Jankriti International Magazine/ जनकृसत अंतरराष्ट्रीय पसिका
तभी इतनी देर सू चमार –राग अलापे जा रहौ है , अर
महा-म र ू ख, हमरे ग रु ु तो भगवान महमर्षा वाल्मीमक
स्वामी हैं , हमे अ ब ं ेडकर से का लेनो –देनो, बंद कर
अपनी यू बकवास ।”15(चौहान, स र ू जपाल, नया
िाह्मि, वािी प्रकाशन, प्रथम संस्करि, 2009, पृ.
24) कहने की जरूरत नहीं है मक दमलत जनजीवन
और आन्दोलन को इस मदशाहीनता से बचने की
जरूरत है , मजसकी ओर कहानीकार ने साफ इशारा
मकया है । तभी दमलत मवमशा अपने उद्देश्य की ओर
अग्रसर हो सके गा और अपनी पररवतानकामी
समदच्छा मलए एक नए जामतम क्त
समाज को गढ़ने की
ओर उन्म ख
हो सके गा, जो लोकतन्त्र की म ल
संव द े ना
है । हम सहज ही देख सकते हैं मक इन दसलत जीिन
–िंदभक की कहासनयों में दसलतों की व्यथा,
यातना, चेतना, और मुसक्तकामी िंघषक का अंकन
िमकालीन सहन्द्दी कहानी लेखन को एक नयी
सदिा की ओर ले जाता है ।
ISSN: 2454-2725
िहायक प्राध्यापक, सहन्द्दी सिभाग,
कासलयागंज कॉलेज
पो. कासलयागंज , सजला, उत्र सदनाजपुर ,
पसिम ब ग ं ाल
सपन.733129 मो. 09474439158
ईमेल- shawdhananjay10@gmail.com
समग्रता में कहा जाय तो समकालीन महन्दी कहामनयों
में व्यक्त दमलत मवमशा का स्वर एक नए समाज को
गढ़ने की ओर प्रमतबद्ध मदखाई देता है , जहा
राजनीमतक लोकतन्त्र को सामामजक –आमथाक
लोकतामन्त्रक समदच्छा के साथ स प ं क्त
कर देखने की
पहल मदखाई देती है । द स ू रे अथों में कहा जाय तो इन
कहामनयों में इस बात का साफ स क
े त ममलता है मक
राजनीमतक लोकतामन्त्रक समदच्छा को लागू करने क
पहले सामामजक आमथाक भेदभाव प ि ू ा ररवायतों,
मान्यताओ , ं संस्कारों , और ढंभप ि ू ा चालामकयों को
आगे ध्वस्त करना होगा, तभी लोकतन्त्र की म ल
संव द े ना - मन ष्ट् ु यता के धरातल पर सब समान-
स्थामपत हो सके गी ।
डॉ. धनंजय कुमार िाि
Vol. 3 , issue 27-29, July-September 2017.
वर्ष 3, अंक 27-29 जुलाई-सित ब ं र 2017