Jankriti International Magazine Jankriti Issue 27-29, july-spetember 2017 | Página 391

Jankriti International Magazine / जनकृ सत अंतरराष्ट्रीय पसिका ISSN: 2454-2725
( वही, पृ. 155)‘ सलाम’ कहानी ग्रामीि जीवन में व्याप्त सविा- दमलत के सामामजक सम्बन्ध को माममाक ढंग से व्यक्त करती है ।‘ िलाम’ कहानी में सजि गाँि पररिेि और िामासजक िंरचना का सज़ि है, िहाँ लोकतासन्द्िक िंिेदना का पूरा अभाि है । िहाँ लोकतन्द्ि की मूल सनष्ठा- िमानता की भािना पूरी तरह नदारद है । आलोच्य कहानी में गाँव के सामामजक व्यवहार परक संबंध में जामत का मुद्दा मकतना अहम और सवोपरर है, उसे कमल और चायवाले या कमल या गाँव के सींमकया पहलवान रामपाल रांघड़ के समूचे प्रसंग में देखा जा सकता है । जहाँ प्रथम तो चायवाले से यह पूछने पर मक चाय ममलेगी एक सहज आश्वासन ममलता है- ममलेगी । पर ज्योंही, यह रहस्य खुलता है मक कमल एक दमलत के घर आया बाराती है- चायवाले का व्यवहार तुरंत बदल जाता है –“... ये सहर नहीं गाँव है, यहाँ चूहड़े-चमारों को मेरी दुकान में तो चाय ना ममलती, कहीं और जाके मपयो ।” 11( वही, पृ. 149) िषों बीत जाने के बाद भी ग्रामीण जीिन में व्यसक्त की पहचान एकमाि उिकी जासत िे होना हमारे उि दंभ को किघरे में खड़ा करता है सजििे पररचासलत हो हम मानिीय िभ्यता के कई पड़ाि पार कर लेने की बात अक्िर कहते हैं । आलोच्य कहानी का कमल उपाध्याय, जो एक गैर दमलत होकर दमलत( हरीश) की शादी में जाता है( बाराती होकर), उसके साथ ग्रामीि समाज जैसा वरताव करता है, वह इस बात का संके तक है मक तमाम ग्रामीि मवकास का दावा मकतना खोंखला है । दरअिल, िच्चाई यह है सक ग्रामीण िमाज की सिकाि – प्रसिया में िामासजक और आसथकक लोकतन्द्ि स्थासपत करने की कोई पहल ही नहीं हुई है ––“... ये सहर नहीं गाँव है, यहाँ चूहड़े-चमारों को मेरी दुकान में तो
चाय ना ममलती, कहीं और जाके मपयो ।... –“ ओ, सहरी ज़नख़े हम तेरे भाई हैं? – साले जबान मसभाल के बोल, नहीं तो डांडा दाल के उलट दू ंगा । जाके जुम्मन चूहड़े से ररश्ता बिा” 12( वही, पृ. 149-150)
स्ितन्द्िता के िषों बाद भी जासतगत भेद – भाि का सकला ध्िस्त नहीं हुआ है, क्योंसक िंिदीय या राजनीसतक लोकतन्द्ि को िामासजक और आसथकक लोकतन्द्ि िे अलगाकर देखने की िदा चेिा हुई है । कहना न होगा मक ग्रामीि समाज में जामतगत भेद-भाव और घृिा जहाँ अपने प्रकट रूप में हैं, वहीं वह शहरी जीवन में सुप्त और छद्म रूप में है । इस संदभा में जयप्रकाश कदाम की कहानी‘ नो बार’ का मज़क्र करना स्वाभामवक प्रतीत होता है । आलोच्य कहानी यह दश ाती है मक मध्यिगीय प्रगसतिीलता के मध्य िुप्त जासतिादी घृणा का िोता चुपचाप कै िे बहा करता है । आलोच्य कहानी के कें द्र में उच्च मशक्षा प्राप्त नौकरीशुदा एक दमलत है । वह अखबार के मैरीमोमनयल पेज में एक मवज्ञापन देखता है, जो एक मशमक्षत प्रगमतशील पररवार द्वारा अपनी कन्या के मववाह के मलए मदया गया होता है । जहाँ, जामत के मलए‘ नो बार’ मलखा रहता है । कहानी का दमलत पात्र खुश होता है मक समाज बदल रहा है । सामामजक व्यवस्था में जामतवाद मनरस्त हो रहा है । समाज एक नयी प्रगमतशील राह पर है । वह इस खुशफ़ै मी में इस कारि ही अपने मपता को इस बात के मलए बरजता है मक जब कन्या पक्ष जामत की बात नहीं करना चाहता है तो खुद – ब- खुद इस मुद्दे को उठाना अपनी रूमढ़वादी मानमसकता को जामहर करना होगा । क्योंमक, कन्या के मपता से हुई बातचीत में वह देख-सुन चुका होता है मक उसका पररवार अन्तजाातीय मववाह को समथान देता है –“ हमारे पररवार में मजतनी भी शामदयाँ हुई हैं, वे सब अन्तजाातीय हुई हैं । अब देखो, मैं िाह्मि हूँ और मेरी पत्नी कायस्थ पररवार से
Vol. 3, issue 27-29, July-September 2017. वर्ष 3, अंक 27-29 जुलाई-सितंबर 2017