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प्रासपत ्रा स्ोत है । किसी एक पर अंतिम सतय की मुहर लरराए बिनरा सभी रुपों में सतय को स्वीकार करने, मरानव-तव्रास के उच्चतर सोपरान पर पहुंचने की गजब की क्षमतरा है, इस धर्म में! श्रीमद्भगवदरीतरा में इस विचरार पर जोर दियरा गयरा है कि वयसकत की मिरानतरा उसके कर्म से
सुनिश्रित होती है न कि जनम से । इसके बरावजदू् अनेक इततिरातस् ्रारणों से इसमें आई न्रारतम् बुरराइयों, ऊंच-नीच की अवधरारणरा, कुछ जरातियों को अछूत समझने की आदत इस्रा सबसे बड़ा दोष रिरा है । यह अनेक सहस्रासब्यों से हिं्दू धर्म के जीवन ्रा मरार्गदर्शन
करने वराले आधयरासतम् सिंद्धातों के भी प्तत्रूल है ।
हिं्दू समराज ने अपने मदूलभदूत सिंद्धातों ्रा पुनः पतरा लररा्र तथरा मरानवतरा के अनय घ्ट्ों से सीखकर समय समय पर आतम सुधरार की इच्छा एवं क्षमतरा ्शरा्मई है । सै्िों सरालों से
12 iQjojh 2026