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होती है कि बमह्कृत लोग एक अलग जाति बना लें । इसका विधान बड़ा निर्दयी है और इसी बल के अनुपालन का परिणाम है कि उनहें अपने में सिमटिना पड़ता है , ्रोंकि अनर िगयों ने अपने को ही परिधि में करके अनर िगयों को बाहर बंद कर दिया है , जिसका परिणाम है कि नए समुदाय ( जातिगत नियमों के निंदनीय आधार पर निर्मित समुदाय ) यंत्ित् विधि द्ारा आश्चर्यजनक बहुलता के साथ जातियों के बराबर परिवर्तन किए गए हैं । भारत में जाति-संरचिना की प्रक्रिया की यह दूसरी कहानी बताई गई है ।
अतः मुखर सिद्धांत का समापन करते हुए मैं कहना चिाहता हूं कि जातिप्रथा का अधररन करने वालों ने कई गलतियां की हैं , जिनहोंने उनके अनुसंधान को पथभ््टि कर दिया । जातिप्रथा का अधररन करने वाले यूरोपियन विद्ानों ने वरथ्य ही इस बात पर जोर दिया है कि जातिप्रथा रंग के आधार पर बनाई गई , ्रोंकि वे सिरं रंगभेद के प्रति पूर्वाग्रही हैं । उनहोंने जाति समसरा का मुखर तति यही भेद माना है , परंतु यह सतर नहीं है । डा . केतकर ने सही कहा है कि '' सभी राजा , चिाहे वे तथाकथित आर्य थे अथवा द्रविड , आर्य कहलाते थे । जब तक विदेशियों ने नहीं कहा , भारत के लोगों को इससे कोई सरोकार नहीं रहा कि कोई कबीला या कुटिुंब आर्य है या द्रविड़ । चिमड़ी का रंग इस देश में जाति का मानदंड नहीं रहा ( महसट्ी आफ कास्ट पृ . 82 )।
वे अपनी वराखरा का विवरण देते रहे और इसी बात पर सिर पटिकते रहे कि जातिप्रथा के उद्भव का यही सिद्धांत हैं । इस देश में वरािसायिक और धार्मिक आदि जातियां हैं , यह सतर है , परंतु किसी भी हालत में उनका सिद्धांत जातियों के मूल से मेल नहीं खाता । हमें यह पता लगाना है कि वरािसायिक वर्ग जातियां ्रों हैं ? इस प्रश्न को कभी छुआ ही नहीं गया । अंतिम परिणाम यह है कि उनहोंने जाति-समसरा को बहुत आसान करके समझा , जैसे वे चिुटिकी बजाते ही बन गई हों । इसके विपरीत जैसा मैंने कहा है यह मानर नहीं हैं , ्रोंकि इस प्रथा में बहुत जमटिलताएं हैं । यह सतर है कि जातिप्रथा
की जड़ें आसथाएं हैं , परंतु आसथाओं के जाति संरचिना में योगदान के पहले ही ये मौजूद थीं और दृढ़ हो चिुकी थीं । जाति-समसरा के संबंध में मेरे अधररन के चिार पक् हैं : ( 1 ) हिंदू जनसंखरा में विविध ततिों के सशममश्ण के बावजूद इसमें दृढ़ सांसकृमतक एकता है , ( 2 ) जातियां इस विराटि सांसकृमतक इकाई का अंग हैं , ( 3 ) शुरू में केवल एक ही जाति थी , और ( 4 ) इनहीं िगयों में देखी-देखी या बमह्कार से विमभन् जातियां बन गईं ।
आज भारत में जाति-समसरा ने एक दिलचिसप मोड़ ले लिया है , ्रोंकि इस अप्राकृतिक विधान को तिलांजलि देने के लिए सतत प्रयत्न हो रहे हैं । सुधार के ये प्रयत्न जातियों के मूल से संबंधित विवादों से उतपन् हुए हैं कि ्रा यह प्रथा सिवोच्च सतर के आदेशों से हुई या विशिष्ट पररशसथमतरों में मानव समाज के सहज विकास का प्रतिफल है । जो वरश्त बाद के विचिार के पक्धर हैं , मुझे आशा हैं कि उनहें इस प्रबंध से कुछ विचिार सामग्री मिलेगी । इस विषय के वरािहारिक महत्ि के साथ ही जाति प्रथा एक सर्ववरापी वरिसथा है और इसका सैद्धांतिक
आधार जानने की उतकंठा मुझ में जगी । उसी के परिणामसिरूप मैंने अपने विचिार आप लोगों के सममुख उपशसथत किए , जिनहें मैं सार्थक मानता हूं और वे बातें आपके समक् रखीं , जिन पर यह वरिसथा मटिकी है । मैं इतना हठधमटी भी नहीं हूं कि यह सोचि लूं कि मेरा कथन ब्ह्म वा्र है या इस विचिार-विमर्श में योगदान से बढ़कर कुछ है । मैं सोचिता हूं कि धारा का प्रवाह गलत दिशा में मोड़ दिया गया है और इस आलेख का प्राथमिक उद्े्र यह बताना है कि अनुसंधान का सही मार्ग कौन सा है , ताकि एक सतर उजागर हो । हमें इस विषय के वि्लेषण में पक्पात रहित रहना है । भावनाओं के लिए कोई सथान नहीं होना चिाहिए , बशलक इस विषय पर वैज्ञानिक और मन्पक् रूप से विचिार किया जाए । मैं इस बात से प्रसन् हूं कि मेरा दृष्टिकोण सही दिशा में है , मुद्े पर जो असहमति है , वह तार्किक है , फिर भी कुछ बातों पर सदा असहमति बनी रह सकती है , अंत में मुझे इस बात पर गर्व है कि मैंने जातिप्रथा के बारे में एक सिद्धांत प्रतिपादित किया है । यदि यह आधारहीन लगेगा तो मैं इसे तिलांजलि दे दूंगा । ( समापत )
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