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्राल से लेकर मध्यकाल के पहले तक स्थायी रूप से असपृशयतरा कभी नहीं थी । डॉ आंबेडकर ने‘ अछूत कौन और कैसे?’ पृष्ठ 49 एवं 50 पर लिखरा है कि-“ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैशय और शूद्र सभी ्रास होते थे । ्रास प्थरा अनुलोम क्रम से थरा । वैसे भी मिराभरारत ्रा वह प््रण जिसमें भगवरान श्री ्कृषण सवयं अतिथियों के भोजन के उपररांत उनके जदू्ठे पत्तल उ्ठराये थे । हिन्दू लोक जीवन में अस्थायी असपृशयतरा ्रा परायरा जरानरा अतयंत सराधरारण बरात है, किनतु स्थायी असपृशयतरा तो अनतयज एवं शदूद्ों के सराथ भी नहीं थरा । कोई वयसकत स्थायी रूप से असपृशय नहीं हो सकतरा है । जब तक कोई वयसकत यरा समदूि किसी ्राय्म यरा परिससथति विशेष में होतरा है, तभी तक उसे असपृशय मरानरा जरातरा हैI शौचरात् के समय वयसकत के सराथ असपृशयतरा की ससथति प्रायः प्तिदिन होती है किनतु स्नानरात् के उपररानत वह असपृशयतरा से मुकत हो जरातरा है । सदूतक ्राल में सम्पूर्ण परिवरार ही दस दिनों तक असपृशय रहतरा है । इसी प्रकार ससत्रयरां अपने मरातस् धर्म ्राल में असपृशय मरानय हैं, किनतु एक तनसशचत समयरावधि एवं उसके उपररांत वह धमरा्मत् अनुष्ठरान इत्यादि में सरामरानय रूप से भरारी्रारी करती है ।
डॉ शास्त्री के अनुसरार यदि मध्यकाल में हिन्ुओं के व्यापक एवं प्चंड उतपीिन की घ्टनरा
नहीं हुई होती तो कम से कम वर्तमरान भरारतीय उपमहाद्वीप के देशों में मुससलम वर्ग, अनुसदूतचत जराति एवं अनुसदूतचत जनजराति की उतपतत्त तो नहीं ही होती । जिस प्रकार स्वाभिमरानी हिन्ुओं को दबरा्र एवं कुचलकर मध्यकाल में उन्रा दमन और दलन के उपररांत बलपदूव्म् असवचि कार्यों में लररा्र उनिें असपृशय एवं दलित की पहचरान दी गयी, उसी प्रकार वर्तमरान मुसलमरान भी ्ठीक इसी परिससथति में बलपदूव्म् विदेशी मुससलम आक्ररांतरा शरासकों के तलवरार की नोंक पर हिन्ुओं ्रा धमरा्मनतरण करके बनराये गए । आज भी मुसलमरानों की ि्ठी एवं सरातवीं पीढ़ी ्रा प्मरातणत तथय हिन्दू पदूव्मजों के रूप में प्रापत होतरा हैI यह पदूण्म प्मरातणत और वरासतव में सर्वविदित है कि वर्तमरान सम्पूर्ण दलित वर्ग यरानी दलित एवं जनजरातीय समराज प्राचीन ्राल के स्वाभिमरानी हिन्दू योद्धा एवं योद्धा जरातियों के सरामरातज् रूप से परिवर्तित वंशज है । भरारत, नेपराल तथरा अन्यानय भरारतीय उपमहाद्वीपीय देशों की वरासततव्तरा से अनतभज् किनतु एक ््टु सतय के आधरार पर लगभग सभी दलित जरातियरां अपने को क्षत्रिय यरा रराजपदूत यरा ऐसी अनय योद्धा प्जरातियों से अपनी उतपतत्त ्रा प्मराण देती है । लेकिन इस सन्भ्म में सव्म्रा प्मरातण्तरा एवं तथय पदूण्म ्ठोस शोध कार्यों ्रा अभराव रिरा है ।
उनिोंने ्िरा कि रराजनीतिक क्षेत्र में कुछ लोगों ने“ दलित” शब् पर आपत्ति जतराते हुए ्िरा करते है कि जिस प्रकार राष्ट्रपितरा मिरात्मा ररांधी द्वाररा दियरा गयरा नराम " हरिजन " ्रा भराव दलितों को आघरात पहुंचतरा है, इस प्रकार दलित शब् ्रा भी भराव है । वरासतव में ऐसी बरातें करने वरालों के परास दलित समराज की उतपतत्त के सत्यापित एवं प्मरातणत तथयों की जरान्रारी ्रा अभराव ही रिरा ।“ दलित” शब् तो संघर्ष एवं वीरतरा ्रा एक पयरा्मय हैI वर्तमरान में यदि“ दलित” जरातियों के तनमरा्मण एवं“ दलित” शब् की उतपतत्त पर यथोचित प्मराण नहीं दिए गए तो“ दलित” शब् की जगह जो भी शब् आएंगे, उन्रा भी भराव ्दूतित होतरा चलरा जराएररा । दलित शब् स्वाभिमरान, सम्मान एवं इततिरास के उस ्रालखंड ्रा यथराथ्म है, जो गौरव और सम्मान ्रा प्तीक है । दलित शब् किसी जराति यरा समु्राय के सराथ यदि जुिरा हुआ परायरा जराये तो सरामरानय हिन्ुओं को उन्रा सम्मान करनरा चरातिए कयोंकि विदेशी इस्लामिक आक्ररांतराओं के भयरानक उतपीिन के उपररांत वे हिन्ुओं एवं हिंदुतव की रक्षरा करने में सफल हुए । दलित शब् की जगह वंचित शब् ्रा प्योग प्चलन में आयरा किनतु वयविरार पक्ष ने उसे कभी स्वीकार नहीं कियरा । देखरा जराए तो सच यह है कि वंचित तो कोई भी हो सकतरा है, एक ब्राह्मण
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