Jankriti International Magazine / जनकृ सत अंतरराष्ट्रीय पसिका ISSN: 2454-2725
से इनकार करता है । जब बोधन के बेटे भोजराज जैसे युवकों का दल समदयों से चली आ रही ररवायतों के नाम पर दमलत समाज के साथ अपमान पूिा व्यवहार की मखलाफत करने को तैयार होता है । उस वक़्त, गाँव के सविों की भार्षा और उसमें मलपटी घृिा स्पसे उजागर होती है –“ क्यों रे कमीन, तू इतनो नकचढ़ है गओ... दाऊ के बुलावे पे उनकी चौपाल पे नई ंगओ?... गाँव में रहवे है की नई... ं बोल! जा, सीधी तरह से नगमड़या उठा के ला … अपनी जानी को बुला – मोंड़ा की बहू कोऊ बुला... हम मबन के संग होरी खेलेंगे... वे हमए सामने नाचेंगी … नंगी नाचेंगी... हम मबन के गाल से गुलाल लगायेंगे... गाल नोचेंगे...।” 8( वही, पृ. 101-102) गाँव की सविा जमतयों का नेता रघुवीर और उसका मगरोह भोजराज और बोधन के पररवार की मस्त्रयों का जब मतरस्कार करता है तो भोजरज उसका प्रमतवाद करता है । पर इस प्रमतवाद में उसके प्राि चले जाते हैं । तलवार के एक वार से ही वह कटे पेड़ की तरह धरती पर मगर पड़ता है । रघुवीर अपने मगरोह के साथ होली खेलने की आड़ में दमलत बस्ती में खूनी खेल खेलता है । मस्त्रयों की इज्ज़त लूटने से लेकर आगजनी तक । बोधन अपने बेटे का कटा सर और चारों तरफ पसरा खूनी मंज़र देखता है तो काँप उठता है । कहानी का अंत इस मबंदु पर होता है मक पुरानी पीढ़ी का बोधन अपनी परंपरागत समझौता परस्ती वाली छमव के उलट प्रमतवाद व्यक्त करता है । िह उि भेदभाि पूणक िमाज की सखलार्त करता है जो सकिी एक िगक को सनयंता बनाए रखने के छल-छद्म को िभ्यता और िंस्कार कहता है । बोधन का अपने बेटे का कटा सर हाथ में लेने के बाद उसके समक्ष अपनी नगमड़या बजाना गंभीर मनहाताथा मलए रहता है । वह उसका वह प्रमतकार होता है, मजसे वह वह सरपंच आमद सविा समुदाय के प्रमत व्यक्त करता है –
“ तू रोज – रोज कहते रओ मक मैं अपने दरवाज़जे पे बैठके नगमड़या क्यों न बजात हों! लै, सुन, आज मैं अपयें दरवाज़जे पे नगमड़या बाजा रओ हों? तू ध्यान दै के सुमनए, मेए लाल, आज ऐसी नगमड़या बजौंगों जैसी कबहुँ नई बजाई । और वह सच में डूबकर बजाने लगा ।” 9( वही, पृ. 103) कहना न होगा मक यह िब कु छ हमारी िामासजक िंरचना में िामासजक और आसथकक लोकतन्द्ि के अभाि का ही प्रसतर्लन है, सजिे राजनीसतक लोकतन्द्ि के िाथ अंतभु कक्त कर देखने की जरूरत है, सििेषकर सिकािमूलक कायकिमों को लागू करने की िसदच्छाओं के िक़्त ।
ओमप्रकाश वाल्मीमक की कहानी‘ सलाम’( 1991) भी इस संदभा में अवलोकनीय है । आलोच्य कहानी में भी सलाम के रूप में एक अलोकतांमत्रक ररवायत का मज़क्र है, जो सामामजक व्यवस्था में व्याप्त जामतगत भेद – भाव के घृिामूलक व्यवहार को उजागर करती है । सलाम प्रथा के अनुसार नव मववामहत दमलत जोड़े को सविों के द्वारे- द्वारे घूमने का काया सम्पन्न करना होता है । मजसके बदले में उन्हें नेग मदया जाता है । दरअसल, इस ररवायत की आड़ में सविा जामतयों के श्रेष्ठता के दंभ को समाज में बनाए रखने की एक चालाकी होती है ।‘ िलाम’ दसलत चेतना की कालजयी कहानी इिसलए भी है सक इिमें कहानीकार ने हरीि जैिे पाि को उि िाहसिक कृ यय को करते हुए सदखाया है, जो दसलत सिमिक का मूल स्िर है, जासतगत भेदभाि को ध्िस्त करते हुए पररितकन कामी चेतना को व्यक्त करना । हरीश का सलाम पे न जाने का संकल्प समूचे गाँव में हलचल पैदा करता है- –“ दोपहर होते – होते बात पूरे गाँव में फ़े ल गयी ।... ऐसा लग रहा था जैसे जोहड़ के पानी में मकसी ने कं कड़ फें क मदये हों गोल – गोल लहरें घूमकर मकनारों तक फ़े ल गई थीं ।” 10
Vol. 3, issue 27-29, July-September 2017. वर्ष 3, अंक 27-29 जुलाई-सितंबर 2017