वरासतव में इस दिशरा में प्रति हुई है । इस्रा श्रेय आधुनिक ्राल के संतों एवं समराज सुधरारकों स्वामी विवे्रानंद, स्वामी दयरानंद, रराजरा रराममोहन रराय, मिरात्मा जयोतिबरा फुले एवं उनकी पत्ी सरातवत्री बराई फुले, नराररायण गुरु, ररांधीजी और िरा. बराबरा सरािब आंबेडकर को जरातरा है ।
इस संदर्भ में राष्ट्रीय सवयंसेवक संघ तथरा इससे प्ेरित अनेक संर्ठन हिं्दू एकतरा एवं हिं्दू समराज के पुनरुत्थान के लिए सरामरातज् समरानतरा पर जोर दे रहे है । संघ के तीसरे सरसंघचरालक बरालरासरािब देवसर कहते थे कि‘ यदि असपृशयतरा पराप नहीं है तो इस संसरार में अनय ्दूसररा कोई पराप हो ही नहीं सकतरा । वर्तमरान दलित समु्राय जो अभी भी हिं्दू है अतध्रांश उनिीं सरािसी ब्राह्राणें व क्षत्रियों के ही वंशज हैं, जिनिोंने जराति से बरािर होनरा स्वीकार कियरा, किंतु विदेशी शरासकों द्वाररा जबरन धर्म परिवर्तन स्वीकार नहीं कियरा । आज के हिं्दू समु्राय को उन्रा शुक्रगुजरार होनरा चरातिए कि उनिोंने हिंदुतव को नीचरा दिखराने की जगह खुद नीचरा होनरा स्वीकार कर लियरा ।
हिं्दू समराज के इस सशकती्रण की यरात्ररा को िरा. आंबेडकर ने आगे बढ़ायरा, उन्रा दृष्टिकोण न तो संकुचित थरा और न ही वे पक्षपराती थे । दलितों को सशकत करने और उनिें शिक्षित करने ्रा उन्रा अभियरान एक तरह से हिं्दू समराज ओर राष्ट्र को सशकत करने ्रा अभियरान थरा । उनके द्वाररा उ्ठराए गए सवराल जितने उस समय प्रासंगिक थे, आज भी उतने ही प्रासंगिक है कि अगर समराज ्रा एक बड़ा हिस्सा शसकतिीन और अशिक्षित रहेररा तो हिं्दू समराज ओर राष्ट्र सशकत कैसे हो सकतरा है? वह बरार-बरार सवर्ण हिंदुओं से आग्रह कर रहे थे कि विषमतरा की दिवरारों को गिरराओं, तभी हिं्दू समराज शसकतशराली बनेररा । िरा. आंबेडकर ्रा मत थरा कि जिरां सभी क्षेत्रों में अन्याय, शोषण एवं उतपीिन होररा, वहीं सरामरातज् न्याय की धरारणरा जनम लेगी । आशरा के अनुरूप उतर न मिलने पर उनिोंने 1935 में नरातस् में यह घोषणरा की, वे हिं्दू नहीं रहेंगे । अंग्रेजी सर्रार ने भले ही दलित समराज को कुछ ्रानदूनी अतध्रार दिए थे, लेकिन आंबेडकर जरानते थे कि यह समस्या ्रानदून की समस्या नहीं है । यह हिं्दू समराज के भीतर की समस्या है और इसे हिंदुओं को ही सुलझरानरा होररा । वह समराज के तवतभन् वरवो को आपस में जोिने ्रा ्राय्म कर रहे थे । उनिोंने भले ही हिं्दू न रहने की घोषणरा
कर दी थी । ईसराइयत यरा इस्लाम से खुलरा निमंत्रण मिलने के बरावजदू् उनिोंने इन विदेशी धमगों में जरानरा उचित नहीं मरानरा । िरा. आंबेडकर इस्लाम और ईसराइयत ग्रहण करने वराले दलितों की दुर्दशरा को जरानते थे । उन्रा मत थरा कि धर्मांतरण से राष्ट्र को नुकसरान उ्ठरानरा पितरा है । विदेशी धमगों को अपनराने से वयसकत अपने देश की परंपररा से ्टू्टतरा है ।
वर्तमरान समय में देश ओर दुनियरां में ऐसी धरारणरा बनराई जरा रही है कि आंबेडकर केवल दलितों के नेतरा थे । उनिोंने केवल दलित उत्थान के लिए ्राय्म कियरा यह सही नहीं होररा । मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि उनिोंने भरारत की आत्मा हिं्दूतव के लिए ्राय्म कियरा । जब हिं्दूओं के लिए एक विधि संहितरा बनराने ्रा प्ंसग आयरा तो सबसे बड़ा सवराल हिं्दू को परारिभरातित करने ्रा थरा । िरा. आंबेडकर ने अपनी ्दूरदृष्टि से इसे ऐसे परारिभरातित कियरा कि मुसलमरान, ईसराई, यिदू्ी और परारसी को छोि्र इस देश के सब नराररिक हिं्दू हैं, अथरा्मत विदेशी उदरम के धमगों को मरानने वराले अहिं्दू हैं, बरा्ी सब हिं्दू है । उनिोंने इस परिभरािरा से देश की आधरारभदूत एकतरा ्रा अद्भूत उ्रािरण पेश कियरा है ।
िरा. अमबे्िर ्रा सपनरा भरारत को मिरान, सशकत और स्वावलंबी बनराने ्रा थरा । िरा. आंबेडकर की दृष्टि में प्जरातंत्र वयवस्था सववोतम वयवस्था है, जिसमें एक मरानव एक मूल्य ्रा विचरार है । सरामरातज् वयवस्था में हर वयसकत ्रा अपनरा अपनरा योर्रान है, पर रराजनीतिक दृष्टि से यह योर्रान तभी संभव है जब समराज और विचरार दोनों प्जरातरांत्रिक हों । आर्थिक कल्याण के लिए आर्थिक दृष्टि से भी प्जरातंत्र जरुरी है । आज लोकतरांत्रिक और आधुनिक दिखराई देने वरालरा देश, आंबेडकर के संविधरान सभरा में किये गए सत्त वैचरारिक संघर्ष और उनके व्यापक दृष्टिकोण ्रा नतीजरा है, जो उनकी देख-रेख में बनराए गए संविधरान में क्रियान्वित हुआ है, लेकिन फिर भी संविधरान वैसरा नहीं बन परायरा जैसरा आंबेडकर चरािते थे, इसलिए वह इस संविधरान से खुश नहीं थे । आखिर आंबेडकर आजरा् भरारत के लिए कैसरा संविधरान चरािते थे?
iQjojh 2026 13