Feb 2026_DA | Page 26

समाज

चरातिए । किसी भी राष्ट्र ्रा तव्रास तभी अर्थपदूण्म हो सकतरा है जब भौतिक प्रति के सराथ सराथ आधयरासतम् मूल्यों ्रा भी संगम हो । जिरां तक भरारत की विशेषतरा, और संस्कृति ्रा सवराल है तो यह विशव की बेहतर संस्कृति है । भरारतीय संस्कृति को समृवि और श्रेष्ठ बनराने में सबसे बड़ा योर्रान दलित समराज के लोगों ्रा है । इस देश मिरान आदि कवि कहलराने ्रा सम्मान केवल महर्षि वरास्म्ी को है, शास्त्रों के ज्ञातरा ्रा सम्मान वेदव्यास को है । भरारतीय संविधरान की रचनरा ्रा श्रेय अमबेि्र को जरातरा है ।
डॉ शास्त्री ने इततिरास के तथयों को सरामने रखते हुए ्िरा कि दलित समस्या को समग्र भराव में समझने के लिए आयरा्मव्रत यरानी अखंड भरारत के भौगोलिक सवरूप पर दृष्टिपरात आवशय् हैं । भरारतीय उपमहाद्वीप देश में नेपराल, श्रीलं्रा, अफररातनस्तान, परात्स्तान, बरांग्लादेश, इंडोनेशियरा, वमरा्म, बराली, सुमरात्ररा इत्यादि देश को मरानरा जरातरा हैं । विदेशी आक्ररांतराओं के आक्रमण के समय हिन्ुस्तान में धर्म एवं संस्कृति संरक्षण ्रा उत्तर्रातयतव ब्राह्मणों पर एवं देश की भौगोलिक सीमरा एवं जन-धन की रक्षरा ्रा उत्तर्रातयतव क्षत्रियों पर थरा । क्षत्रिय एवं रराजपदूत जरातियरां ही प्मुखतरा के सराथ विदेशी आक्ररांतराओं एवं उनके आक्रमण ्रा उत्तर भयरानक प्तिशोध के रूप में युधि से देते थेI परिणरामसवरूप उन विदेशी तुर्क, मुससलम और मुग़ल आक्ररांतरा शरासकों
के आक्रोश, अन्याय, अत्याचरार एवं शत्रुतरा ्रा प्मुख तश्रार यही धर्म और संस्कृति रक्षक ब्राह्मण एवं राष्ट्र रक्षक क्षत्रियों को होनरा पड़तरा थराI वरासतव में विदेशी आक्ररांतराओं की प्चंड घृणरा एवं आक्रोश के ्रारण पररासत होने पर ब्राह्मण एवं क्षत्रियों को खोज-खोज कर उतपीतित कियरा जरातरा थरा । उनके बिदू-बेत्टयों की मयरा्म्रा लदू्टने एवं लराखों की संख्या में हिन्दू महिलराओं को ्रास बनरा्र अरब की सड़कों एवं गलियों में कौड़ियों के ्राम पर नीलराम कियरा जरातरा थरा ।
उनिोंने बतरायरा कि विदेशी आक्ररांतरा शरासकों के शरासन की झलकियरां तवतभन् इततिरास्रारों की ्कृतियों में देखरा जरा सकतरा हैं । के. एस. लराल ने अपनी पुसत्‘ ट्वलराइ्स आफ दी सुल्तान’ के पृष्ठ 65 पर लिखरा है कि-‘ मुससलम सरामंतों के भय से धनी हिन्दू नगरों में निर्धनों की तरह रहते थे I’ के. एस. लराल ने अपनी एक अनय पुसत्‘ स्टडीज इन मैंडिवल हिसट्री’ के पृष्ठ 90 एवं 91 पर लिखरा है कि-‘ गयरासुद्ीन की सोच थी कि हिन्दू ग्ररामीणों