Jan 2026_DA | Page 17

हैं ।
पषशचम बंगाल एवं बांगलादेश पर दलित विचारकों की चुपपी
बांगलादेश में अ्पसंख्यक हिनदुओं में अधिकांश दलित है । लेकिन उनकी स्थितियों पर भारत में दलित नेता खुलकर बोलने में परहेज करते हैं । ऐसे में प्रश्न ्यह उठता है कि क्या दलित समाज की जनता सिर्फ सत्ा प्रापत करने के उपकरण के रूप में हैं? दलित समाज पर ्यवद वासतव में ध्यान वद्या जाए तो ्यह कहना कहीं से भी गलत नहीं लगता कि ्यह वह समाज जिसने लगभग आठ सौ सालों तक विदेशी मुशसलम आरिांताओं को झेला, पर समझौता नहीं वक्या । इसके बाद अंग्ेजी शासकों ने दलितों का प्र्योग अपने हितों के वल्या वक्या । जब देश सवतंत् हुआ तो दलितों का भाग्य लिखने का काम कांग्ेस और उसके सह्योवग्यों ने अपने हाथों में ले वल्या । कहने के लिए आरक्षण को एक ऐसे हव््यार के रूप में देखा ग्या था, जिससे दलित अपने भाग्य और सामाजिक शस्वत का वनण्ष्य स्वयं कर सकेंगे और अपने हालात को सुधार कर विकास की मुख्य धारा के साथ कदम से कदम मिलकर चिल पाएंगे । लेकिन ऐसा नहीं हुआ । शिक्षा और अवसरों की कमी ने दलित समाज को राजनीतिक दलों के हाथ
की कठपुतली बना कर रख वद्या । दलित समाज को कभी भी वासतव में समाज की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए गंभीर कदम नहीं उठाए गए और जो कदम उठाए भी गए, वह राजनीति और सवःवहतों की भेंटि चिढ़ गए । दलितों को उन अनेकों अवसरवादी एवं सववहत तक सीमित रहने वाले नेताओं से भी अब होवश्यार रहने की जरुरत है जो उनहें सपने दिखाकर अपने हितों की पूर्ति करते है । ऐसे ही नेता अब दलित-मुशसलम गठजोड़ का न्या राग सुनकर दलितों का फिर से उप्योग करने के अवसर की प्रतीक्षा में हैं । लेकिन बांगलादेश और बंगाल में दलितों के साथ जो भी हो रहा है, वह उन तमाम दलित नेताओं के लिए सबक है, जो दलित-मुशसलम गठजोड़ की वकालत करते आ रहे हैं ।
आगामी चुनाव और दलित
बांगलादेश के आम चिुनाव में क्या होगा और क्या परिणाम? सामने आएंगे, ्यह कहना अभी ज्दबाजी होगी, लेकिन पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चिुनाव में दलित वोटि बैंक अत्यंत महतवपूर्ण हो ग्या है । राज्य में कई ऐसे दल चिुनाव लड़ने की तै्यारी कर रहे हैं, जिनकी
दृष्टि दलितों और मुशसलम वोटि बैंक को एकजुटि करके चिुनावी सफलता हासिल करने की है । इसी लिए मतदाता सूचिी के गहन पुनरीक्षण अवभ्यान( एसआईआर) का राज्य सरकार द्ारा लगातार विरोध करते हुए असह्योग वक्या जा रहा है । असह्योग की आड़ में राज्य की ममता सरकार अपने उस मुशसलम वोटि बैंक को बचिाने की कोशिश में लगी हुई है, जिसमें अधिकांश राज्य में अवैध रूप से रहने वाले बांगलादेशी घुसपैठिएं शामिल हैं ।
राज्य में 27 से 30 प्रतिशत मुशसलम मतदाता हैं । चिुनाव की दृष्टि से ्यह एक बड़ा वोटि बैंक हैं । लगभग सौ से अधिक विधानसभा सीटिों पर मुशसलम वोटि वनणा्ष्यक माना जाता है । इसीलिए ममता बनजजी लगातार नागरिकता संशोधन कानून और एसआईआर का लगातार विरोध कर रही है, जिससे उनका मुशसलम वोटि बैंक बरकरार रह सके । अ्पसंख्यक वोटि बैंक, जो कभी पश्चिम बंगाल में वामपंव््यों का मजबूत आधार था, बाद में तृणमूल के पाले में चिला ग्या और इस वोटि बैंक को बचिाने के लिए राज्य में तुष्टिकरण की राजनीति को पोषित वक्या ग्या ।
2026 में होने वाले विधानसभा चिुनावों में भाजपा का लक््य लगभग दो सौ सीटिें हासिल करने का है और पार्टी इसी दिशा में लगातार अपना काम करते हुए सवरि्य है । बंगाल में भाजपा के तेजी से बढ़ते प्रभाव ने ममता बनजजी के सामने सत्ा बचिाए रखने के लिए जो कड़ी चिुनौती दी है, उसका परिणाम राजनीतिक हिंसा के रूप में देखा जा सकता है । विधानसभा चिुनाव के लिए भाजपा अपनी पूरी तै्यारी में व्यसत है । पार्टी संगठन को बूथ सतर तक मजबूत बना्या जा रहा है । भाजपा के रा्ट्वाद और ममता की तुष्टिकरण की नीति के कारण राज्य में भाजपा की शस्वत बेहतर होती जा रही है । पिछले एक वर्ष के दौरान भाजपा ने जिस तरह से अपना ध्यान राज्य में केंद्रित कर वद्या, उसके बाद उसके जीत के रासते खुल रहे हैं और इसका परिणाम 2026 के विधानसभा चिुनाव में भाजपा को मिलने वाली विज्य के रूप में सभी को अवश्य नजर आएगा । �
tuojh 2026 17