eMag_March 2021_Dalit Andolan | Page 32

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वामपंथियों के रचे दूषित इतिहास

डॉ पुनरीत बिसारिया

नवासी समाज वासति में एक ऐसा

समाज है , जिसने अपनी परमपराएं ,
संसकार और रीति-रिवाज संरमक्त रखे है । लेकिन अपने जल , जंगल-जमीन में सिमटिा यह समाज शैमक्क आर्थिक रूप से पिछड़ा होने के कारण रा्ट् की विकास यात्ा के लाभों से वंमचित है । यह सचि है कि दलित तबका शिक्ा , विकास तथा धनार्जन के मूलभूत अधिकारों से वंमचित रखा गया , किनतु ऐतिहासिक तथर यह है कि अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने के लिए पहला विद्रोह तिलका मांझी ने 1824 में उस समय किया था , जब उनहोंने अंग्रेज़ कमिश्नर ्लीिलैणड को तीर से मार गिराया था । 1765 में खासी जनजाति ने अंग्रेज़ों के विरूद्ध विद्रोह किया था । 1817 में खानदेश आनदोलन , 1855 में संथाल विद्रोह तथा 1890 में बिरसा मुंडा का आनदोलन अंग्रेज़ों के विरूद्ध वनवासियों के संघर्ष की गौरव गाथाएं हैं , किनतु दुर्भागर की बात है कि इतिहाकार 1857 को ही नवजागरण का प्रसथान बिनदु मानते हैं और वनवासियों के सशसत् विद्रोह की उपेक्ा कर देते हैं ।
यह अतरनत क्ोभ की बात है कि जिन वनवासियों ने भारतभूमि को अंग्रेज़ों के चिंगुल से बचिाने के लिए संघर्ष छेड़ा , उनहीं दीन-हीन अबोध वनवासियों को सिाधीनता मिलने के बाद से ही विकास के नाम पर उनके जल , जंगल और जमीन से खदेड़ने का अभियान शुरू कर दिया गया । परिणाम यह हुआ कि जिन जंगलों में वनवासी पर्यावरण के साथ एकातमता सथामपत करते हुए निवास किया करते थे , उनहें विकास की आि्रकता के नाम पर उजाड़ दिया गया और वहां पर बड़े-बड़े कल-कारखाने , खदान , बांध आदि बना दिए गए ।
यदि आंकड़ों पर गौर करें तो हम पाते हैं कि
वनवासी देश की कुल आबादी का 8.14 प्रतिशत भूभाग पर हैं और भारत के भौगोलिक क्ेत्िल के 15 प्रतिशत भूभाग पर ये निवास करते हैं । भारत का संविधान वनवासी अथवा अनुसूमचित जनजाति समाज को अलग से परिभाषित नहीं करता किनतु संविधान के अनुचछेद-366 ( 25 ) के अनतग्यत " अनुसूमचित " का सनदभ्य उन समुदायों में करता है , जिनहें संविधान के अनुचछेद-342 में अनुसूमचित किया गया है । संविधान के अनुचछेद-342 के अनुसार अनुसूमचित जनजातियां वह वनवासी या वनवासी समुदाय या इन वनवासी समुदायों का भाग या उनके समूह हैं , जिनहें रा्ट्पति द्ारा एक सार्वजनिक अधिसूचिना द्ारा इस प्रकार घोषित किया गया है । किसी समुदाय के अनुसूमचित जनजाति में विशिष्टीकरण के लिए पालन किए गए मानदणड हैं , आदिम लक्णों का होना , विशिष्ट संसकृमत , भौगोलिक बिलगांव , वृहत्र समुदाय से समपक्फ में संकोचि और पिछड़ापन । यह दुखद तथर हैं कि वनवासी समाज की 52 प्रतिशत आबादी गरीबी की रेखा के नीचिे जीवनयापन करती है तथा 54 प्रतिशत वनवासियों के पास आर्थिक समपदा , संचिार और परिवहन की पहुंचि रही है ।
भारत में वनवासी समूहों की संखरा-700 से अधिक है । सन् 1951 की जनगणना के मुताबिक उनकी आबादी 1,91,11 , 498 थी , जो सन् 2001 की जनगणना में बढकर 8,43,26,240 हो गयी । वनवासियों के निवास की दृष्टि से भारत के क्ेत् को चिार भागों में िगटीकृत किया जा सकता है । ये हैं- उत्र पूिटी क्ेत् , मधर क्ेत् , पश्चिमी क्ेत् और दमक्णी क्ेत् । उत्र-पूिटी क्ेत् के अनतग्यत हिमालयी क्ेत् और ब्ह्मपुत् की यमुना-पद्ा शाखा के पूिटी भाग का पर्वतीय क्ेत् आता है । यहां गुरूंग , लिंबू , लेपचिा , आका , डाफल , अबोर , मिरी , मिशमी , सिंगपी ,
मिकिर , राम , कवारी , गारो , खासी , नागा , कुकी , लुशाई , चिकमा , नरीशी , आदी , गालो , आपातानी , मोमपा , तागीन , शेरदुरूपेन , खामती , सिंगफो , नाक्टे , बांग्चू , तांगसा , आका , मिजी , मेमबा , बु्रगुन , मर्रम , रियाम आदि प्रमुख वनवासी जनजातियां निवास करती हैं । मधर क्ेत् का विसतार उत्र प्रदेश के मिर्जापुर जिले से लेकर दमक्णी और राजमहल पर्वतश्ेणी के पश्चिमी भाग से होता हुआ दमक्ण में गोदावरी तक है । इस क्ेत् संथाल , मुंडा , उरांव , भूमिज , हो , खडि़या , बिरहोर , जुआंग , खोंडं , सवरा , गोंड , भील , बैगा , कोरकू , कमार , असेर , बिरजा , हिल खढिया , कोरवा , माल पहाडि़या , सौरिया , सवर सहारिया , अबूझमाडि़या , भाडि़या , बु्सा , रजिया आदि जनजातीय लोग निवास करते हैं । पश्चिमी क्ेत् में मधर पश्चिम राजसथान से होकर दमक्ण सहयाद्रि पर्वतश्ेणी तक का पश्चिमी भाग आता है । इस भाग में मीजा , ठाकुर , कटिकरी , कोलम , माडि़या , ग्रेटि अणडमानी , जारवा , ओंगे , सेंटिनेली , शोमपेन आदि जनजातियां निवास करती हैं । दमक्ण क्ेत् के अनतग्यत गोदावरी के दमक्ण से कनराकुमारी तक का समपूण्य क्ेत् आता है । इस भाग में चिेंचिू , कोड़ा , रेड्ी , राजगौंड , कोया , कोलाम , कोटिा , कममाद , कांडकाफ , कोंडदोरा ,
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