के परास में उतनरा ही धन रहे, जिससे वह दीन-हीं बनकर रहे I’ ईशवरी प्सरा् ने‘ हिसट्री ऑफ़ करोनरा ट्रकस’ के पृष्ठ 67 एवं 74 पर लिखरा है कि-‘ मुहमम् तुगलक ने ग्ररामीणों पर इतने अत्याचरार किये कि वह ररांव छोड़कर भरार जराते थे एवं तब उनकों( हिन्ुओं) आखे्ट करके( जरानवरों की तरह) मरार िरालरा जरातरा थराI’ ईसवरी प्सरा् ने‘ मधय युग ्रा
इततिरास’ के पृष्ठ 255 पर उ्लेख कियरा है कि-‘ परनतु हिंदुओं के प्ति उस समय भी अलराउद्ीन की ही नीति ्रा अनुसरण कियरा गयरा थरा । तरात् वे( हिन्दू) धनवरान न हो सके और दीन-हीन बनकर जीवन यरापन करने के लिए बराधय रहे ।’ अब इन स्थापित इततिरास्रारों द्वाररा प्मरातणत और बेहद संवेदनशील तथयों के आलोक में मध्यकाल ्रा विशलेिण होनरा चरातिए । मध्यकाल की ्राली ररातत्र हिन्ुओं के लिए बेहद दुख्रायी थी तो यह सपष्ट करनरा ही होररा कि हमरारे मिरान इततिरास्रारों की दृस्टि में मध्यकाल हिन्ुस्थान के लिए सवतण्मम ्राल कैसे हो सकतरा है?----कैसे---?
डॉ शास्त्री के अनुसरार हिन्ुस्थान के इततिरास ्रा मदूल श्रोत यरा तो समय-समय पर हिन्ुस्थान के बरारे में जरान्रारी एवं पय्म्टन की दृष्टि से आये विदेशी यरात्री के संसमरणों पर यरा मध्यकाल के विदेशी तुर्क, मुससलम यरा मुग़ल आक्ररांतरा शरासकों की चरा्टु्रारितरा में लिखे गए प्शससतपत्र पर आधरारित है । चरा्टु्रारितरा एवं प्शस्तिगान करने वराले चरा्टु्रारों ने तो अपने अपने नवराबों एवं बरा्शरािों ्रा इततिरास बढ़रा-चढ़रा कर लिखरा ही थरा किंतु हिन्ुस्थान के इततिरास लेखन के समबनध में विदेशी यरातत्रयों के संसमरण पर पदूररा भरोसरा कियरा जरा सकतरा है । ऐसे में हिन्ुओं की प्तरािनरा एवं मध्यकाल की सरामरातज्, आर्थिक एवं प्शरासनिक वयवस्था की ््पनरा की जरा सकती है । मध्यकाल में हिन्दू उतपीिन पररा्राष्ठरा पर थरा । उनमें भी प्रारंभिक यरानी आक्रमण ्राल में आक्रोश एवं शत्रुतरा के ्रारण विदेशी आक्ररांतराओं ्रा प्चंड उतपीिन, स्वाभिमरानी, धमरा्मतभमरानी एवं योद्धा हिन्ुओं को सदैवसहनरा पिरा । युधि में बंदी बनराये गए लोगों के सम्मान, स्वाभिमरान एवं धमरा्मतभमरान के सराथ खिलवराि हुआ । जो हिन्दू कमजोर थे एवं प्चंड उतपीिन और अत्याचरार के समक्ष घु्टने ्टेक दिए थे, वह धर्म बदलकर मुसलमरान बन गए, किनतु कट्टर, स्वाभिमरानी एवं धमरा्मतभमरानी हिन्ुओं ने असवचि कर्म करनरा स्वीकार कियरा, लेकिन हिन्दू धर्म को त्यागने से इं्रार कर दियरा ।
डॉ शास्त्री ने बतरायरा कि हिन्दू समराज में वैदिक
26 iQjojh 2026