वरामपंथी सहित अनय विरोधी रराजनीतिक दलों के सराथ ही जराति-पंथ आधरारित संर्ठन, गैर सर्रारी संर्ठन तेजी के सराथ सक्रिय हो चुके हैं । सोशल मीडियरा के मराधयम से सभी अपने- अपने त्गों एवं कुत्गों के मराधयम से एक तरफ जिरां अनुसदूतचत जराति-जनजराति वर्ग के लोगों के सराथ ही तपििरा वर्ग के लिए नए ्रानदून को अतयतध् आवशय् एवं उपयोगी बतरा्र मरांग की जरा रही है कि सभी मिलकर नए ्रानदून को लरारदू करने ्रा दबराव बनराए, वही ्दूसरी और सरामरानय वर्ग को ्रानदून के विरोध में भि्रा्र जरातीय तनराव पै्रा कियरा जरा रिरा है । गलत एवं भ्ररामक सदूचनराओं के मराधयम से विशेष रूप से िरात्रों को यह बतरायरा जरा रिरा है कि अगर नयरा ्रानदून नहीं लरारदू कियरा गयरा तो तशक्षरा केंद् में उनिें भेदभराव ्रा सरामनरा करनरा पड़ेररा, जिसे रोक परानरा उनके लिए संभव नहीं होररा । समराज के हर वर्ग के मधय तनराव पै्रा करके मोदी सर्रार को अससथर करने की यह वह नई रणनीति है, जिसमें प्तयक्ष-अप्तयक्ष रूप से वह
सही शरातमल हैं, जो मोदी सर्रार को सत्तरा से ि्टराने के लिए लररातरार कोशिश करते आ रहे हैं ।
वशषिा संस्थानों की गरिमा से समझौता नहीं
देश ्रा इततिरास बतरातरा है कि जराति पर आधरारित नीतियरां, चरािे उन्रा उद्ेशय कितनरा भी कल्याण्रारी कयों न हों, अकसर प्रायः समराज में विघ्टन की प्तक्रयरा को जनम देतरा है । ऐसे में तशक्षरा क्षेत्र में जराति आधरारित भेदभराव को और बढ़ाने वराली कोई भी पहल स्वाभरातव् रूप से चिंतरा पै्रा करती है । तशक्षरा संस्थान सिर्फ डिग्रियरां बरां्टने वराले संस्थान नहीं, बल्् ऐसी प्योगशरालराएं हैं जो समराज की भरावी दिशरा तनधरा्मरित करती हैं । तशक्षरा परिसरों में पलने-बढ़ने वराले िरात्र न केवल भरावी कर्मचरारी हैं, बल्् भरावी नराररिक भी हैं । अगर तशक्षरा संस्थानों को अविश्वास, वर्ग संघर्ष और संदेह ्रा मै्रान बनरायरा जरातरा है, तो इस्रा प्भराव तशक्षरा से कहीं
अधिक व्यापक होररा और यह भरारत के एकजु्ट हो रहे हिन्दू समराज को नष्ट करने ्रा ्राय्म करेररा । वैचरारिक दृष्टि से यदूजीसी के नए नियमों ्रा विरोध इसी गहन वैचरारिक चिंतरा ्रा प्रकटीकरण है । इस समबनध में िरा. भीमरराव आंबेडकर ्रा तशक्षरा, समतरा और समरानतरा ्रा दर्शन भरारत के सरामरातज्-पुनतन्ममरा्मण के लिए महतवपदूण्म है । िरा. आंबेडकर ्रा मराननरा है कि समतरा और समरानतरा हर इंसरान की जरूरत ही नहीं, बल्् सभी ्रा अतध्रार है । समरानतरा ्रा अर्थ है सभी के सराथ एक जैसरा वयविरार, जबकि निषपक्षतरा की मरांग है तवतभन् परिससथतियों के आधरार पर संतुलित अवसर प्रदान करनरा । यदि निषपक्षतरा के नराम पर ऐसे प्रावधरान लरारदू किए जराते हैं जो असमरानतरा ्रा एक नयरा रूप उतपन् करते हैं, तो नीति अनिवराय्म रूप से अपने उद्ेशय से भ्ट् जराती है । ऐसे में देश के तशक्षरा संस्थानों में ऐसे किसी भी नियम-्रानदून को लरारदू करनरा कहीं से भी उचित नहीं होररा, जो शैक्षिक वरातरावरण को ्दूतित करते हुए िरात्रों
iQjojh 2026 21