eMag_March 2021_Dalit Andolan | Page 48

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हमारी नकल करने की प्रवृमत् का स्ोत वि्िास होता है और ऐसे कारण हैं , जो पूर्वकालीन रूप से हमें यह वि्िास कराते हैं तथा हमें वि्िास करने से विर्त करते हैं - यह हमारी प्रकृति के असप्टि भाग हैं । सरल मन से नकल करने की प्रवृमत् पर कोई संदेह नहीं है ।''( फिमज्स एंड पालिटिक्स ( भौतिकी एवं राजनीति शासत् ) 1915 , पृ्ठ 60 )
नकल करने की इस प्रवृमत् के विषय को गेबरिल टिाडडे ने वैज्ञानिक अधररन का रूप दिया , जिनहोंने नकल करने की प्रवृमत् को तीन नियमों में बांटिा है । उसके तीन नियमों से एक है कि नीचिे वाले ऊपर की नकल करते हैं । उनहीं के शबदों में , '' अवसर मिलने पर दरबारी सदा अपने नायकों , अपने राजा या अधिपति की नकल करते हैं और आम जनता भी उसी प्रकार अपने सामंतों की नकल करती है ( ललॉज ऑफ इमीटिेशन ( नकल करने के सिद्धांत ), अनुवाद : ई . सी . पार्सनस , पृ . 217 )।'' नकल के बारे में टिाडडे का दूसरा नियम है कि चिाहे आदर्श पात् और अनुसरणकर्ता के बीचि कितनी ही दूरी ्रों न हों , उनके अनुसार नकल करने की इचछा और तीव्रता में कोई फर्क नहीं पड़ता । उनहीं के शबदों में , '' जिस वरश्त की नकल की जाती है , वह होता है हमारे बीचि सबसे श्े्ठ वरश्त या समाज । दरअसल , जिनहें हम श्े्ठ मानते हैं , उनसे हमारा अंतर कितना ही हो , यदि हम उनसे सीधे संपर्क में आते हैं तो उनका संसर्ग अतरंत प्रभावोतपादक होता है । अंतर का अर्थ समाज-विज्ञान के आधार पर लिया गया है । यदि हमारा उनसे प्रतिदिन बार-बार संसर्ग होता है और उनके जैसे रंग-ढंग अपनाने का अवसर मिलता है , तो वह वरश्त चिाहे हमसे कितने ही ऊंचिे सतर का ्रों न हो , कितना ही अपररमचित हो , फिर भी हम सिरं को उसके निकटि मानते हैं । सबसे कम दूरी पर निकटितम वरश्त के अनुसरण का नियम प्रकटि करता है कि ऊंचिी हैसियत वाले वरश्त निरंतर सहज प्रभाव छोड़ते हैं ( ललॉज ऑफ इमीटिेशन ( नकल करने के सिद्धांत ), अनुवाद : ई . सी . पार्सनस , पृ . 225 )।
हालांकि प्रमाणों की आि्रकता नहीं है ,
परंतु अपने विचिारों को पुष्ट करने के लिए मैं बताना चिाहता हूं कि कुछ जातियों की संरचिना नकल से हुई । मुझे लगता है कि यह जाना जाए कि हिंदू समाज में नकल करके जातियां बनाने की पररशसथमतरां हैं या नहीं ? इस नियम के अनुसार नकल करने की गुंजाइश इस प्रकार है : ( 1 ) जिस स्ोत की नकल की गई है , उसकी समुदाय में प्रमत्ठा होनी चिाहिए , और ( 2 ) समुदाय के सदसरों में प्रतिदिन और अनेक बार संपर्क होने चिाहिए । भारतीय समाज में ये पररशसथमतरां मौजूद हैं , इसमें कोई शकर नहीं है । ब्ाह्मण अर्द्ध देवता माना जाता है और उसे अंशावतार जैसा कहा जाता है । वह विधि नियोजित करता है और सभी को उसके अनुसार ढालता है । उसकी प्रमत्ठा असंदिगध है और वह शीर्ष परमानंद है । ्रा शासत्ों द्ारा प्रायोजित और पुरोहितवाद द्ारा प्रतिष्ठा ऐसा वरश्त अपने वरश्तति का प्रभाव डालने में विफल हो सकता है ? यदि यह कहानी सही है तो उसके बारे में यह वि्िास ्रों किया जाता है कि वह जातिप्रथा की उतपमत् का कारण है । यदि वह सजातीय
विवाह का पालन करता है तो ्रा दूसरों को उसके पद मचिह्ों पर नहीं चिलना चिाहिए । निरीह मानवता ! चिाहे वह कोई दार्शनिक हो या तुचछ गृहसथ , उसे इस गोरखधंधे में फंसना ही पड़ता है , यह अि्रंभावी है । अनुसरण सरल है , आवि्कार कठिन ।
जातिप्रथा की संरचिना में दूसरों से सीखने की प्रवृमत् की कितनी भूमिका है , यह बताने के लिए गैर-ब्ाह्मण िगयों की प्रवृमत् को समझना होगा , जिनके लिए आज तक इस प्रथा के पोषक रीति-रिवाज विद्मान हैं , हिंदू मशसत्क को इनहोंने जकड़ रखा है और उनहें किसी सहारे की जरूरत नहीं है , सिवाय सतत वि्िास भाव के , जैसे एक पोखर में जलकुंभी । एक तरीके से हिंदू समाज में सती प्रथा , बालिका विवाह और विधवा की यथाशसथमत जातियों की हैसियत के हिसाब से विद्मान है , परंतु इन प्रथाओं का चिलन विमभन् जातियों में असमान है , जिससे उन जातियों का भेद परिलमक्त होता है ( मैं भेद शबद का प्रयोग टिार्डियन अर्थ में कर रहा हूं )। जो जातियां ब्ाह्मणों के निकटि हैं , वे इन तीनों
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