दक्षिण भारत में दलित आंदोलन की शुरूआत अचछे व्यवसा्यी परिवार मे जनमे रामासवामी ना्यकर पेरर्यार के द्ारा की गई, जिनहे हम पेरर्यार के नाम से जानते है, जिनहोने ्यह देखा कि ब्ाहमण, दलितों का शोषण करते है और उनहे नारकी्य जीवन जीने पर मजबूर करते है । उनहोने अपने राजनैतिक जीवन कि शुरूआत कांग्ेस के साथ की तथा शीघ्र ही
उनहोने कांग्ेस का साथ छोड़ वद्या क्योंकि उनके लक््य कांग्ेस से कई उच्च सतर के थे । सवतंत्ता से पूर्व 1930 मे ही उनहोंने कह वद्या था, भारत मे समाजवादी गणतंत् होना चिावह्ये, जिसकी घोषणा आजादी के बाद जवाहर नेहरू ने की । उनहोंने देखा की एक मात् हिनदू धर्म मे ही लोगो को ऊच्च-निम्न जाति मे बांटिा ग्या है और उनका शारिरीक, मानसिक और सामाजिक शोषण वक्या जाता है ।
पेरर्यार ने आजादी के बाद कहा कि सवतंत्ता 3 प्रतिशत ब्ह्मण हुए है, 97 प्रतिशत गैर
-ब्ाह्मण तो आज भी गुलाम है, जिनहे सामाजिक अपमान झेलना पड़ रहा है । इसके लिए पांचि बाते अपने संदेश मे कही-ई्वर की समाशपत, धर्म की समाशपत, कांग्ेस का बवह्कार, ब्ाह्मण का बवह्कार, उनका ही संदेश था, जिसके कारण तमिलनाडु विधानसभा मे सभी सदस्यों ने ई्वर के नाम पर शपथ नही ली, तथा उनकी ही प्रेरणा मे तमिलनाडु सरकार ने एक आदेश
जारी वक्या, जिसमे कहा ग्या कि, सरकारी का्या्षल्यों मे देवी देवताओं की तसवीर ना लगाई जा्ये ।
दक्षिण भारत मे उनका आंदोलन दलितों को राजनैतिक व सामाजिक अधिकार दिलाने मे सफल रहा, जिसमे तमिलनाडु, कना्षटिक, केरल, आनध्प्रदेश, जबकि उत्र भारत पीछे रह ग्या, क्योंकि उत्र भारत मे कोई पेरर्यार ्या डलॉ. आंबेडकर की तरह सर्वमान्य नेता नही मिल पा्या । उत्र भारत दलित आंदोलन का नेतृतव सामनतवावद्यों के द्ारा ही वक्या ग्या और दलित
आंदोलन कांग्ेस के इर्द गिर्द ही रहा । उत्र भारत मे सर्वप्रथम दलित आंदोलन की शुरूआत बिहार मे हुई, वहाँ के दलित नेता बाबू जगजीवन राम हुए, जिनहोने धर्म परिवर्तन का विरोध वक्या, उनहोने दलितों को कहा, की दलितों में ही ब्ाह्मण पैदा होने चिावह्ये, जिन मशनदरों मे दलितों को प्रवेश नही वद्या जाता है, उन मंदिरों से दलितों का कोई लेना देना नही है । इनही के प्र्यासो का परिणाम था कि पिछड़ा वर्ग से कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्ी बने । जगजीवन राम के बाद बिहार के दलित नेता बने रामविलास पासवान, उनहोने सभी दलित जावत्यों को एकजुटि करने का प्र्यास वक्या, लेकिन वे सफल नही हुए तथा देश सतर पर सर्वमान्य नेता नही बन पा्ये ।
बिहार के बाद दलित आंदोलन की शुरूआत, उत्र प्रदेश मे हुई, इसकी कमान समभाली, मान्यवर काशीराम ने बाबू जगजीवन के अनत के बाद काशीराम ने आंदोलन की शुरूआत की और पूरे उत्र भारत मे दलित आंदोलन को एक नई दिशा दी । नेहरू के कारण ही दलित, कांग्ेस के साथ थे । जिनके वोटिों से नेहरू ने सत्ा प्रापत की, लेकिन दलितों को हमेशा सत्ा से बाहर रखा । काशीराम ने दलितों को सता का सपना दिखा्या और उसे सचि कर दिखा्या । वो अपने का्य्ष मे इसलिए सफल हुए क्योंकि वो किसी अन्य अखिल भारती्य दल का हिससा नही बने, उनहोंने स्वयं सन् 1984 मे बहुजन समाज पार्टी बना्यी । काशीराम ने उत्र प्रदेश मे मुशसलम गठजोड़ बना्या । ्यही प्र्यास बिहार मे रामविलास पासवान ने वक्या । काशीराम ने दलितों को आतमसममान दिलाने, समतामूलक समाज बनाने, जाति उनमुलन समाज बनाने, विभाजित समाज को जोड़ने तथा पिछड़े अ्पसंख्यकों के साथ होने वाले अत्याचिार को समापत करने के लिए उनहोंने 85 प्रतिशत जनता को साथ वल्या तथा अन्य 15 प्रतिशत के खिलाफ संघर्ष की शुरूआत की, और दलितों मे आतमवव्वास पैदा वक्या, उनहोने समपूण्ष भारत कि ्यात्ा 6 दिसमबर को कन्याकुमारी से लेकर क्मीर, तमिलनाडू, केरल, आनध् प्रदेश, हरर्याणा, मध्यप्रदेश के महु मे आकर अपनी
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