Feb 2026_DA | Page 22

कवर स्टोरी

के मधय खराई को उतपन् करने में सिरायक हो । किसी भी नियम-्रानदून ्रा अंतिम मदू्यरां्न इस आधरार पर कियरा जरानरा चरातिए कि वह समराज को एकजु्ट करतरा है यरा विभरातजत करतरा है । यदि यह अविश्वास और संघर्ष को बढ़ावरा देतरा है, तो पुनर्विचरार अपररिराय्म हो जरातरा है ।
राष्ट्र हित के अनुरूप हो कानून
तशक्षरा में सुधरार ्रा अर्थ समराज को आगे ले जरानरा है । वरासतव में ऐसी तशक्षरा नीति की आवशय्तरा है जो प्तिभरा को जराति से ऊपर रखे, अवसर को पहचरान से मुकत करे और परिसरों को संघर्ष ्रा नहीं, संवरा् ्रा केंद् बनराए । तशक्षरा क्षेत्र में ऐसे नियम-्रानदून लरारदू होने चरातिए, जो देश की समरावेशी, संतुलित और भविषयद्ष्टरा संरचनरा के अनुरूप हों ।
यदूजीसी को भरावनराओं और रराजनीतिक दबरावों से ऊपर उ्ठ्र ऐसी नीति बनरानी चरातिए जो वरासतव में समरान अवसर सुतनसशचत करे, न कि समराज में नए विभराजन पै्रा करे । िरा. आंबेडकर के अनुसरार, समराज जनशसकत के तर्क पर आधरारित होनरा चरातिए न कि जराति वयवस्था की परंपरराओं पर । सरामरातज् न्याय के दृष्टिकोण से समतरा और समरानतरा के बिनरा समराज सुरक्षित नहीं है । उन्रा मराननरा थरा कि शैक्षणिक संस्थान में हर जराति, धर्म, लिंग, ्रा स्वागत ्रा मरािौल हो और बिनरा किसी पक्षपरात के वयविरार के शिक्षक ध्यान रखेंगे और िरात्रों को पढ़ाएंगे कयोंकि एक शिक्षक भविषय ्रा तनमरा्मतरा हैं । इसके सराथ ही शिक्षक को सभी को शिक्षित करने के समरान अवसर ्रा भी समर्थन एवं समरान अवसर प्रदान करनरा चरातिए ।
वशषिा का बदलता स्वरूप
तशक्षरा के बदलते सवरूप ने भरारतीय तशक्षरा
प्णराली को अधिक व्याविरारिक और वैसशव् बनरायरा है । वर्तमरान समय में भरारत की प्राचीन संस्कृति को बरकररार रकने के लिए यह आवशय् है कि आधुनिक तशक्षरा और परारंपरिक भरारतीय संस्कृति के बीच एक ऐसरा संतुलन बनरायरा जराए, तरात् तव्रास के सराथ-सराथ भरारत की प्राचीन मदूल सरांस्कृतिक जिें भी मजबदूत रहें । किसी भी वयसकत के तव्रास के लिए जिज्ञासरा, योजनरा, कर्म और समीक्षरा आवशय् प्तक्रयरा हैं । इस सबके योगय और सक्षम बनराने के लिए वयसकत को उचित तशक्षरा और प्तशक्षण की आवशय्तरा पड़ती है । तशक्षरा एक बहुआयरामी प्तक्रयरा है । तशक्षरा केवल विद्यालयी औपचरारिक तशक्षरा तक सीमित नहीं है वरन तशक्षरा अनुभवों
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