प्रथाओं की नकल का कड़ाई से पालन करती हैं । दूसरे जो इनसे कुछ कम निकटि हैं , उनमें केवल वैधवर और बालिका विवाह प्रचिमलत हैं ; अनर जो कुछ और दूरी पर हैं , उनमें केवल बालिका विवाह प्रमुख हैं तथा सबसे अधिक दूरी वाले लोग जातिप्रथा के सिद्धांत का अनुसरण करते हैं । मैं निःसंदेह कह सकता हूं कि यह अधूरी नकल इसी प्रकार है , जैसे टिाडडे ने ' दूरी ' बताई हैं । आंशिक रूप से यह प्रथाओं का पाश्िक लक्ण है । यह शसथमत टिाडडे के नियम का पूर्ण उदाहरण है और इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि भारत में जातिप्रथा निम्न वर्ग द्ारा उच्च वर्ग की नकल का प्रतिफल है । इस सथान पर मैं अपने ही पूिवो्त कथन की पुनरावृमत् करना चिाहूंगा , जो आपके सममुख अनायास और बिना समर्थन के उपशसथत हुआ होगा । मैंने कहा था कि इन विचिाराधीन तीन प्रथाओं के बल पर ब्ाह्मणों ने जातिप्रथा की नींव डाली । उस विचिार के पीछे मेरा तर्क यही था कि इन प्रथाओं को अनर िगयों ने वहीं से सीखा है । गैर-ब्ाह्मण जातियों में इन रिवाजों की ब्ाह्मणों जैसी नकल-
प्रवृमत् की भूमिका पर प्रकाश डालने के बाद मेरा कहना है कि ये प्रवृमत् उनमें आज भी मौजूद है , चिाहे वे अपनी इस आदत से पररमचित भी न हों । यदि इन िगयों ने किसी से सीखा है तो इसका अर्थ है कि समाज में उन प्रथाओं का किसी न किसी वर्ग में प्रचिलन रहा होगा और उसका दर्जा काफी ऊंचिा हुआ होगा , तभी वह दूसरों का आदर्श हो सकता है , परंतु किसी ई्िरवादी समाज में कोई आदर्श नहीं हो सकता , सिर्फ ई्िर का सेवक हो सकता है ।
इसमें उस कहानी की पूर्णाहुति हो जाती है कि जो निर्बल थे , जिनहोंने अपने को अलग कर लिया । हमें अब यह देखना है कि दूसरों ने अपने लिए उनके दरवाजे बंद देखकर अपना घर ्रों बंद कर लिया । इसे मैं जातिप्रथा के निर्माण की क्रियाविधि की प्रक्रिया मानता हूं । यही कारीगरी थी , ्रोंकि ऐसा अि्रंभावी होता है । यही दृष्टिकोण और मानसिकता है , जिसके कारण हमारे पूि्यितटी इस विषय की वराखरा करने से कतरा गए , ्रोंकि उनहोंने जाति को ही एक अलग ईकाई मान लिया , जबकि वह जातिप्रथा का ही एक अंग होती है । इस चिूक या इस पैनी दृष्टि के अभाव के कारण ही सही अवधारणा बनने में मदद नहीं मिली है । अतः सही वराखरा करने की आि्रकता है । एक मटिपपणी के जरिए मैं अपनी वराखरा प्रसतुत करूंगा , जिसे कृपया आप सदा धरान में रखें । वह मटिपपणी इस प्रकार है : जाति अपने आप में कुछ नहीं है , उसका अशसतति तभी होता है , जब वह सारी जातियों में सिरं भी एक हिससा हो । दरअसल , जाति कुद है ही नहीं , बशलक जातिप्रथा है । मैं इसका उदाहरण देता हूं , अपने लिए जाति-संरचिना करते समय ब्ाह्मणों ने ब्ाह्मण इतर जातियां बना डालीं । अपने तरीके से मैं यह कहूं कि अपने आपको एक बाड़े में बंद करके दूसरों को बाहर रहने के लिए विवश किया । एक दूसरे उदाहरण से मैं अपनी बात सप्टि करूंगा ।
भारत को संपूर्ण रूप से देखें , जहां विमभन् समुदाय हैं और सबको अपने समुदाय से लगाव है , जैसे हिंदू , मुसलमान , यहूदी , ईसाई और पारसी , लेकिन हिनदुओं को छोड़कर शेष में
आंतरिक जातिभेद नहीं हैं । परंतु एक-दूसरे के साथ वरिहार में उनमें अलग-अलग जातियां हैं । यदि पहले चिार समुदाय अपने को अलग कर लेंगे तो पारसी अपने आप ही बाहर रह जाएंगे , परंतु परोक् रूप से वे भी आपस में अलग समुदाय बना लेंगे । सांकेतिक रूप से कहना चिाहता हूं कि यदि ' क ' सजातीय विवाह पद्धति में सीमित रहना चिाहता है , तो निश्चित रूप से ' ख ' को भी विवश होकर अपने में ही सिमटि कर रह जाना पड़ेगा ।
अब यही बात हम हिंदू समाज पर भी लागू करें , आपके सामने एक वराखरा पहले से मौजूद हें कि निजद्ैतवाद के परिणामसिरूप जो प्रवृमत् इस समाज को विरासत में मिली है , वह है पृथकतवाद । मेरे इस नए विचिार से नैतिकतावादियों की भृकुमटि चिढ़ सकती हैं , जातपांत की धार्मिक या सामाजिक संहिता जाति विशिष्ट के लिए असाधर हो सकती है । किसी जाति के उद्ंड सदसरों को यह आशंका होती है कि उनहें मनचिाही जाति में शामिल होने का विकलप न देकर , जाति-बमह्कृत कर दिया गया है । जाति के नियम बहुत कठोर होते हैं और उनके उललंघन की माप का कोई पैमाना नहीं होता है । नयी विचिारधारा एक नयी जाति बना देती है , ्रोंकि पुरातन जातियां नवीनता को सह नहीं पाती । अनिष्टकारी विचिारकों को गुरु मानकर प्रतिष्ठत किया जाता है । जो अवैध प्रेम संबंधों के दोषी होते हैं तो वे भी उसी दंड के भागी होंगे । पहली श्ेणी उनकी है , जो धार्मिक समुदाय से जाति बनाते हैं , दूसरे वे हैं , जो संकर जाति बनाते हैं । अपनी संहिता का उललंघन करने वालों को दंड देने में कोई सहानुभूति नहीं अपनाई जाए । यह दंड होता है , हु्का-पानी बंद और इसकी परिणति होती है - एक पृथक जाति की रचिना । हिंदू मानसिकता में यह कमियां नहीं होतीं कि हु्का-पानी बंद के भागी अलग होकर एक अलग जाति बना लें । इसके विपरीत वे लोग नतमसतक होकर उसी जाति में रहकर बने रहना चिाहते हैं ( बशतचे कि उनहें इसकी इजाजत दे दी जाए ) परंतु जातियां सिमटिी हुई इकाइयां हैं और जानबुझकर उनमें यह चिेतना
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