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डॉ क्ववेक आर्य

दलित उद्धारक के रूप में वीर सधावरकर

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तिकारी वीर सावरकार का सिान भारतीय सवतंत्ता संग्ाम में अपना ही एक विशेष महतव रखता है । सावरकर जी पर लगे आरोप भी अलद्तीय थे उनहें मिली सजा भी अलद्तय थी । एक तरफ उन पर आरोप था कि अंग्ेज सरकार के विरुद्ध युद्ध की योजना बनाने का , बम बनाने का और विभिन्न देशों के कांलतकारियों से समपककि करने का तो दूसरी तरफ उनको सजा मिली थी पूरे 50 वर्ष तक दो सशम आजीवन कारावास । इस सजा पर उनकी प्रलतलकया भी अलद्तीय थी कि ईसाई मत को मानने वाली अंग्ेज सरकार कब से पुनर्जनम अर्थात दो जनमों को मानने लगी । वीर सावरकर को 50 वर्ष की सजा देने के पीछे अंग्ेज सरकार का मंतवय था कि उनहें किसी भी प्रकार से भारत अथवा भारतीयों से दूर रखा जाये । जिससे वे कांलत की अलनि को न भड़का सके । सावरकर के लिए शिवाजी महाराज प्रेरणा स्ोत थे । जिस प्रकार औरंगजेब ने शिवाजी महाराज को आगरे में कैद कर लिया था उसी प्रकार अंग्ेज सरकार ने भी वीर सावरकर को कैद कर लिया था । जैसे शिवाजी महाराज ने औरंगजेब की कैद से छु्टने के लिए अनेक पत् लिखे उसी प्रकार से वीर सावरकर ने भी अंग्ेज सरकार को पत् लिखे । जब उनकी अंडमान की कैद से छु्टने की योजना असफल हुई , जब उसे अनसुना कर दिया गया । तब वीर शिवाजी की
तरह वीर सावरकर ने भी कू्टनीति का सहारा लिया कयूंलक उनका मानना था अगर उनका समपूण्व जीवन इसी प्रकार अंडमान की अँधेरी कोठरियों में निकल गया तो उनका जीवन वयि्व ही चला जायेगा । इसी रणनीति के तहत उनहोंने सरकार से सशर्त मुकत होने की प्रार्थना की , जिसे सरकार द्ारा मान तो लिया गया । उनहें रत्नागिरी में 1924 से 1937 तक राजनितिक क्ेत् से दूर नजरबंद रहना था । विरोधी लोग इसे वीर सावरकर का माफीनामा , अंग्ेज सरकार के आगे घु्टने ्टेकना और देशद्रोह आदि कहकर उनकी आलोचना करते हैं जबकि यह तो आपातकालीन धर्म अर्थात कू्टनीति थी ।
मुससलम तुष्टिकरण को प्रोतसाहन देने के लिए सरकार ने अंडमान द्ीप के कीर्ति सतमभ से वीर सावरकर का नाम ह्टा दिया और संसद भवन में भी उनके लचत् को लगाने का विरोध किया । जीवन भर जिनहोंने अंग्ेजों की यातनाये सही म्रतयु के बाद उनका ऐसा अपमान करने का प्रयास किया गया । उनका विरोध करने वालों में कुछ दलित वर्ग की राजनीती करने वाले नेता भी थे । जिनहोंने अपनी राजनीतिक महतवकांशा को पूरा करने के लिए उनका विरोध किया था । दलित वर्ग के मधय कार्य करने का वीर सावरकर का अवसर उनके रत्नागिरी प्रवास के समय
मिला । 8 जनवरी 1924 को सावरकर जी रत्नागिरी में प्रविष्ट हुए तो उनहोंने घोषणा कि की वे रत्नागिरी दीर्घकाल तक आवास करने आए है और छुआछुत समापत करने का आनदोलन चलाने वाले है । उनहोंने उपससित सज्जनों से कहाँ कि अगर कोई अछूत वहां हो तो उनहें ले आये और अछूत महार जाति के बंधुयों को अपने साथ बैल गाड़ी में बैठा लिया । पठाकगन उस समय में फैली जातिवाद की कूप्रथा का सरलता से आंकलन कर सकते है कि जब किसी भी शुद्र को सवर्ण के घर में प्रवेश तक निषेध था । नगर पालिका के भंगी को नारियल की नरे्टी में चाय डाली जाती थी । किसी भी शुद्र को नगर
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