eMag_March 2021_Dalit Andolan | Page 39

था कि गांधी ने अनशन के जरिए रुढि़वादी हिंदू समाज से सामाजिक भेदभाव और असपृ्रता को खतम करने की अपील की . रुढि़वादी हिंदू नेताओं , कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं तथा पंडित मदन मोहन मालवीय ने डा . आंबेडकर और उनके समर्थकों के साथ यरवदा में संयु्त बैठकें की . अनशन के कारण गांधी की मृतरु होने की शसथमत में , होने वाले सामाजिक
प्रतिशोध के कारण होने वाली अछूतों की हतराओं के डर से और गांधी के समर्थकों के भारी दबाव के चिलते डा . आंबेडकर ने अपनी पृथक मनिा्यमचिका की मांग वापस ले ली . इसके बदले में अछूतों को सीटिों के आरक्ण , मंदिरों में प्रवेश-पूजा के अधिकार एवं छुआछुत समापत करने की बात सिीकार ली गयी . गांधी ने भी इस उममीद पर कि सभी सवर्ण भी पूना संधि का आदर कर सभी शततें मान लेंगे अपना अनशन समापत कर दिया .
गौरतलब है कि आरक्ण प्रणाली में पहले दलित अपने लिए संभावित उममीदवारों में से चिुनाव द्ारा चिार संभावित उममीदवार चिुनते और फिर इन चिार उममीदवारों में से फिर संयु्त मनिा्यचिन चिुनाव द्ारा एक नेता चिुना जाता . उललेखनीय है कि इस आधार पर सिर्फ एक
बार 1937 में चिुनाव हुए . डा . आंबेडकर चिाहते थे कि अछूतों को कम से कम 20-25 साल आरक्ण मिले जबकि कांग्रेस के नेता इसके पक् में नहीं थे . उनके विरोध के कारण यह आरक्ण मात् पांचि साल के लिए लागू हुआ . असपृ्रता के खिलाफ डा . आंबेडकर की लड़ाई को भारत भर से समर्थन मिलने लगा और उनहोंने अपने रवैया और विचिारों को रुढि़वादी हिंदुओं के प्रति अतरमधक कठोर कर लिया . भारतीय समाज की रुढि़वादिता से नाराज होकर उनहोंने नासिक के निकटि येओला में एक सममेलन में बोलते हुए धर्म परिवर्तन करने की अपनी इचछा प्रकटि कर दी . उनहोंने अपने अनुयायिओं से भी हिंदू धर्म छोड़ कोई और धर्म अपनाने का आह्ान किया . उनहोंने अपनी इस बात को भारत भर में कई सार्वजनिक सथानों पर दोहराया भी . 14 अक्टूबर 1956 को उनहोंने एक आमसभा का आयोजन किया जहां उनहोंने अपने पांचि लाख अनुयायिओं का बौद्ध धर्म में रुपानतरण करवाया . तब उनहोंने कहा कि मैं उस धर्म को पसंद करता हूं जो सितंत्ता , समानता और भाईचिारे का भाव सिखाता है .
डा . आंबेडकर सिर्फ हिंदू समाज में वरापत कुरीतियों और सामाजिक भेदभाव के ही विरोधी नहीं थे . वे इसलाम और दमक्ण एशिया में उसकी रीतियों के भी बड़े आलोचिक थे . वे मुशसलमों में वरापत बाल विवाह की प्रथा और महिलाओं के साथ होने वाले दुवर्यवहार के भी आलोचिक थे . उनहोंने लिखा है कि मुशसलम समाज में तो हिंदू समाज से भी कहीं अधिक बुराईयां हैं और मुसलमान उनहें भाईचिारे जैसे नरम शबदों के प्रयोग से छिपाते हैं . उनहोंने मुसलमानों द्ारा अर्जल िगयों के खिलाफ भेदभाव जिनहें मनचिले दजचे का माना जाता था , के साथ मुशसलम समाज में महिलाओं के उतपीड़न की दमनकारी पर्दा प्रथा की निंदा की . वे सत्ी-पुरुष समानता के पक्धर थे . उनहोंने इसलाम धर्म में सत्ी-पुरुष असमानता का जिक्र करते हुए कहा कि बहुविवाह और रखैल रखने के दुपरर्णाम शबदों में वर्त नहीं किए जा सकते जो विशेष रुप से एक मुशसलम महिला के दुख के स्ोत हैं . जाति वरिसथा को ही लें , हर कोई
कहता है कि इसलाम गुलामी और जाति से मु्त होना चिाहिए , जबकि गुलामी अशसतति में है और इसे इसलाम और इसलामी देशों से समर्थन मिला है . इसलाम में ऐसा कुछ नहीं है जो इस अभिशाप के उनमूलन का समर्थन करता हो . अगर गुलामी खतम हो जाए फिर भी मुसलमानों के बीचि जाति वरिसथा रह जाएगी .
उनहोंने इसलाम में उस कट्रता की भी आलोचिना की जिसके कारण इसलाम की नीतियों का अक्रशः अनुपालन की बद्धता के कारण समाज बहुत कट्र हो गया है . उनहोंने लिखा है कि भारतीय मुसलमान अपने समाज का सुधार करने में विफल रहे हैं जबकि इसके विपरित तुकटी जैसे इसलामी देशों ने अपने आपको बहुत बदल लिया . रा्ट्िाद के मोर्चे पर भी डा . आंबेडकर बेहद मुखर थे . उनहोंने विभाजनकारी राजनीति के लिए मोहममद अली जिन्ा और मुशसलम लीग दोनों की कटिु आलोचिना की . हालांकि शुरुआत में उनहोंने पाकिसतान निर्माण का विरोध किया किंतु बाद में मान गए . इसके पीछे उनका तर्क था कि हिंदुओं और मुसलमानों को पृथक कर देना चिाहिए ्रोंकि एक ही देश का नेतृति करने के लिए जातीय रा्ट्िाद के चिलते देश के भीतर और अधिक हिंसा होगी . वे कतई नहीं चिाहते थे कि भारत सितंत्ता के बाद हर रोज र्त से लथपथ हो . वे हिंसामु्त समानता पर आधारित समाज के पैरोकार थे .
उनकी सामाजिक व राजनीतिक सुधारक की विरासत का आधुनिक भारत पर गहरा प्रभाव पड़ा है . मौजुदा दौर में सभी राजनीतिक दल चिाहे उनकी विचिारधारा और सिद्धांत कितनी ही मभन् ्रों न हो , सभी डा . आंबेडकर की सामाजिक व राजनीतिक सोचि को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं . डा . आंबेडकर के राजनीतिक-सामाजिक दर्शन के कारण ही आज विशेष रुप से दलित समुदाय में चिेतना , शिक्ा को लेकर सकारातमक समझ पैदा हुआ है . इसके अलावा बड़ी संखरा में दलित राजनीतिक दल , प्रकाशन और कार्यकर्ता संघ भी अशसतति में आए हैं जो समाज को मजबूती दे रहे हैं .
( साभार ) ekpZ 2021 Qd » f ° f AfaQû » f ³ f ´ fdÂfIYf 39