ही है । िामासजक पररितकन की िसदच्छा की अिहेलना करने िाली दसलत ित्ा दसलतों के सकिी काम की नहीं है । राजनीसतक िसक्त का प्रयोग िामासजक न्द्याय ि उयपीड़न के सखलार् न हो तो उिकी िांसतकाररता कपू कर की भांसत
गायब हो जाती है । ऐसे ्टसेांत भारतीय राजनीमतक जीवन में हैं । जहाँ हम देख चुके हैं मक मसफा सत्ता में बने रहने की उच्चाकांक्षा दमलत राजनीमतक शमक्त को अधोपतन में धके ल देने को संभव हुई है । कहने का तात्पया यह है मक दमलत संवेदनाओं को गुमराह करने की पररिमत भयानक है । कभी‘ मतलक तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार’ कहने वाली दमलत राजनीमतक शमक्त के वल सत्ता में बने रहने की मज़द में जब यह कहने की आतुरता और चालाकी मदखाती है मक‘ हाथी नहीं गिेश है, िह्मा, मवष्ट्िु, महेश है’ तो उसका मूल उद्देश्य ही ओझल हो जाता है । ऐसा कहने – करने के साथ ही दमलत जमतयों की राजनीमतक शमक्तमत्ता सामामजक आमथाक लोकतन्त्र को स्थामपत करने के मखलाफ चली जाती है । कहना न होगा मक वह मजन लोगो का उद्धार या सेवा करने के नाम पर राजनीमत करती है, वह उसी को गुमराह करती है । जो दमलत मवमशा या आंदोलन की अवधारिा के ठीक उलट है । इसी तरह भीमशमक्त और मशवशमक्त का गँठजोड़ खतरनाक है । जहाँ वाल्मीमक को दमलत नेता या भगवान बताते हुए प्रकरान्तर से उग्र महंदुत्ववाद का प्रछन्न एजेंडा साधने की चेसेा होती है । दमलत जन – जीवन को समझने की जरूरत है मक इस तरह का प्रयास के वल सामामजक आमथाक लोकतन्त्र को धमकयाने की सामजश है, और कु छ नहीं । इस समूचे प्रसंग को हम सूरजपाल चौहान की कहानी‘ बहुरूमपया’ में भली – भांमत देख सकते हैं । आलोच्य कहानी में यह स्पसे देखने को ममलता है मक दमलत आंदोलन को कु ं द करने हेतु अंबेडकर के क्रांमतकारी मवचारों को गलत ठहराने की सामजश होती है । और यह सब दमलतों को बांटकर मकया जाता है । वाल्मीमक को भगवान बताकर । उसका मंमदर स्थामपत कर । दमलतों को भजन-कीतान की ओर मोड़कर गुमराह करकर –“ तू मकसी चमार का दीखै,
Vol. 3, issue 27-29, July-September 2017. वर्ष 3, अंक 27-29 जुलाई-सितंबर 2017