Jan 2026_DA | Page 19

की स्ापना 19वीं शताबदी के मध्य( लगभग 1860) में हररचिंद ठाकुर ने अविभाजित बंगाल के ओराकांडी( वर्तमान बांगलादेश) में की थी । ्यह एक धर्मसुधार आनदोलन था, जिसका उद्े््य जातिगत भेदभाव को समापत करना और दलितों एवं पिछड़ों को समाज में सममान दिलाना था । जानकारी के अनुसार मतुआ समाज के लोग अठारहवीं शताबदी से हाथ में दंड लेकर चिौकीदार का का्य्ष करते आ रहे हैं और ्यह सिलसिला पश्चिम बंगाल से लेकर बांगलादेश में आज भी जारी है ।
भारत का विभाजन के होने के बाद मतुआ समाज का मुख्य केंद्र पश्चिम बंगाल के उत्री 24 परगना जिले का ठाकुरनगर बन ग्या, वहीं बड़ी संख्या में मतुआ समाज के लोग बांगलादेश में ही बस गए । लेकिन सचि ्यह भी है कि मतुआ समाज का एक बड़ा हिससा विभाजन और 1971 के ्युद्ध के बाद शरणा्जी के रूप में भारत आ्या और पश्चिम बंगाल में बस ग्या । 1947 में बंगाल विभाजन का मतुआ समाज के लोगों पर गहरा प्रभाव पड़ा । नए देश की सीमाओं ने कई परिवारों को विघवटित कर वद्या और उनके घर एवं पूजा स्ल ततकालीन सम्य के पूवजी पाकिसतान में चिले गए ।
विभाजन के बाद भारत आए लाखों लोगों में से अधिकतर राज्य के सीमावतजी वज़लों में बस गए । उनहोंने अपनी संस्कृति और मान्यताओं को बनाए रखते हुए नए समाजों का निर्माण वक्या । प्रमथ रंजन ठाकुर ने ठाकुरनगर नामक कसबे की स्ापना की, जो विस्ावपत मतुआ समाज का न्या आध्याशतमक केंद्र बना ।
मतुआ समाज को बंगाल में शरणा्जी के रूप में देखा जाता है । लंबे सम्य से‘ शरणा्जी’ होने से बेहाल समाज की सबसे बड़ी मांग भारत की स्थायी नागरिकता से जुडी हुई है । केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून के माध्यम से मतुआ समाज के लोगों को राहत देने की कोशिश की है, जिसका विपक्षी दल अपने-अपने हितों के लिए विरोध कर रहे हैं । गत दिसंबर माह में एक रैली को समबोवधत करते हुए प्रधानमंत्ी नरेंद्र मोदी ने घोषणा की है कि वह
हर मतुआ और नामशूद्र परिवार को भरोसा दिलाते हैं कि वह हमेशा उनकी सेवा करेंगे । वह पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्ेस की द्या पर नहीं हैं और उनहें नागरिकता कानून के कारण भारत में सममान के साथ रहने का अधिकार है ।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में मतुआ समाज गहराई से जुड़ा रहा है । सवतंत्ता के बाद प्रमथ
रंजन ठाकुर, उनके निधन के बाद उनकी पत्नी बीणापाणि देवी और वर्तमान में उनके पुत् एवं पौत् ्या फिर आज उनके बेटिे और पोते राजनीतिक मैदान में सवरि्य हैं । वर्तमान में मतुआ समाज की मुख्य मांग नागरिकता संशोधन अवधवन्यम-2019 के वरि्यान्वयन से जुडी हुई है । दशकों पहले भारत आए अनेकों मतुआ परिवारों के पास अपनी नागरिकता सिद्ध करने के लिए आवश्यक कागजात नहीं हैं । इसी कारण
समाज के लोगों में असुरक्षा का भाव बना हुआ है । राजनीतिक रूप से मतुआ समाज किसी सम्य कांग्ेस पार्टी के पीछे खड़ा हुआ था । लेकिन सम्य परिवर्तन के साथ समाज के राजनीतिक ववचिारों में बदलाव आ्या है और अब राजनीतिक समर्थन इस त्थ्य पर निर्भर करता है कि मतुआ समाज की आवश्यकताओं
मतुआ समाज को बंगाल में शरणा्थी के रूप में देखा जाता है । लंबे समय से‘ शरणा्थी’ होने से बेहाल समाज की सबसे बड़ी मांग भारत की स्ायी नागरिकता से जुडी हुई है । केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून के माधयम से मतुआ समाज के लोगों को राहत देने की कोशिश की है, जिसका विपषिी दल अपने-अपने हितों के लिए विरोध कर रहे हैं ।
को पूरा करने के लिए कौन सा राजनीतिक दल सामने आता है । 2014 के बाद भाजपा को मतुआ समुदा्य का समर्थन मिलता आ रहा है । शिक्षा, सवास्थ्य, रोजगार एवं विकास से जुडी अनेकों समस्याओं से ग्सत मतुआ समाज को स्थायी नागरिकता देने की पहल कई जवटिल समस्याओं का समाधान करेगी, इसमें कोई संदेह नहीं है । प्रश्न ्यह भी है कि राज्य की मुख्यमंत्ी ममता बनजजी क्या इसके लिए तै्यार होंगी? �
tuojh 2026 19