Jan 2026_DA | Página 13

के अधिकांश मामलों में आरोपी मुशसलम समुदा्य के पाए जा रहे हैं । मुशसलम आरोवप्यों की संलिपतता पाए जाने के बाद प्रा्यः प्रशासन का रवैय्या, मामले को किसी तरह निपटिाने और मुशसलम आरोवप्यों के विरुद्ध सखत कदम उठाने से बचिने तक सीमित रह जाता है । कोई मामला जब तूल पकड़ता है, तब ही मुशसलम आरोवप्यों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई होने की संभावना बन पाती है । प्रश्न ्यह उठता है कि दलितों के विरुद्ध मुशसलम समुदा्य सुवन्योजित रूप से हिंसा और उतपीड़न की घटिनाओं को अंजाम क्यों और कैसे दे रहा है? क्या उतपीड़न के पीछे कोई राजनीतिक सवा््ष छिपा हुआ है? ्या फिर दलितों को उतपीवड़त और डरा-धमका कर धर्मानतरण के लिए बाध्य वक्या जा रहा है?
मुशसलम अपरावध्यों से जुड़े मामलों में दलित
समाज के कथित नेताओं, संगठनों एवं बुद्धिजीवव्यों का मौन रहना भी आ्चि्य्ष का ववर्य है । ऐसा लगता है कि दलित उतपीड़न के मामलों में मुशसलमों की संलिपतता में कहीं न कहीं इन सभी की मूक सहमति है । राज्य में कानून व्यवस्ा की जिस तरह धवजि्यां उड़ी हैं, उसके बाद एक पल को लगा कि राज्य में कानून का नहीं जंगल का ही शासन चिल रहा है । हिंसा और उतपीड़न के कारण दलित समाज के लोग दूसरे राज्यों में ्या अन्य स्ान पर जाने के लिए बाध्य हो रहे हैं ।
मुषसलम उतपीड़न झेलने की बेबसी ऐसा लगने लगा है कि ममता सरकार ने
राज्य को आरिामक मुशसलमवावद्यों के हाथों में
सौंप वद्या है और राज्य की दलित जनता मुशसलमों, जिनमें से अधिकांश बांगलादेशी घुसपैठिएं हैं, के उतपीड़न और दमन का शिकार बन रही है । मुशसलम कट्टरता के बढ़ते प्रभाव के बीचि राज्य एक और खूनी विभाजन की ओर अग्सर हो रहा है । 1947 में विभाजन के सम्य राज्य में मुशसलम आबादी 19 प्रतिशत थी, जो साल 2011 में बढ़कर 27 फीसदी हो गई है । राज्य में जिस तरह से मुशसलम आबादी बढ़ी है, उसका नकारातमक परिणाम राज्य की दलित, आदिवासी और पिछड़ी हिनदू आबादी को भुगतना पड़ रहा है । ्यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि राज्य में दलित, वनवासी और पिछड़ी हिनदू आबादी सवतंत्ता से पहले भी उतपीड़न और दमन को झेलने के लिए अभिशपत थी और ्यही हालात वर्तमान में भी हैं । राज्य में सर्वहारा वर्ग
tuojh 2026 13