eMag_March 2021_Dalit Andolan | Seite 38

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आरषिण के मसले पर काुंग्ेस ने

किया था डॉ . आुंबेडकर का विरोध
अरविंद जयतिलक

ब भारत के प्रमुख विद्ान के तौर पर

डा . अंबेडकर को भारत सरकार
अधिनियम 1919 तैयार कर रही साउथ बोरोह समिति के समक् गवाही देने के लिए आमंमत्त किया गया तो उनहोंने सुनवाई के दौरान दलितों एंव अनर धार्मिक समुदायों के लिए पृथक मनिा्यमचिका और आरक्ण की मांग की . डा . अंबेडकर के इस मांग की तीव्र आलोचिना हुई और उन पर आरोप लगा कि वे भारतीय रा्ट् एवं समाज की एकता को खंडित करना चिाहते हैं . लेकिन सचि तो यह है उनका इस तरह का कोई उद्ेर नहीं था . उनका असल मकसद उन रुढि़वादी हिंदू राजनेताओं को सतर्क करना था जो जातीय भेदभाव से लड़ने के प्रति कतई गंभीर नहीं थे .
इंगलैंड से लौटिने के बाद जब उनहोंने भारत की धरती पर कदम रखा तो समाज में छुआछुत और जातिवाद चिरम पर था . उनहें लगा कि यह सामाजिक कुप्रवृमत् और खंडित समाज देश को कई हिससों में तोड़ देगा . सो उनहोंने हाशिए पर खड़े अनुसूमचित जाति-जनजाति एवं दलितों के लिए पृथक मनिा्यमचिका की मांग कर परोक् रुप से समाज को जोड़ने की दिशा में पहल तेज कर दी . अपनी आवाज को जन-जन तक पहुंचिाने के लिए उनहोंने 1920 में , बंबई में सापतामहक मूकनायक के प्रकाशन की शुरुआत की जो शीध्र ही पाठकों में लोकप्रिय हो गया . दलित वर्ग के एक सममेलन के दौरान उनके दिए गए भाषण से कोलहापुर राजर का सथानीय शासक शाहु चितुर्थ बेहद प्रभावित हुआ । डा . आंबेडकर के साथ उसका भोजन करना रुढि़वाद से ग्रसत
भारतीय समाज को झकझोर दिया . डा . आंबेडकर मुखरधारा के महतिपूर्ण राजनीतिक दलों को जाति वरिसथा के उनमूलन के प्रति नरमी पर वार करते हुए उन नेताओं की भी कटिु आलोचिना की जो असपृ्र समुदाय को एक मानव के बजाए करुणा की वसतु के रुप में देखते थे .
ब्रिटिश हुकूमत की विफलताओं से नाराज अंबेडकर ने असपृ्र समुदाय को समाज की मुखर धारा में लाने के लिए एक ऐसी अलग राजनैतिक पहचिान की वकालत की जिसमें कांग्रेस और ब्रिटिश दोनों का कोई दखल न हो . 8 अगसत 1930 को उनहोंने एक शोषित वर्ग के सममेलन के दौरान अपनी राजनीतिक दृष्टि को दुनिया के सामने रखा और कहा कि ‘ हमें अपना रासता सिरं बनाना होगा और सिरं राजनीतिक शक्त शोषितों की समसराओं का निवारण नहीं
हो सकती . उनको मशमक्त करना चिाहिए , उनका उद्धार समाज में उनका उमचित सथान पाने में निहित है . उनको अपना रहने का बुरा तरीका बदलना होगा . उनको मशमक्त होना चिाहिए . एक बड़ी आि्रकता उनकी हीनता की भावना को झकझोरने और उनके अंदर दैवीय असंतोष की सथापना करने की है , जो सभी ऊंचिाइयों का स्ोत है . इस भाषण में डा . आंबेडकर ने कांग्रेस की नीतियों की जमकर आलोचिना की .
दरअसल डा . आंबेडकर ही एकमात् राजनेता थे जो छुआछुत की निंदा करते थे . जब 1932 में ब्रिटिश हुकूमत ने उनके साथ सहमति वर्त करते हुए अछूतों को पृथक मनिा्यमचिका देने की घोषणा की तब महातमा गांधी ने इसके विरोध में पुणे की यरवदा सेंट्ल जेल में आमरण अनशन शुरु कर दिया . यह डा . आंबेडकर का प्रभाव ही
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