eMag_March 2021_Dalit Andolan | Page 40

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हिन्ी सिनेमा में दलित नायक

कुमार भासकर

हिं

दुसतान की महाकावर परमपरा में नायक के लिए लक्ण होते थे । आचिार्य वि्िनाथ के अनुसार “ महाकावर का नायक कुलीन , क्मत्र या देवता होना चिाहिए ”। जाति और देवति का भाव समय के साथ आधुनिक साहितर में तो खतम हो गया , लेकिन समाज से यह भाव नहीं गया । भारतीय समाज को देखें तो , अमूमन “ नायक के लिए आदरभाव जातीय संसकारों से प्रेरित होते हैं ।” महारा्ट् और दमक्ण प्रांतों में दलित सरोकार नेतृति और सामाजिक आनदोलनों के चिलते वहां की सामाजिक समझ में परिवर्तन आया । साथ ही दलित समाज में अपने नायकों के प्रति जागरूकता और आतमसममान का भाव विकसित हुआ । लेकिन हिनदी पट्ी और उससे लगे क्ेत् , जिसमें उत्र प्रदेश , बिहार , मधरप्रदेश , राजसथान , गुजरात आदि को देखें तो यहां सामाजिक नरार के आनदोलनों का प्रभाव तो पड़ा , लेकिन उसे कायम रखने में उतना कामयाब नहीं हो सका ।
जिस कारण इधर के कई दलित भी
ब्ाह्मणवाद की चिपेटि में आए हुए हैं । आंबेडकर को भी मानेंगे , पंडित से पूजा भी कराएंगे । इस दोहरी मानसिकता के कारण ही दलित आनदोलन कमजोर हुआ है । इसलिए भी पिछड़े / दलितों ने अपने नायकों से जरादा सवर्ण जाति के नायकों को अपने दिलों में सथान दिया है । या यूँ कहें की उनहें बड़ा नायक बनाने में सहयोग दिया । इसमें कोई संदेह नही की नायकों की जाति मायने नही रखती है । लेकिन सिीकार्यता के पीछे जातीय मानसिकता हो तो सवाल पैदा होगा हीं । जो भी हुआ जागरूकता और नेतृति के अभाव में हुआ ।
दलित नायकों के योगदान को साजिशन और पारमपरिक जातीय दमभ की मानसिकता के कारण समाज का उच्च तबका कम करके आंकता है । ऊंचिी जाति के सभी लोग तो नही , लेकिन जरादातर उच्च वर्ग किसी दलित को नायक मानता भी है तो , उसमें छलावा अधिक होता है । नहीं तो अपने रंग में रंगकर सिीकार करता है । जाति की मानसिकता से ग्रसित हमारा समाज , बिना किसी मद्ज ठपपे के किसी दलित नायक
को सिीकर नहीं करता है । नायक के प्रति कुलीनता बोध , उसी पुरानी महाकावर की परमपरा के समान , समाज में मौजूद है । जिस प्रकार तमाम आधुनिक बोध के बाद भी अंधवि्िास , कर्मकांड और ब्ाह्मणवाद हमारे समाज का अहम हिससा है ।
90 के दशक से वरिसायिक / फार्मूला सिनेमा का उठान होता है , जो 90 से 20 के दशक में और भी रफतार पकड़ता है । यह दौर सलमान , अक्र , रवीना , माधुरी शाहरुख , गोविंदा , करर्मा का है । इनहीं के साथ-साथ करण जौहर , डेविड धवन , सुभाष घई , यश चिोपड़ा , सूरज बड़जातरा जैसे वरिसायिक सिनेमा के सफल मनदचेशकों का भी है । भूमंडलीकरण की वजह से सिनेमा के वरिसाय को काफी मदद मिली । इसकी वजह से फिलमों का बाजार बढ़ जाता है । धीरे-धीरे मल्टीपले्स का दौर आता है । जिसमें पीवीआर , m2k , सिनेपोलिस जैसे इलीटि किसम के सिनेमाघर आ जाते हैं । ये सिनेमाघर मधरमिगटीर समाज को अभिजातरता का बोध कराता है । सामाजिक
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