eMag_March 2021_Dalit Andolan | Page 31

की वे रत्नागिरी दीर्घकाल तक आवास करने आए है और छुआछूत समापत करने का आनदोलन चिलाने वाले है । उनहोंने उपशसथत सज्जनों से कहा कि अगर कोई अछूत वहां हो तो उनहें ले आये और अछूत महार जाति के बंधुओं को अपने साथ बैल गाड़ी में बैठा लिया ।
पाठकगण उस समय में फैली जातिवाद की कूप्रथा का सरलता से आंकलन कर सकते है
कि जब किसी भी शुद्र को सवर्ण के घर में प्रवेश तक निषेध था । नगर पालिका के भंगी को नारियल की नरेटिी में चिाय डाली जाती थी । किसी भी शुद्र को नगर की सीमा में धोती के सथान पर अंगोछा पहनने की ही अनुमति थी । रासते में महार की छाया पड़ जाने पर अशौचि की पुकार मचि जाती थी । कुछ लोग महार के सथान पर बहार बोलते थे , जैसे महार कोई गाली हो । यदि रासते में महार की छाया पड़ जाती थी तो ब्ह्मण लोग दोबारा स्ान करते थे । नरारालय में साक्ी के रूप में महार को कटिघरे मंर खड़े होने की अनुमति न थी । इस भंयकर दमन के
कारण महार समाज का मानो साहस ही समापत हो चिूका था ।
इसके लिए सावरकर जी ने दलित बशसतरों में जाने का , सामाजिक कारयों के साथ साथ धार्मिक कारयों में भी दलितों के भाग लेने का और सवर्ण एवं दलित दोनों के लिए पतितपावन मंदिर की सथापना का निश्चय लिया गया । जिससे सभी एक सथान पर साथ साथ पूजा कर सके और दोनों के मधर दूरियों को दूर किया जा सके ।
- रत्नागिरी प्रवास के 10-15 दिनों के बाद में सावरकर जी को ममढ़रा में हनुमान जी की मूर्ति की प्राण प्रमत्ठा का निमंत्ण मिला । उस मंदिर के देवल पुजारी से सावरकर जी ने कहा कि प्राण प्रमत्ठा के कार्यक्रम में दलितों को भी आमंमत्त किया जाये , जिस पर वह पहले तो न करता रहा पर बाद में मान गया । श्ी मोरे्िर दामले नामक किशोर ने सावरकार जी से पूछा कि आप इतने साधारण मनु्र से वरथ्य इतनी चिचिा्य ्रूँ कर रहे थे ? इस पर सावरकर जी ने कहा कि “ सैंकड़ों लेख या भाषणों की अपेक्ा प्रतरक् रूप में किये गए कारयों का परिणाम अधिक होता है । अबकी हनुमान जयंती के दिन तुम सिरं देख लेना ।”
-29 मई 1929 को रत्नागिरी में श्ी सतर नारायण कथा का आयोजन किया गया जिसमे सावरकर जी ने जातिवाद के विरुद्ध भाषण दिया जिससे की लोग प्रभावित होकर अपनी अपनी जातिगत बैठक को छोड़कर सभी महार- चिमार एकमत्त होकर बैठ गए और सामानर जलपान हुआ ।
- 1934 में मालवान में अछूत बसती में चिायपान , भजन कीर्तन , अछूतों को यज्ञपवीत ग्रहण , विद्ालय में समसत जाति के बच्चों को बिना किसी भेदभाव के बैठाना , सहभोज आदि हुए ।
-1937 में रत्नागिरी से जाते समय सावरकर जी के विदाई समारोह में समसत भोजन अछूतों द्ारा बनाया गया जिसे सभी सिणयों- अछूतों ने एक साथ ग्रहण किया था ।
-एक बार शिरगांव में एक चिमार के घर पर श्ी सतर नारायण पूजा थी जिसमे सावरकर जो
को आमंमत्त किया गया था । सावरकार जी ने देखा की चिमार महोदय ने किसी भी महार को आमंमत्त नहीं किया था । उनहोंने ततकाल उससे कहाँ की आप हम ब्ाह्मणों के अपने घर में आने पर प्रसन् होते हो पर में आपका आमंत्ण तभी सिीकार करूूँगा जब आप महार जाति के सदसरों को भी आमंमत्त करेंगे । उनके कहने पर चिमार महोदय ने अपने घर पर महार जाति वालों को आमंमत्त किया था ।
-1928 में शिवभांगी में विट्ल मंदिर में अछूतों के मंदिरों में प्रवेश करने पर सावरकर जी का भाषण हुआ ।
-1930 में पतितपावन मंदिर में शिवू भंगी के मुख से गायत्ी मंत् के उच्चारण के साथ ही गणेशजी की मूर्ति पर पु्पांजलि अर्पित की गई ।
-1931 में पतितपावन मंदिर का उद्घाटिन सिरं शंकराचिार्य श्ी कूर्तकोमटि के हाथों से हुआ एवं उनकी पाद्पूजा चिमार नेता श्ी राज भोज द्ारा की गयी थी । वीर सावरकर ने घोषणा करी की इस मंदिर में समसत हिंदुओं को पूजा का अधिकार है और पुजारी पद पर गैर ब्ाह्मण की नियुक्त होगी ।
इस प्रकार के अनेक उदहारण वीर सावरकर जी के जीवन से हमें मिलते हैं , जिससे दलित उद्धार के विषय में उनके विचिारों को , उनके प्रयासों को हम जान पाते हैं । सावरकर जी के बहुआयामी जीवन के विमभन् पहलुओं में से सामाजिक सुधारक के रूप में वीर सावरकर को समरण करने का मूल उद्े्र दलित समाज को विशेष रूप से सनदेश देना है । जिसने राजनीतिक सिाथयों की पूर्ति के लिए सवर्ण समाज द्ारा अछूत जाति के लिए गए सुधार कारयों की अपेक्ा कर दी है । और उनहें केवल विरोध का पात् बना दिया हैं । वीर सावरकर महान क्रांतिकारी ्राम जी कृ्ण वर्मा जी के क्रांतिकारी विचिारों से लनदन में पढ़ते हुए संपर्क में आये थे । ्रामजी कृ्ण वर्मा सिामी दयानंद के मश्र थे । सिामी दयानंद के दलितों के उद्धार करने रूपी मचिंतन को हम सप्टि रूप से वीर सावरकर के मचिंतन में देखते हैं ।
( पुनर्प्रकाशित ) ekpZ 2021 Qd » f ° f AfaQû » f ³ f ´ fdÂfIYf 31