Jan 2026_DA | Page 16

कवर स्टोरी

लिए आरक्षण वक्या ग्या था । अभी तक जिन्ना मुसलमानों को धार्मिक अ्पसंख्यक बताते आए थे । लेकिन 22 माचि्ष 1940 को लाहौर में उनहोंने अपने एक भाषण में पाकिसतान की मांग की और फिर आनन-फानन में 24 माचि्ष 1940 को मुशसलम लीग ने पाकिसतान का संक्प पारित कर वद्या ग्या । मुशसलम लीग का उद्े््य विभाजन और सवतंत्ता थी । पाकिसतान बनाने के लिए जिन्ना ने दलितों को भी अपना मोहरा बना्या और दलितों को भ्रमित करते हुए बड़ी चिालाकी से उनहें ्यह आ्वासन वद्या कि एक हिनदू देश में दलितों का कल्याण संभव नहीं है, इसलिए उनको पाकिसतान आकर मुशसलमों के साथ रहना चिाहिए और इससे दलितों को तमाम समस्याओं
से मुक्त मिल जाएगी ।
जोगेंद्र नाथ मंडल पर भरोसा करके पछताए दलित
डा. आंबेडकर ने जिन्ना के चितुराई भरे राजनीतिक खेल को समझ लिए था । इसीलिए उनहोंने 1945 में अपनी पुसतक ्लॉटि ऑन पाकिसतान में लिखा था कि मुसलमान सामाजिक सुधारों के विरोधी है । इसलाम जिस भाईचिारे की बात करता है, वह संसार के सभी मनुष्यों का भाईचिारा नहीं है । वह केवल मुसलमानों का मुसलमानों से भाईचिारा है । गैर मुसलमानों के लिए वहां केवल घृणा और शत्ुता है । साथ ही
इसलाम किसी भी मुसलमान को ्यह इजाजत नहीं देता कि वह किसी गैर इसलामी देश के प्रति वफादार रहे । ऐसी शस्वत में बेहतर है कि पाकिसतान बनने वद्या जाए, परनतु हिनदू एवं मुशसलम जनसंख्या की पूर्ण अदला-बदली होनी चिाहिए ।
डा. आंबेडकर के ववचिारों के विपरीत जिन्ना द्ारा दिखाए गए सपने को सचि समझने की एक ऐतिहासिक भूल ततकालीन दौर के एक वरर्ठ दलित नेता जोगेंद्र नाथ मंडल ने की । मंडल का उप्योग करके जिन्ना ने दलितों को लुभाने एवं भ्रमित करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी और फिर पूवजी पाकिसतान बनने के बाद लाखों
की संख्या में दलित वर्ग के लोग बंगाल छोड़ कर पूवजी पाकिसतान वर्तमान बांगलादेश में जाकर बस गए । पाकिसतान बनने के बाद कट्टरपंथी मुशसलम नेताओं एवं जनता ने अपना रंग दिखाना शुरू वक्या और दलितों के लिए उनकी जिंदगी अभिशाप बनती चिली गई । दलितों के विरुद्ध होने वाली हिंसा एवं उतपीड़न को देखने और जिन्ना की धोखेबाजी को समझने के बाद जोगेंद्र नाथ मंडल बंटिवारे के तीन वर्ष बाद 1950 में वापस लौटि आए और फिर अपनी ऐतिहासिक भूलों के लिए पश्चाताप करते हुए 5 अक्टूबर 1968 में पश्चिम बंगाल के बनगांव नमक गांव ने अज्ञात व्यक्त के रूप में मृत्यु को प्रापत हुए । दलित समाज ने भी उनकी इस ऐतिहासिक एवं गंभीर भूलों के लिए सामाजिक दणड सवरुप उनकी तरफ आंख उठाकर नहीं देखा । उनकी आसमान को छूने वाली सारी संभावनाएं दलित मुशसलम राजनीतिक गठजोड़ की भेंटि चिढ़ ग्यी, जबकि जिन्ना ने दलितों का उप्योग अपने सपने को पूरा करने के लिए वक्या, जिसका कोई लाभ दलितों को नहीं मिला । बल्क पाकिसतान एवं बांगलादेश में रहने वाले दलित एवं वंवचित मुशसलम प्रताड़ना का शिकार होकर ्या तो धर्म परिवर्तन के लिए बाध्य हो गए और फिर उनहोंने अत्याचिार एवं हिंसा को अपनी किसमत मान वल्या, जिसके दु्परिणाम बार-बार दिखाई देते
16 tuojh 2026