Feb 2026_DA | 页面 11

हिंददू समाज और डा. आंबेडकर

वर्तमरान समय में रराजनीतिक सुविधरा के हिसराब से हर कोई िरा. आंबेडकर को अपने अपने तरीके से परिभरातित करने में लररा हुआ है, कुछ उनिें देवतरा बनराने में लगे हैं तो कुछ उनिें केवल दलितों की बपौती मरानते हैं और कई उनिें हिन्ुओं के विरोधी नरायक के रूप में रखते हैं । कुछ लोग तो आंबेडकर के धर्म- परिवर्तन के सही मर्म को समझे बिनरा ही आज दलितों को हिंदुओं से अलग कर उनिें एक धर्म के रूप में रखने की मरांग करने लगे हैं ।

कोई इस पर बरात ही नहीं करनरा चराितरा कि िरा. आंबेडकर ्रा पदूररा संघर्ष हिं्दू समराज ओर राष्ट्र के सशकती्रण ्रा ही थरा । िरा.. आंबेडकर के चिनतन और दृष्टि को समझने के लिए यह ध्यान रखनरा जरूरी है कि वह अपने चिनतन में कहीं भी दुरराग्रही नहीं है । उनके चिनतन में जितरा नहीं है । िरा. आंबेडकर ्रा दर्शन समराज को गतिमरान बनराए रखने ्रा है । विचरारों ्रा नरालरा बनरा्र उसमें समराज को डुबराने-वरालरा विचरार नहीं है । िरा. आंबेडकर मरानते थे कि समरानतरा के बिनरा समराज ऐसरा है, जैसे बिनरा हथियरारों के सेनरा । समरानतरा को समराज के स्थाई तनमरा्मण के लिये धरातम्म्, सरामरातज्, रराजनीतिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक क्षेत्र में तथरा अनय क्षेत्रों में लरारदू करनरा आवशय् है ।
भरारत के सर्वांगीण तव्रास और राष्ट्रीय पुनरुत्थान के लिए सबसे अधिक महतवपदूण्म विषय हिं्दू समराज ्रा सुधरार एवं आतम-उद्धार है । हिं्दू धर्म मरानव तव्रास और ईशवर की iQjojh 2026 11