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की सीमा में धोती के सिान पर अंगोछा पहनने की ही अनुमति थी । रासते में महार की छाया पड़ जाने पर अशौच की पुकार मच जाती थी । कुछ लोग महार के सिान पर बहार बोलते थे जैसे की महार कोई गाली हो । यदि रासते में महार की छाया पड़ जाती थी तो ब्हण लोग दोबारा स्ान करते थे । नयायालय में साक्ी के रूप में महार को क्टघरे में खड़े होने की अनुमति न थी । इस भंयकर दमन के कारण महार समाज का मानो साहस ही समापत हो चूका था ।
इसके लिए सावरकर जी ने दलित बससतयों में जाने का , सामाजिक कायषों के साथ साथ
धार्मिक कायषों में भी दलितों के भाग लेने का और सवर्ण एवं दलित दोनों के लिए पतितपावन मंदिर की सिापना का निशचय लिया गया । जिससे सभी एक सिान पर साथ साथ पूजा कर सके और दोनों के मधय दूरियों को दूर किया जा सके ।
1 . रत्नागिरी प्रवास के 10-15 दिनों के बाद में सावरकर जी को मलढ़या में हनुमान जी की मूर्ति की प्राण प्रतिषठा का निमंत्ण मिला । उस मंदिर के देवल पुजारी से सावरकर जी ने कहाँ की प्राण प्रतिषठा के काय्वकम में दलितों को भी आमंलत्त किया जाये । जिस पर वह पहले तो न करता रहा पर बाद में मान गया । शी मोरेशवर
दामले नामक किशोर ने सावरकार जी से पूछा कि आप इतने साधारण मनुषय से वयि्व इतनी चर्चा कयूँ कर रहे थे ? इस पर सावरकर जी ने कहाँ कि
“ सैंकड़ों लेख या भाषणों की अपेक्ा प्रतयक् रूप में किये गए कायषों का परिणाम अधिक होता है । अबकी हनुमान जयंती के दिन तुम सवयं देख लेना ।”
2 . 29 मई 1929 को रत्नागिरी में शी सतय नारायण कथा का आयोजन किया गया जिसमे सावरकर जी ने जातिवाद के विरुद्ध भाषण दिया जिससे की लोग प्रभावित होकर अपनी अपनी
जातिगत बैठक को छोड़कर सभी महार- चमार एकलत्त होकर बैठ गए और सामानय जलपान हुआ ।
3 . 1934 में मालवान में अछूत बसती में चायपान , भजन कीर्तन , अछूतों को यज्पवीत ग्हण , विद्ालय में समसत जाति के बच्चों को बिना किसी भेदभाव के बैठाना , सहभोज आदि हुए ।
4 . 1937 में रत्नागिरी से जाते समय सावरकर जी के विदाई समारोह में समसत भोजन अछूतों द्ारा बनाया गया जिसे सभी सवणषों- अछूतों ने एक साथ ग्हण किया था ।
5 . एक बार शिरगांव में एक चमार के घर
पर शी सतय नारायण पूजा थी जिसमे सावरकर जो को आमंलत्त किया गया था । सावरकार जी ने देखा की चमार महोदय ने किसी भी महार को आमंलत्त नहीं किया था । उनहोंने ततकाल उससे कहाँ की आप हम ब्ाहणों के अपने घर में आने पर प्रसन्न होते हो पर में आपका आमंत्ण तभी सवीकार करूँगा जब आप महार जाति के सदसयों को भी आमंलत्त करेंगे । उनके कहने पर चमार महोदय ने अपने घर पर महार जाति वालों को आमंलत्त किया था ।
6 . 1928 में शिवभांगी में विट्टल मंदिर में अछुतों के मंदिरों में प्रवेश करने पर सावरकर जी का भाषण हुआ ।
7 . 1930 में पतितपावन मंदिर में शिवू भंगी के मुख से गायत्ी मंत् के उच्चारण के साथ ही गणेशजी की मूर्ति पर पुषपांजलि अर्पित की गई ।
8 . 1931 में पतितपावन मंदिर का उद्घाटन सवयं शंकराचार्य शी कूर्तकोल्ट के हाथों से हुआ एवं उनकी पाद्पूजा चमार नेता शी राज भोज द्ारा की गयी थी । वीर सावरकर ने घोषणा करी की इस मंदिर में समसत हिंदुओं को पूजा का अधिकार है और पुजारी पद पर गैर ब्ाहण की नियुसकत होगी ।
इस प्रकार के अनेक उदहारण वीर सावरकर जी के जीवन से हमें मिलते है जिससे दलित उद्धार के विषय में उनके विचारों को , उनके प्रयासों को हम जान पाते हैं । सावरकर जी के बहुआयामी जीवन के विभिन्न पहलुयों में से सामाजिक सुधारक के रूप में वीर सावरकर को समरण करने का मूल उद्ेशय दलित समाज को विशेष रूप से सनदेश देना है । जिसने राजनीतिक सवािषों की पूर्ति के लिए सवर्ण समाज द्ारा अछूत जाति के लिए गए सुधार कायषों की अपेक्ा कर दी है । और उनहें केवल विरोध का पात् बना दिया हैं । वीर सावरकर महान कांलतकारी शयाम जी ककृषण वर्मा जी के कांलतकारी विचारों से लनदन में पढ़ते हुए संपर्क में आये थे । शयामजी ककृषण वर्मा सवामी दयानंद के शिषय थे । सवामी दयानंद के दलितों के उद्धार करने रूपी चिंतन को हम सपष्ट रूप से वीर सावरकर के चिंतन में देखते हैं । �
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